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लिट्टीपाड़ा में लटकी, सिल्ली में सरेंडर और गोमिया में गर्त में जा चुकी बीजेपी के लिए कोलेबिरा की राह कंटीली

एनोस एक्का की पत्नी मेनन एक्का का पलड़ा भारी

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: पहले लिट्टीपाड़ा में लटकी फिर सिल्ली में सरेंडर और गोमिया में गर्त में जा चुकी भाजपा के लिए कोलेबिरा की राह कंटीली है. कोलेबिरा विधानसभा उपचुनाव में कहीं बीजेपी की भद तो नहीं पिटने वाली है, आज-कल यह चर्चा आम हो चली है. कोलेबिरा उपचुनाव को लेकर बीजेपी अपने पत्ते अभी नहीं खोल रही है. माना जा रहा है सभी विरोधी पार्टी की रणनीति जानने के बाद ही बीजेपी अपना स्टैंड क्लियर करेगी. बीजेपी के लिए कोलेबिरा उपचुनाव लोकसभा चुनाव से पहले काफी चैलेंजिंग टास्क माना जा रहा है. लेकिन कोलेबिरा का राजनीतिक गणित कह रहा है कि बीजेपी के लिए कोलेबिरा की राह आसान नहीं है, क्योंकि कोलेबिरा में फिलवक्त झारखंड पार्टी का पलड़ा भारी है.

ठुकराया जा चुका है बीजेपी का ऑफर

अंदरखाने की खबर है कि झारखंड पार्टी के कर्ताधर्ता एनोस एक्का अपनी पत्नी मेनन एक्का को चुनाव में उतारने जा रहे हैं. एनोस एक्का कोलेबिरा विधानसभा के एक कद्दावर नेता होने के साथ-साथ ईसाई फेस भी हैं. कोलेबिरा विधानसभा क्षेत्र में करीब 70 फीसदी वोटर ईसाई हैं. इससे पहले भी एनोस एक्का ईसाई फेस होने की वजह से विधायक बन सके हैं. मेनन एक्का को झापा की तरफ से मैदान में उतारे जाने के बाद सारे समीकरण ध्वस्त होते दिखाई दे रहे हैं. कहा जा रहा है इसी वजह से बीजेपी ने झापा के साथ मिलकर या बीजेपी के ही टिकट पर चुनाव लड़ने का ऑफर दिया था. लेकिन झापा को यह डर है कि कहीं बीजेपी के साथ चुनाव में आने से कहीं ईसाई वोट ही ना कट जाए. इसी वजह से अब झापा अकेले दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है.

पत्नियों के विधायक बनने की बन रही है परंपरा

गोमिया में योगेंद्र महतो और सिल्ली में अमित महतो को अलग-अलग मामले में सजा मिलने के बाद दोनों की विधानसभा की सदस्यता खत्म हो गयी. दोनों पूर्व विधायकों ने उपचुनाव में अपनी पत्नियों को चुनाव में उतारा. सिल्ली में अमित महतो की पत्नी सीमा महतो ने आजसू चीफ सुदेश महतो को कड़ी शिकस्त दी. वहीं कम अंतर से ही सही लेकिन योगेंद्र महतो की पत्नी बबीता महतो ने आजसू के लंबोदर महतो को हराया. ऐसे में अब कोलेबिरा विधानसभा सीट पर अगर सजायाफ्ता पूर्व विधायक एनोस एक्का की पत्नी मेनन एक्का उपचुनाव में जीत हासिल करती हैं तो झारखंड के उपचुनावों में पत्नियों के जीतने की परंपरा बनती देखी जा सकती है.

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