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मदद की दरकारः दो जून की रोटी पर आफत है, तीन संतानों की आंखों का इलाज कराए तो कैसे

सरकार की व्यवस्था एसी कि दर-दर भटकने पर भी नहीं बन रहा है विकलांग सर्टिफिकेट

Ranchi : बलसोकरा गांव के निवासी मकसूद अंसारी की आंखें हमेशा लाचारगी से डबडबायी रहती है. उम्मीदों का दामन भी छूटते जा रहा है. आशा निराशा में तब्दील हो रही है और व्यवस्था इस कदर पत्थर दिल हो चुकी है कि कोई असर नहीं पड़ रहा है. दरअसल, मकसूद की तीन संतानें हैं और तीनों जन्मजात नेत्रहीन. इनमें दो पुत्र और एक पुत्री है.

 

मकसूद की आर्थिक स्थित बेहद दयनीय है, अपने बूते जहां तक बच्चों का इलाज करा सकता था, कराया..मगर सफलता नहीं मिली. मकसूद अंसारी बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से लगातार सरकारी कार्यालयों का चक्कर काट रहे हैं, कई बार सदर अस्पताल रांची के डॉक्टर को दिखाया परंतु आज तक विकलांग सर्टिफिकेट नहीं मिला. डॉक्टर का कहना है कि इसका इलाज कराया जाए और इसका इलाज हैदराबाद या चेन्नई में संभव है.

 

मकसूद कहते हैं यहां तो दो जून की रोटी पर आफत है, हैदराबाद या चेन्नई में इलाज के बारे सोचा भी नहीं जा सकता है. मकसूद को उम्मीद है कि यदि विकलांग सर्टिफिकेट बन जाता है कुछ सरकारी मदद मिल जाएगी. इसी उम्मीद में तीनों बच्चों को साथ लेकर सदर अस्पताल का चक्कर काट रहा है. अब थक हार कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील की है कि उसकी मदद की जाये.

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