Education & CareerJharkhandRanchi

स्कूल में एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटी के नाम पर अभिभावकों की होती है जेब ढीली

Ranchi: शिक्षा और बच्चों के सर्वांगीण विकास के नाम पर बेफजूल वसूली निजी स्कूलों का पेशा बन गया है. जहां सेशन शुरू होते ही अभिभावकों को कॉपी-किताब, री एडमिशन समेत अन्य खर्चों की चिंता सताने लगती है. वहीं सत्र के मध्यम में बच्चों से डांस, नाटक, क्राफ्ट आदि के नाम पर भी भारी रकम की वसूली की जाती है.
सरकारी स्कूलों को छोड़ दिया जाये तो सभी निजी स्कूलों और प्ले स्कूलों का हाल एक सा ही है.

इसे भी पढ़ेंः भाजपा बड़ी है या ढुल्लू ?

स्कूलों में पर्याप्त संसाधन होने के बाद भी ये विद्यालय किसी न किसी तरह से अभिभावकों की जेब ढीली कराते रहते हैं. जबकि इन स्कूलों में नये सत्र के साथ लेने वाले फीस के अलावा प्रति माह मासिक फीस, बस किराया, कंप्यूटर समेत अन्य क्रियाकलापों को जोड़कर भारी रकम ली जाती है. एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटी के नाम पर अभिभावकों का बजट बढ़ाने वाले स्कूल में बिशप वेस्टकॉट नामकुम, बिशप वेस्टकॉट डोरंडा, डीपीएस, संत जेवियर, ऑक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल, शारदा ग्लोबल, संत जेवियर आदि स्कूल शीर्ष पर है.

Sanjeevani

कार्यक्रमों में हजार से पंद्रह सौ तक की वसूली

स्कूल में मची इस लूट पर न्यूज विंग ने शहर के कई अभिभावकों से बात की. नाम नहीं लिखने की शर्त में इन्होंने बताया कि स्कूलों में समय-समय पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते है. जैसे वार्षिक समारोह, शिक्षक दिवस, बाल दिवस या अन्य धार्मिक त्यौहारों के आयोजन में बच्चे कार्यक्रमों में भाग लेते है. अब इन कार्यक्रमों में सभी बच्चों को एक समान कपड़ें पहनने को कहा जाता है. अधिकांश माता-पिता ने कहा कि स्कूल खुद बच्चों के लिये कपड़े बनवाते हैं. जिसके लिये एक हजार से पंद्रह सौ तक की रकम अभिभावक को देने पड़ते है.

इसे भी पढ़ें – बिजली कंपनियों की कुल संपत्ति 4000 करोड़, कर्ज 6500, दूसरी लाइन से बिजली लेने में हर महीने में 17…

अच्छी गुणवत्ता के नहीं होते कपड़ें

अभिभावकों ने कहा कि स्कूलों में बनवाये गये कपड़ों को बच्चे किसी अन्य जगहों पर पहन कर नहीं जा सकते है. क्योंकि इनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है. कई बार इस तरह के आयोजन के लिए स्कूल द्वारा बनवाये गये ड्रेस या तो बच्चों के नाप से बड़े होते हैं, या फिर छोटे. पेरेंट्स का कहना है कि आमतौर पर सात से आठ सौ तक में बच्चे के लिए अच्छे कपड़े आ जाते हैं, लेकिन स्कूल में हजार से पंद्रह सौ देने के बावजूद भी ढंग के ड्रेस नहीं होते.

क्राफ्ट बॉक्स के नाम पर तीन सौ तक की वसूली

इन स्कूलों में बच्चों को अतिरिक्त पाठ्यक्रम के नाम पर सिलाई, आर्ट क्राफ्ट आदि सिखाया जाता है. इनके नाम पर भी स्कूलों में बच्चों से दो से तीन सौ रूपये तक लिये जाते है. अभिभावकों ने बताया कि क्राफ्ट के नाम पर स्कूलों से छोटे-छोटे बॉक्स बच्चों को दिये जाते है. जिनमें आमूमन सूई, धागा, आधा मीटर जैसी नेट, क्रेप पेपर आदि रहते है. जो बाजार से लेने में सौ रूपये तक आ जायेगा.

700-800 तक होता है मुनाफा

इन स्‍कूलों द्वारा अमूमन 1000-1500 रुपये डांस, नाटक के नाम पर लिया जाता है. अगर इन कपड़ों की गुणवत्‍ता पर जायें तो एक बच्‍चे पर मुश्किल से 400-500 रुपये स्‍कूलों द्वारा खर्च किया जाता है. ऐसे में प्रति विद्यार्थी भारी राशि स्‍कूलों को मुनाफा होता है.

इसे भी पढ़ें – आयुष्मान भारत की हकीकत : 90 हजार में बायपास सर्जरी और 9 हजार में सिजेरियन डिलेवरी

कार्यक्रम में भाग ही लेने नहीं देते अभिभावक

डीपीएस, ऑक्सफोर्ड, शारदा ग्लोबल, बिशप ग्रुप में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावकों ने कहा कि बच्चे डांस आदि में भाग ले ये अच्छा लगता है. लेकिन स्कूल इन कार्यक्रमों के नाम पर जिस तरह पैसे मांगते हैं, उससे घर का बजट गड़बड़ा जाता है. कभी-कभी माह के बीच में समझ नहीं आता कि पैसे कहां से दिये जायें. क्योंकि पहले से ही स्कूलों की फीस अधिक है. ऐसे में कार्यक्रमों के नाम पर भारी रकम देने से घर के बजट पर असर पड़ता है. ऐसे में अभिभावकों ने कहा कि इन सबसे अच्छा है कि बच्चों को कार्यक्रम में भाग नहीं लेने दिया जाये.

बच्चों पर रहता है दबाव

पेरेंट्स कहते है कि बच्चों को बाहर से स्कूल के अनुसार कपड़ें बनाने की बात कहने पर, वो घबरा जाते है. अधिकांश अभिभावकों ने कहा कि बच्चे दबाव में आकर पैसे देने की बात करते है. साथ ही अभिभावकों को कहते है कि पैसे नहीं देने पर टीचर और दोस्तों के बीच बेइज्जती होगी.

इसे भी पढ़ेंःनये मुख्य सचिव पर दिल्ली की हामी जरूरी! ब्यूरोक्रेसी में बड़े पैमाने पर हो सकता है फेरबदल

Related Articles

Back to top button