Opinion

नेताओं के खरीद-फरोख्त के दौर में राज्यों की गैरभाजपा सरकारें इस तरह बचा सकती है अस्तित्व

Faisal Anurag

मोदी-शाह के दौर में ही भाजपा की अपराजेय माने जाने वाली रणनीति में दरार दिखने लगी है. आक्रामक राजनीति से विरोधियों को धराशायी करने और विधायकों के खरीद-फरोख्त की मंशा को महाराष्ट्र में और अब राजस्थान में मात मिली है. पहले राउंड के खेल में इस तरह की हार के कई राजनीतिक मायने हैं. उन राज्यों के लिए यह सबक है, जहां गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं. एक देश एक शासन के भाजपा के सपने के लिए इस तरह की मात मायने रखती है.

यह बताती है कि विपक्ष के जमीनी नेताओं की पकड़ इसका जवाब हो सकती है. महाराष्ट्र में जमीनी पकड़ वाले नेता शरद पवार के रणनीतिक हुनर में फंस कर भाजपा फजीहत करा चुकी है. इसी तरह राजस्थान में अशोक गहलोत की जमीनी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. सचिन पायलट परिघटना के अस्थायी होने के अनुमानों के बावजूद भाजपा के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक पराजय है.

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2014 के बाद की राजनीति से भाजपा की रणनीति पूरी तरह कारगर साबित होती आयी है. कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दलों को इस दौरान न केवल चुनावी हार का समाना करना पड़ा है बल्कि सामाजिक आधारों में भी बिखराव के दौर से गुजराना पड़ा है.

दर्जन भर छोटे बड़े राज्यों में विपक्ष को सत्ता से बेदखल करने में भाजपा की तोड़फोड़ नीति को कामयाबी मिली. बिहार जैसे राज्य में तो उसने विपक्षी गठबंधन को ही तोड़ दिया. कर्नाटक और मध्यप्रदेश में उसने मजबूत दिखने वाली सरकारों को सत्ता से बेदखल कर दिया. मध्यप्रदेश में संख्याबल से कांग्रेस की सरकार मजबूत नहीं थी. लेकिन चुनावी जनादेश के नजरिए से उसकी अहमियत थी.

इन दोनों राज्यों में जमीनी पकड़ वाले नेताओं के अभाव या मतभेदों के कारण भाजपा को कामयाबी मिली. लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को शरद पवार ने ऐसे चक्रव्यूह में फंसाया कि उससे बाहर निकलना असंभव हो गया. हालांकि राजस्थान में सचिन पायलट को मनाने में अशोक गहलोत की भूमिका तो नहीं रही, लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने साबित किया कि वे बाजी को अपने पक्ष में कर सकते हैं. वैसे राजस्थान विवाद का एक बड़ा पहलू वसुंधरा राजे सिंधिंया भी रही हैं. जो गहलोत सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं थीं.

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गहलोत ने गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को मुकाबले में खड़ा करने और बीजेपी की परेशानियों को बढ़ाने में बडी भूमिका निभायी थी. तब वे गुजरात कांग्रेस के प्रभारी थे. हालांकि विपक्ष के लिए यह सुकून में रहने का वक्त नहीं हैं. विपक्ष में तो मायावती की राजनीति भाजपा की पिछलग्गू के बतौर दिखने लगी है. कांगेस पर उनके हमले भाजपा से भी ज्यादा होते हैं. जिस तरह की प्रतिक्रिया उन्होंने राजस्थान के ताजा प्रकरण पर दी है, उससे जाहिर होता है कि विपक्ष के लिए भी गठबंधन को उनका सहयोग नहीं मिलेगा. तय है कि भाजपा का मुकाबला कोई भी एक पार्टी देश के स्तर पर नहीं कर सकती है.

लेकिन राजनीतिक जीत के लिए जरूरी है कि सामाजिक समूहों के सवालों को गंभीरता से लिया जाए. कमजोर तबकों के भीतर की निराशा को दूर किया जाए. राजनीतिक तौर पर देश में एकदलीय शासन की प्रवृति हावी होती जा रही है. जबकि लोकतंत्र के लिए उसे प्रतिस्पर्धा मूलक बनाने की जरूरत है. गैर भाजपा राज्य सरकारों का भविष्य इसी पर निर्भर है किे वह लोगों की राजनीतिक चेतना में एक दलीय शासन के खिलाफ किस तरह लोकतांत्रिक माहौल बना पाती हैं.

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