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ऑर्किड अस्पतालः मलेरिया था नहीं चला दी दवा, विभाग ने CS से कहा कार्रवाई हो, छह माह बाद भी नहीं हुई

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-विभाग सिविल सर्जन को ऑर्किड पर कार्रवाई के लिए बार-बार भेज रहा रिमाइंडर

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-मरीज को डायलिसिस की जरुरत थी नहीं फिर भी किया था डायलिसिस

-रिपोर्ट के अनुसार ऑर्किड में चिकित्सकों और पारा चिकित्सकों की घोर कमी

Pravin/Gaurav

Ranchi : ऑर्किड सुपरस्पेशलिटी अस्पताल में सितंबर 2016 में मेहरुन निशात की मौत गलत इलाज के कारण हुई थी. डॅा विजय शंकर दास और डॉ विजय नाथ खन्ना द्वारा विभाग को दी गयी रिपोर्ट में ये बात सामने आयी थी. जांच रिपोर्ट में अस्पताल प्रशासन के गलत तरीके से ट्रीटमेंट और लापरवाही की बात सामने आयी थी. मामले की जांच के लिए पीएमओ, सीएमओ, और राष्ट्रपति तक से विभाग को निर्देशित किया गया. जांच में पाया गया कि मरीज को मलेरिया थी ही नहीं और मलेरिया का दवा चला दिया गया. 3.7 क्रिटिनिन रहने के बाद भी डायलिसिस कर दिया गया. इसके अलावा भी कई गलतियां की गयीं.

जांच में आरोप सही पाने के बाद विभाग लगातार रिपोर्ट के आधार पर सिविल सर्जन को ऑर्किड अस्पताल पर कार्रवाई करने के आदेश भी जारी किये गये. सिविल सर्जन को अब तक छह महीने में पांच बार कार्रवाई करने के लिए रिमाइंडर भी भेजा जा चुका है पर कार्रवाई अब तक नहीं की गयी है. क्लीनिकल स्टेबलिसमेंट एक्ट की कार्रवाई के तहत ऑर्किड अस्पताल के रजिस्ट्रेशन पर विचार किया जाना है.

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छह महीने में पांच बार सिविल सर्जन को अस्पताल पर कार्रवाई करने के रिमाइंडर

जांच रिपोर्ट के आधार पर सिविल सर्जन रांची विजय बहादुर प्रसाद को ऑर्किड अस्पताल पर क्लीनिकल स्टेबलिसमेंट एक्ट के तहत कार्रवाई के आदेश दिये गये थे. अब तक छह महीने में पांच बार सिविल सर्जन को विभाग की ओर से कार्रवाई के लिए रिमाइंडर भेजा जा चुका है, पर सिविल सर्जन कार्रवाई नहीं कर रहे हैं. 1 जनवरी 2019, 25 फरवरी 2019, 19 मार्च 2019, 29मार्च 2019 और तीन मई को रिमाइंडर भेजा गया.

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मरीज खा सकता था दवा फिर भी दिया इंजेक्शन

मलेरिया की दवा चला देने के अलावा 3.7 क्रिटिनिन रहने के बाद भी डायलिसिस कर दिया गया.  इसके अलावा जांच रिपोर्ट में ये बात सामने आयी थी कि मरीज दवा खा सकता था पर न्यूट्रिफ्लेक्स लिपिड का इनफ्यूसन भी दिया गया. यह तभी दिया जाता है जब मरीज मुंह से कुछ नहीं ले सकता.

इसके अलावा एंटी बायोटिक मोक्सिफ का इंजेक्शन और टिरिका का टैबलेट भी दिया गया. जबकि ओरली मौक्सिीफ्लोसिन लिया जा सकता था. रिर्पोट में साफ है कि जो दवा दी गयी, वो देना उचित नहीं था. सीएसएफ के स्टेराईल रहने पर भी बार-बार एंटी बायोटिक बदल दिया जाता रहा. ब्लड सीएसएफ और यूरीन स्टेराईल रहने के बाद भी मृत्यु का कारण सेप्टीक शॉक को बताया गया जो गलत है.

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ऑर्किड अस्पताल में चिकित्सकों एवं पारा चिकित्सा कर्मियों की घोर कमी

जांच रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ऑर्किड अस्पताल में चिकित्सकों एवं पारा चिकित्सा कर्मिंयों की घोर कमी है. क्लीनिकल स्टेबलिस्मेंट एक्ट के तहत 8 बेड के आईसीयू में 24 घंटे तीन एमबीबीएस डॉक्टर होने चाहिए. ऑर्किड में 12 बेड की आईसीयू है और विशेषज्ञ चिकित्सकों और एमबीबीएस डॉक्टरों की सूची के अनुसार ऑर्किड में चिकित्सकों और पारा चिकित्सकों की भारी कमी है.

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