Opinion

गुजरात में ‘काल कोठरी” बने अस्पतालों पर हाइकोर्ट की तल्ख टिप्पणी पर लीपापोती शुरू हो गयी है

Faisal Anurag

जैसा कि हमने पहले कहा कि यह सिविल अस्पताल मरीजों के उपचार के लिए है, लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि आज की तारीख में यह काल कोठरी जैसा है. या यूं कहें कि उसे भी बदतर. दुर्भाग्य से गरीब और बेसहारा मरीजों के पास विकल्प नहीं है. गुजरात उच्च न्यायलय की दो सदस्यीय खंडपीठ की यह टिप्पणी है. सख्त लहजे की यह टिप्पणी उस राज्य की है जहां से प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह हैं.

मुख्यमंत्री के तौर पर इन दोनों के ही पसंदीदा विजय रूपाणी मुख्यमंत्री हैं. इस तरह की टिप्पणी यदि गैर भाजपा शासित किसी राज्य के लिए होती तो अभी तक बीजेपी के प्रवक्ताओं, मंत्रियों और आईटी सेल का तीर कमान से निकल चुका होता. वैसे तो पूरे राज्य को ले कर हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर की है, लेकिन अहमदाबाद के अस्पताल पर खास तौर पर कहा गया है.

इसी अहमदाबाद के गांधीनगर सीट से अमित शाह लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं. और नरेंद्र मोदी गांधी नगर में 12 साल बतौर मुख्यमंत्री गुजरात मॉडल का डंका पीटते रहे हैं. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को तनिक भी भान है कि अस्पताल में क्या चल रहा है. अदालत ने तो यहां तक कहा है कि अहमदाबाद अस्पताल की हालत काल कोठरी से भी ज्यादा बदतर है.

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कोरोना वायरस और लॉकडाउन पर स्थिति के संदर्भ को जनहित याचिका के रूप में स्वत: संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति आईजे वोरा की खंडपीठ ने टिप्पणी की है. पीठ ने अहमदाबाद के सिविल अस्पताल की दशा पर राज्य सरकार को खूब खरी खोटी सुनाई है.

अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में मरीजों की बड़ी संख्या में मौत हुई है. यहां 638 मरीजों में 377 मरीजों की जान चली गयी. यह वहीं गुजरात है जहां एक वेंटिलेटर घोटाले का मामला सामने आ चुका है. जिसे डाक्टर जानलेवा बता रहे हैं. उसके बचाव में पूरी गुजरात सरकार तत्पर है. इस विवाद को ले कर कई तरह के आरोप लग रहे हैं. और अगर सही अर्थों में जांच हुई तो उसमें कई बड़े नाम भी सामने आ सकते हैं. अहमदाबाद के पत्रकारों के अनुसार राज्य सरकार की लचर स्वास्थ्य सेवा पर की गयी हाईकोर्ट की टिप्पणी बताती है कि राज्य में अस्पतालों के हालात क्या हैं.

गुजरात देश भर में कोरोना संक्रमण के तीन सबसे बड़े केंद्रों में हैं. हाईकोर्ट में तो सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए एक ऐसा तर्क दिया है जिसके बाद लोगों में दहशत भी फैल सकती है. सरकार ने दलील दी है कि यदि वह जांच की प्रक्रिया और गति तेज करेगी तो राज्य की 70 प्रतिशत आबादी पॉजिटीव निकलेगी. यह दलील अपने आप में कोरोना वायस से लड़ने के तरीकों और उस पर सरकारों के रुख को ही दिखता है. प्रति दस लाख पर भारत टेस्ट में क्यों पिछडा हुआ है. इसके कारणों को समझा जा सकता है.

कोरिया और कुछ अन्य देशों ने तो केवल टेस्ट, ट्रेसिंग और ट्रिटमेंट के सूत्र से कोरोना के प्रभाव को थामने की दिशा में कामयाबी हासिल की है. भारत के ही केरल ने इसी सूत्र के आधार पर कोरोना का मुकाबला किया है. शुरूआत में सबसे तेज गति से प्रभावित होने वाला केरल कोरोना के तृफान को थामने में सफल रहा है.

लेकिन देश में केरल मॉडल से भी सीख लेने की जहमत नहीं उठायी गयी है. कोविड 19 के बावजूद राजनीति में जिस तरह गैर भाजपा शासित राज्यों को नीचा दिखाने का प्रयास हुआ है, केरल उसका सबसे बड़ा शिकार है. लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने तो टिप्पणी कर कर बता दिया है, कि रूपाणी सरकार जो कि मोदी के काल से ही गुजरात में सरकारी अस्पतालों की उपेक्षा करते रहे हैं, उसे नाकाम दिखाने की कोशिश करते रहे हैं. इस समय उन्हीं नीतियों के कारण लोगों की जान को खतरे में डाल रहे हैं. गुजरात के कई शहरों में मजूदरों की वापसी के बाद हुई जांच ने गुजरात सरकार की विफलता को ही साबित किया है.

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तत्परता के साथ बंगाल केंद्रीय टीम भेजने वाली मोदी सरकार की गुजरात पर चुप्पी गैर भाजपाई दलों के आरोप को ही प्रमाणित करता प्रतीत होता है. अदालत में गुजरात सरकार ने जांच के बारे में जो कुछ कहा है उससे स्पष्ट हे कि जांच की गति को कम क्यों रखा जा रहा है. दुनिया भर में भारत की जांच गति को ले कर सवाल किए जा रहे हैं. भारत में भी कई डाक्टरों ने जांच गति कम होने को ले कर सवाल किया है. सवाल उठाने पर प्राथमिकी दर्ज कर लोगों को डराया तो सकता है. लेकिन हकीकत पर परदा नहीं डाला जा सकता है.

कोविड से लड़ने का नया तरीका यह निकाला गया है कि हालात की जानकारी देने के लिए होने वाली निमित प्रेसवार्ता को बंद कर दिया गया है. यही नहीं आइसीएमआर को लेकर भी डाक्टरों में बेचेनी बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं.

क्योंकि उसके निर्देशों को ले कर कई तरह के सवाल डाक्टरों के बीच ही हैं. आइसीएमआर ने अभी तक एक भी शोधपत्र किसी प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका में प्रकाशित नहीं कराया है. इस पर दुनिया भर के मेडिकल जानकारों में भी सवाल है.

 इस टिप्पणी के बीच ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के एक ताजा बयान पर काफी हंगामा मचा है. इस बयान में उन्होंने कहा है कि महाराष्ट्र से आने वाले श्रमिकों में 75 प्रतिशत कोरोना पॉजिटीव हैं. और दिल्ली से आने वाले 50 प्रतिशत. इसी तरह बाहर से आने वाले 25 प्रतिशत. जबकि राज्य सरकार अब तक कहती रही है कि राज्य में 6000  से कुछ ज्यादा कोरोना पॉजिटीव पाये गये हैं. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने आदित्यनाथ के बयान के बाद कहा है कि मुख्यमंत्री ने किस आधार पर इतनी बड़ा संख्या में पॉजिटीव होने की बात कही है. जबकि इनकी जांच भी नहीं हुई है.

प्रियंका गांधी ने कहा है कि यदि मुख्यमंत्री का बयान तथ्यों पर आधारित है तो राज्य में मरीजों की संख्या दस लाख होनी चाहिए. गुजरात सरकार या आदित्यनाथ ने जो कुछ कहा है उससे तो जाहिर होता है कि मरीजों की संख्या जो बतायी जा रही है, उसे जानबूझ कर कम दिखाया जा रहा है. नागरिकों के हेल्थ के नजरिए से यह एक गंभीर बात है.

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