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झारखंड में बीते तीन साल में पोक्सो के मामले 70 फीसदी बढ़े, साल 2019 में 654 मामले हुए दर्ज

RAHUL GURU

Ranchi : झारखंड में प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ओफेन्स (पोक्सो) के तहत दर्ज होने वाले मामले में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. आंकड़े बताते हैं कि पोक्सो के मामले बीते तीन साल में 70 फीसदी तक बढ़े हैं. साल 2017 में यह आंकड़ा 385 था.

साल 2018 में 615 और साल 2019 में 654 हो गये हैं. दर्ज मामलों की संख्या नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (NCRB) के हैं. जबकि इसी रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल स्तर पर बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में यौन शोषण के मामलों की हिस्सेदारी 32 फीसदी है. इसमें भी 99 फीसदी मामले लड़कियों के यौन शोषण के मामले होते हैं.

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तीन हजार मामले की नहीं होती निष्पक्ष सुनवाई

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कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) की ओर से की गयी एक अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि हर साल बच्चों के यौन शोषण के तकरीबन तीन हजार मामले निष्पक्ष सुनवाई के लिए अदालत तक पहुंचते ही नहीं.

हर दिन यौन शोषण के शिकार चार बच्चों को न्याय से इसलिए वंचित कर दिया जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस पर्याप्त सबूत और सुराग नहीं मिलने के कारण इन मामलों की जांच को अदालत में आरोपपत्र दायर करने से पहले ही बंद कर देती है.

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34 फीसदी पीड़ित को ही एक साल में मिलता है न्याय

NCRB के साल 2017 से 2019 के बीच पेश किये गये आंकड़े के विश्लेषण के आधार पर कैलाश सत्यार्थी  चिल्ड्रेन्स  फाउंडेशन ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “पुलिस केस डिस्पो्जल पैटर्न: एन इनक्वायरी इनटू द केसेस फाइल्ड अंडर पॉक्सो एक्ट 2012’’ और “स्टेट्स ऑफ पॉक्सो केस इन इंडिया” नामक दो रिपोर्ट की है.

यह रिपोर्ट बताती है कि पॉक्सो कानून के मुताबिक बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामले की जांच से लेकर अदालती  प्रक्रिया तक एक साल में खत्म हो जानी चाहिए.

यानी एक साल के भीतर ही पीड़ित को न्याय मिल जाना चाहिए. जबकि रिपोर्ट बताती है कि सजा की यह दर केवल 34 फीसदी है. इसकी वजह से अदालतों पर पॉक्सो के मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है.

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राष्ट्रीय स्तर पर 19 फीसदी की हुई बढ़ोतरी

बच्चों के यौन शोषण के मामले को राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो इसमें भी उत्तरोतर बढ़ोतरी ही हुई है. राष्ट्रीय स्तर पर आकड़े बताते हैं कि साल 2017 में पॉक्सो के तहत 32,608 मामले दर्ज किये गये. जो 2018 में बढ़कर 39,827 हो गये. यह वृद्धि करीब 22 फीसदी थी.

जबकि 2019 में यह संख्या बढ़कर 47,335 हो गयी. साल 2018 के मुकाबले इसकी तुलना की जाए तो साल 2019 में पिछले के मुकाबले बच्चों के यौन शोषण के मामलों में 19 फीसदी की बढोत्तरी देखने को मिली.

अमलीजामा की आस में हैं 2018 से फास्ट ट्रैक कोर्ट

देश में पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के यौन अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. जबकि सरकार ने एक विशेष कानून की जरूरत को महसूस करते हुए ही पॉक्सो कानून बनाया था. लेकिन जमीन पर इसका प्रभाव और परिणाम  निराशाजनक रहा है.

सरकार ने बच्चों के यौन शोषण के मामले में अतिशीघ्र सुनवाई कर त्वरित गति से न्याय दिलाने के लिए 2018 में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी. लेकिन अभी तक इसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया.

NCRB के आंकड़ो की मानें तो पॉक्सो के तहत दर्ज कुल मामलों में से 6 फीसदी मामले सबूत का अभाव बताकर थानों में ही बंद कर दिये जाते हैं. जो मामले बिना आरोपपत्र दाखिल किये ही पुलिस द्वारा बंद किये गये थे, उनमें 40 फीसदी मामले सही थे.

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