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गढ़वा: मथुरा एवं वृंदावन की तरह मनती है जन्माष्टमी, दूसरा वृंदावन है श्री बंशीधर नगर

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Dilip Kumar

Palamu / Garhwa: पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिले में मथुरा और वृंदावन की तरह जन्माष्टमी मनायी जाती है. गढ़वा के वंशीधर नगर (नगर उंटारी) को योगेश्वर कृष्ण की धरती मानी जाती है. वंशीधर मंदिर में स्वयं विराजमान श्रीकृष्ण की वंशीवादन करती प्रतिमा की ख्याति देश में ही नहीं बल्कि  विदेशों में भी है. इसलिए यह स्थान श्री बंशीधर धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है. यहां कण-कण में राधा व कृष्ण विद्यमान हैं.

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तीन राज्यों की सीमावर्ती इलाका है वंशीधर नगर

वंशीधर गंगा-जमुनी संस्कृति एवं धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत खूबसूरत हरी भरी वादियों, कंदराओं, पर्वतों, नदियों से आच्छादित है. उतरप्रदेश, छतीसगढ़ और बिहार तीन राज्यों की सीमाओं को यह इलाका स्पर्श करता है. तीनों राज्यों की मिश्रित संस्कृति को समेटे हुए है. श्री वंशीधर मंदिर की स्थापना 1885 में हुई है.

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मंदिर में स्थित प्रतिमा को देखने से होते हैं त्रिदेव के दर्शन 

श्री बंशीधर मंदिर के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों स्वरूप में हैं. मंदिर में स्थित प्रतिमा को गौर से देखने पर यहां भगवान के त्रिदेव के स्वरूप में विद्यमान रहने का अहसास होता है.

यहां स्थित श्री बंशीधरजी जटाधारी के रूप में दिखाई देते हैं. जबकि शास्त्रों में श्रीकृष्ण के खुले लट और घुंघराले बाल का वर्णन है. इस लिहाज से मान्यता है कि श्रीकृष्ण जटाधारी अर्थात देवाधिदेव महादेव के रूप में विराजमान हैं.

श्री बंशीधर में श्री कृष्ण कमलासन ब्रह्मा के रूप में विराजमान

गढ़वा: मथुरा एवं वृंदावन की तरह मनती है जन्माष्टमी, दूसरा वृंदावन है श्री बंशीधर नगर

श्रीकृष्ण के शेषशैय्या पर होने का वर्णन शास्त्रों में मिलता है, लेकिन यहां श्री बंशीधर जी शेषनाग के उपर कमलपुष्प पर विराजमान हैं, जबकि कमलपुष्प ब्रह्मा का आसन है. इस लिहाज से मान्यता है कि कमल पुष्पासीन श्री कृष्ण कमलासन ब्रह्मा के रूप में विराजमान हैं.

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं लक्ष्मीनाथ विष्णु के अवतार है, इसलिए विष्णु के स्वरूप में विराजमान हैं. वर्ष भर श्री बंशीधर मंदिर में दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेशी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है.

जो भी श्रद्धालु एक बार श्री बंशीधर जी की मोहिनी मूरत का दर्शन करता है, वह उनके प्रति मोहित हो जाता है. दर्शनार्थी के मुंह से बरबस अद्वितीय और अलौकिक शब्द निकल पड़ते हैं.

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स्वप्न में रानी को श्रीकृष्ण ने दिए दर्शन

श्री बंशीधर जी के आगमन के बारे में किवंदतियों के मुताबिक उस दौरान राजा स्व. भवानी सिंह देव की विधवा शिवमानी कुंवर राजकाज का संचालन कर रही थी. रानी शिवमानी कुंवर धर्मपरायण एवं भगवत भक्ति में पूर्ण निष्ठावान थी. बताया जाता है कि एक बार जन्माष्टमी व्रत किये रानी साहिबा को 14 अगस्त 1827 मध्य रात्रि में स्वप्न में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ.

स्वप्न में श्री कृष्ण ने रानी से वर मांगने को कहा. रानी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु आपकी सदैव कृपा हम पर रहे. तब भगवान कृष्ण ने रानी से कनहर नदी के किनारे महुअरिया के निकट शिव पहाड़ी अपनी प्रतिमा के गड़े होने की जानकारी दी और उन्हें अपने राज्य में लाने को कहा.

21 जनवरी 1828 स्थापित हुआ मंदिर

भगवत कृपा जान रानी ने शिवपहाड़ी जाकर विधिवत पूजा अर्चना के बाद खुदाई करायी तो श्री बंशीधर जी की अद्वितीय असाधारण प्रतिमा मिली, जिसे हाथियों पर बैठाकर श्री बंशीधर नगर लाया गया. गढ़ के मुख्य द्वार पर अंतिम हाथी बैठ गया.

लाख प्रयत्न के बावजूद हाथी नहीं उठने पर रानी ने राजपुरोहितों से राय मशविरा कर वहीं पर मंदिर का निर्माण कराया तथा वाराणसी से राधा रानी की अष्टधातु की प्रतिमा मंगाकर 21 जनवरी 1828 स्थापित करायी.

32 मन ठोस और शुद्ध सोने की है प्रतिमा

श्री बंशीधर जी प्रतिमा कला के दृष्टिकोण से अति सुंदर एवं अद्वितीय है. देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में 32 मन ठोस और शुद्ध सोने से बनी यह अकेली ऐसी प्रतिमा है. बिना किसी रसायन के प्रयोग या अन्य पॉलिस के प्रतिमा की चमक पूर्ववत है.

भगवान श्री कृष्ण शेषनाग पर कमल पीड़िका पर वंशीवादन नृत्य करते विराजमान हैं. भूगर्भ में गड़े होने के कारण शेषनाग दृष्टिगोचर नहीं होते हैं. महाशिवरात्रि एवं श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है. महाशिवरात्रि के मौके पर प्रसिद्ध मेला लगता है, जो एक माह तक चलता है तथा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के मौके पर एक सप्ताह तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जाता है, जिससे श्री बंशीधर नगर सहित आसपास के गांवों का माहौल भक्तिमय हो जाता है.

पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास

बंशीधर मंदिर श्रद्धा का तो केंद्र है ही, इसे पर्यटन स्थल के रूप में भी स्थापित करने की कोशिशें हो रही हैं. इसी क्रम में झारखंड सरकार ने दो बार यहां बंशीधर महोत्सव का आयोजन किया है. पहले महोत्सव के उद्घाटन के समय मुख्यमंत्री ने शहर का नाम नगर उंटारी से बदल कर बंशीधर नगर कर दिया था.

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