JharkhandLead NewsNEWSRanchiTOP SLIDER

झारखंड में बस फुफकारने की हालत में है राजद, डसने की स्थिति में नहीं

Gyan Ranjan

Ranchi: खरमास ख़त्म होते ही झारखंड में राजद नेताओं का हेमंत सरकार के खिलाफ लगातार बयान आ रहा है. नेताओं के तेवर तल्ख़ देखे जा रहे हैं. सार्वजानिक कार्यक्रमों में सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं. राजद नेताओं के द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि झारखंड में सरकार बनाने में उसकी पार्टी और नेता का बड़ा योगदान है. सरकार में शामिल रहने के बाद भी हमारी नहीं सुनी जा रही है. ऐसे कई तरह के बयान राजद नेताओं द्वारा लगातार 14 जनवरी से आ रहे हैं. यहां तक की कई नेता झामुमो और कांग्रेस को औकात भी दिखाते नजर आ रहे हैं. इस सबकुछ के बाद लाख टके का सवाल यह है कि क्या झारखंड में राजद की स्थिति सरकार से विरोध करने की है. सांगठनिक रूप से हो या सरकार में भागीदारी को लेकर, क्या राजद अपनी मनमानी कर सकता है. सच्चाई यह है कि राजद झारखंड में बस फुफकारने की हालत में है, डसने की स्थिति में नहीं.

इसे भी पढ़ेंः1.24 लाख से अधिक स्टूडेंट्स के बीच कल्याण विभाग बांटेगा 80 करोड़ रुपये

वजह यह है कि झारखंड में राजद के अब गिने चुने जनाधार वाले नेता बच गए हैं. जो जनाधार वाले नेता हैं वो भी अपने-अपने क्षेत्र तक ही सीमित हैं. वर्ष 2021 के शुरुआत में ही झारखंड सरकार में शामिल गठबंधन के दलों ने 20 सूत्री, निगरानी समिति, बोर्ड-निगमों के गठन की मांग शुरू की. तीन महीने पहले सत्ताधारी दलों में 20 सूत्री को लेकर फार्मूला तय हुआ. जिसमे यह तय किया गया कि 13 जिले झामुमो, 10 जिले कांग्रेस और एक जिला राजद को दिया जाएगा. उस समय राजद नेताओं की तरफ से कोई विरोध नहीं हुआ. अब जब 20 सूत्री का जिलावार गठन शुरू हो गया है तो राजद ने फिर फुफकारना शुरू कर दिया है.

 

अलग राज्य बनने के बाद से पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने झारखंड को हासिये पर रखा

बिहार से अलग राज्य बनने के बाद से ही झारखंड पर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने ध्यान नहीं दिया. अलग राज्य बना था तो यहां राजद के नौ विधायक थे. एक तरह से कहा जाय तो विपक्ष में झामुमो और कांग्रेस से कमजोर नहीं था राजद. राज्य के पलामू, संथाल और उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में राजद का व्यापक जनाधार था. कई बड़े नाम भी पार्टी से जुड़े थे, जिनकी पहचान पुरे राज्य में थी. राष्ट्रीय नेतृत्व भले ही झारखंड पर ध्यान नहीं देता था, लेकिन प्रदेश स्तर पर कार्यक्रम होता था. कई रैलियां भी हुई थी. विपक्ष में रहते हुए कई मुद्दों पर सदन से लेकर सड़क तक राजद आवाज बुलंद करता था. कालांतर में राजद प् प्रभाव धीरे-धीरे घटता गया और नौ विधायकों वाला राजद घटते-घटते वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में शून्य पर आ गया. भले ही राजद झारखंड में विधायक विहीन हो गया लेकिन पार्टी का कार्यक्रम और संगठन का काम चलता रहा.

 

वर्ष 2019 में राजद को लगा सबसे बड़ा झटका

वर्ष 2018 तक झारखंड में राजद का संगठन बखूबी काम कर रहा था. मिशन 2019 को ध्यान में रखकर पार्टी के तात्कालिक प्रदेश नेतृत्व ने व्यापक कार्यक्रम शुरू किये. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी के नेतृत्व में लातेहार से शुरू किये गये कार्यक्रम में पलामू तक लोगों का जबरदस्त समर्थन था लेकिन जैसे ही यह कारवां चतरा पहुंचा, अचानक से इसपर ब्रेक लग गया. ब्रेक लगने का मुख्य कारण थे सुभाष यादव जो वर्ष 2017 से ही चतरा में सामानांतर संगठन चला रहे थे. राजद सुप्रीमो लालू यादव का सुभाष यादव पर कृपा बनी हुई थी. इतना ही नहीं सुभाष यादव पार्टी को कोई तरजीह नहीं देता था और खुद निर्णय लेता था. ऐसा नहीं था कि प्रदेश नेतृत्व ने इसकी शिकायत लालू यादव से नहीं की थी. लेकिन लालू यादव की तरफ से कोई निर्णय नहीं लिया गया. कहा तो यह जाता है कि लालू यादव, सुभाष यादव के खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करते थे. जो शिकायत लेकर जाता था उसे ही लालू यादव बहुत कुछ सुना देते थे. आलम यह हुआ कि लालू-सुभाष प्रेम ने झारखंड में राजद में बवंडर लाने का काम किया. इसी कारण से तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह, पूर्व विधायक जनार्दन पासवान, पूर्व सांसद मनोज भुइयां सहित प्रदेश भर के सेकड़ों नेताओं-कार्यकर्ताओं ने महीने भर के भीतर राजद से किनारा कर लिया.

 

गठबंधन में मिली सात सीट एक पर जीते

वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ झामुमो, कांग्रेस और राजद का महागठबंधन हुआ. राजद को 7 सीट मिली लेकिन गठबंधन के बाद भी महज एक सीट पर ही राजद जीत सका. हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनी. मंत्रिपद के लिए चार-एक का फार्मूला तय हुआ. इस फार्मूला से इतर जाकर हेमंत सोरेन ने एक विधायक वाले राजद को अपनी सरकार में एक मंत्रिपद दिया.

इसे भी पढ़ेंःकोरोना का साइडइफेक्ट: पढ़ रहे लेकिन लेसन नहीं रहता याद, पढ़ाई भी अब नहीं करना चाहते बच्चे

डेढ़ महीने से ज्यादा समय से नेतृत्व विहीन है राजद

24 नवम्बर को राजद प्रमुख लालू यादव के निर्देश पर झारखंड राजद की पूरी कमिटी को अचानक भंग कर दिया गया. तब से आज तक झारखंड में नेतृत्व विहीन है राजद. हेमंत सरकार में जो एक मंत्री हैं उन्हें तो मानो संगठन से कुछ लेना-देना ही नहीं है. पूर्व में यह कहा गया था कि तेजस्वी यादव महीने में दो दिन झारखंड में प्रवास करेंगे और संगठन को मजबूत करेंगे. एक-दो बार तेजस्वी आये लेकिन उसके बाद से उनका भी झारखंड से मोह भंग हो गया है.

 

जनाधार वाले नेता को संगठन में नहीं मिल रही तरजीह

अन्नपूर्णा देवी, गिरिनाथ सिंह सरीखे नेताओं के राजद से अलविदा कहने के बाद प्रदेश नेतृत्व में पार्टी के वैसे नेता जिनका जनाधार है, उनकी पूछ कम हो गयी. अभय सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन अभय सिंह की टीम में बड़े नेताओं को उचित सम्मान नहीं मिला. गोड्डा के संजय यादव, देवघर के सुरेश पासवान, हुसैनाबाद के संजय सिंह यादव, छतरपुर के राधाकृष्ण किशोर का अपने-अपने क्षेत्र में व्यक्तिगत जनाधार है. लेकिन इन नेताओं को साथ लेकर काम नहीं किया गया. बाद के दिनों में गोड्डा के संजय यादव को प्रधान महासचिव जरुर बनाया गया. लेकिन इसके कुछ महीने बाद ही पूरी कमिटी भंग कर दी गयी.

Advt

Related Articles

Back to top button