Dharm-JyotishGarhwaJharkhandKhas-Khabar

गढ़वा में है 32 मन सोने की राधा-कृष्ण की प्रतिमा, जहां भक्त करते हैं भगवान के अलौकिक दर्शन

Garhwa: झारखंड के पश्चिमी छोर पर खूबसूरत वादियों के बीच स्थित बंशीधर नगर उतरप्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार की सीमाओं को स्पर्श करता है. यहां श्री बंशीधर भगवान स्वयं आकर विराजमान हुये हैं. भगवान के स्वयं विराजमान होने के कारण श्री बंशीधर नगर (नगर उंटारी) को योगेश्वर कृष्ण की भूमि कहा जाता है. और यहां की पहचान बंशीधर मंदिर से ही है. इस मंदिर में प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मथुरा एवं वृन्दावन की तरह मनाई जाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश, के रूप विराजमान हैं.

इसे भी पढ़ें : हथियार का निर्माण कर बेच ‎रहे हैं झारखंड के नक्सली

32 मन सोने की दुर्लभ मूर्ति

यहां राधा-कृष्‍ण की 1280 किलो (32 मन) सोने की दुर्लभ मूर्ति है. इस मूर्ति की कीमत आज सोने के भाव से करीब 640 करोड़ रुपये हैं. हालांकि 2014 में बीएचयू के पुरातात्विक विभाग की टीम ने इसकी एंटिक वैल्यू करीब 2500 करोड़ रुपए आंकी. साथ ही राधा की अष्टधातु मूर्ति भी कान्हा के साथ है. जानकारों के अनुसार, प्रतिमा करीब पांच फीट लंबी दिखाई देती है. पर इतनी ही जमीन के अंदर है, जिसमें कृष्ण शेषनाग पर विराजमान हैं. मुर्ति की कुल लंबाई 10 फीट है.

advt

श्री बंशीधर मंदिर की स्थापना सन 1885 में हुई थी. किवंदतियों के मुताबिक राजा भवानी सिंह देव की  विधवा शिवमानी कुंवर भगवान कृष्ण की बड़ी भक्त थी और और इस प्रतिमा को उन्होंने ही सपने में देखा था. पौराणिक कथाओं के अनुसार रानी ने एक बार जन्माष्टमी की और उसी रात भगवान ने उन्हें सपने में दर्शन दिए. स्वप्न में श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा. रानी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर रहे. तब भगवान कृष्ण ने रानी से कनहर नदी के किनारे महुअरिया के निकट शिव पहाड़ी अपनी प्रतिमा के गड़े होने की जानकारी दी और उन्हें अपने राज्य में लाने को कहा. भगवत कृपा जान रानी ने शिवपहाड़ी जाकर विधिवत पूजा अर्चना के बाद खुदाई करायी तो श्री बंशीधर जी की अद्वितीय असाधारण प्रतिमा मिली. जिसे हाथियों पर बैठाकर श्री बंशीधर नगर लाया गया.

बताया जाता है कि रानी इस प्रतिमा को अपने किले में स्थापित करना चाहती थीं, परंतु किले के मुख्य द्वार पर हाथी बैठ गया. लाख प्रयत्न के बाद भी वह यहां से नहीं उठा. हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से राय मशविरा कर वहीं पर मंदिर का निर्माण कराया तथा वाराणसी से राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाकर दिनांक 21 जनवरी 1828 को स्थापित कराया गया. श्री बंशीधर जी प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अति सुंदर एवं अद्वितीय है. बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पॉलिस के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है. भगवान श्री कृष्ण शेषनाग के उपर कमल पीड़िका पर बंशीवादन नृत्य करते विराजमान हैं. भूगर्भ में गड़े होने के कारण शेषनाग दृष्टिगोचर नहीं होते हैं.

श्री बंशीधर मंदिर के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों स्वरूप में हैं. मंदिर में स्थित प्रतिमा को गौर से देखने पर यहां भगवान के त्रिदेव के स्वरूप में विद्यमान रहने का अहसास होता है. यहां स्थित श्री बंशीधरजी जटाधारी के रूप में दिखाई देते है जबकि शास्त्रों में श्रीकृष्ण के खुले लट और घुंघराले बाल का वर्णन है इस लिहाज से मान्यता है कि श्रीकृष्ण जटाधारी अर्थात देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान हैं. श्रीकृष्ण के शेषशैय्या पर होने का वर्णन शास्त्रों में मिलता है लेकिन यहां श्री बंशीधर जी शेषनाग के उपर कमलपुष्प पर विराजमान हैं, जबकि कमलपुष्प ब्रह्मा का आसन है. इस लिहाज से मान्यता है कि कमल पुष्पासीन श्री कृष्ण कमलासन ब्रह्मा के रूप में विराजमान हैं. भगवान श्रीकृष्ण स्वयं लक्ष्मीनाथ विष्णु के अवतार है इसलिये विष्णु के स्वरूप में विराजमान हैं. त्रिदेव के रूप में विराजमान भगवान सबकी मनोकामना पूरी करते हैं.

श्री बंशीधर नगर में प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण की जयंती जन्माष्टमी मथुरा एवं वृंदावन की तरह मनाई जाती है. इस मौके पर एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाता है जिससे श्री बंशीधर नगर सहित आस पास के गांवों का माहौल भक्तिमय हो जाता है.

 

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: