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नेहरू-गांधी परिवार की गणेश परिक्रमा में लगी कांग्रेस का उद्धार नामुमकिन  

Naveen Sharma

Ranchi :  कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी पार्टी की जो आज दुर्दशा है उस पर सचमुच तरस आता है. पार्टी की बदहाली के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार इसका शीर्ष नेतृत्व ही है. अब सवाल ये उठता है कि इतने बड़े जनाधार वाली पार्टी को क्यों कर अपने नेतृत्व के लिए बार-बार नेहरू-गांधी परिवार की ओर ही मुंह ताकना पड़ता है. कांग्रेस ने पिछले 25 वर्षों से अपना आला कमान सोनिया गांधी या फिर राहुल गांधी को ही बनाया हुआ है.

इसके साथ ही ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस पार्टी ने उदयपुर में हुए चिंतन शिविर के बाद अपना टास्क फोर्स 2024, पॉलिटिकल ग्रुप आदि बनाने की भी कवायद शुरू की है लेकिन इसमें वहीं तमाम पुराने चेहरे हैं जो पहले कांग्रेस कार्यसमिति का हिस्सा रहे हैं. यह एक तरह से ताश के पत्तों को फिर से फेंटने की तरह है जिससे कोई खास बदलाव संगठन में नहीं आनेवाला है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जब तक शीर्ष नेतृत्व में कोई डायनेमिक और विजनरी नेता नहीं लाया जायेगा तब तक कांग्रेस की किस्मत नहीं पलटनेवाली है.

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राहुल कमजोर नेता

19 जून, 1970 को राहुल गांधी का जन्म देश के राजनीतिक रूप से सबसे ताकतवर परिवार नेहरू गांधी परिवार में हुआ था. वे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पुत्र और इंदिरा गांधी के पोते होने की वजह से ही  2017 में राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे.

इसके बाद राहुल गांधी ने ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व किया था. इनके नेतृत्व में कांग्रेस की दुर्गति और ज्यादा हो गयी. देश की सबसे पुरानी पार्टी को लोकसभा में सिर्फ 54 सीटें ही मिली थीं.

इस मामले में सबसे मजेदार बात ये है कि इतनी दर्दशा के बाद भी कांग्रेस पार्टी परिवार के बाहर किसी अन्य ताकतवर नेता को नेतृत्व सौंपने को तैयार नहीं है. पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार ने कब्जा कर लिया है. सोनिया गांधी चाहती हैं कि पार्टी पर उनके परिवार का आधिपत्य बरकरार रहे. यही वजह है कि कभी राहुल गांधी, कभी सोनिया तो कभी प्रियंका गांधी का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए आगे किया जाता है.

जिसने भी नेतृत्व पर सवाल उठाये उसे पार्टी से बाहर किया

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से किसी ने भी नेहरू परिवार के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठाये. एक बार शरद पवार, पीएस संगमा और तारिक अनवर ने विरोध किया तो उनको पार्टी से निकाला गया तो उनको अपनी अलग पार्टी राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी NCP बनाने को मजबूर होना पड़ा.

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छिटपुट विरोध होता है पर दबा दिया जाता है

विकी लिक्स ने रिपोर्ट दी थी कि इमर्जेंसी के दौरान केरल कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष एके एंटनी ने संजय गांधी का विरोध करने का साहस करते हुए पूछा था कि उन्होंने पार्टी औऱ देश के लिए क्या योगदान किया है? आज भी हर एक ईमानदार और खुद को बड़ा नेता कहने और माननेवाले कांग्रेसियों को कम से कम यहीं सवाल तो राहुल गांधी से पूछना चाहिए कि आपने पार्टी और देश के लिए क्या किया है जो अगले चुनाव में पार्टी आपको प्रधानमंत्री की तरह प्रोजेक्ट करें. लेकिन अब इसमें दिक्कत है पहली कि ये सवाल पूछते ही पद हटना होगा.

कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार का विरोध करनेवाले लोगों में केवल एक व्यक्ति ही भाग्यवान रहे हैं और वो थे वीपी सिंह. उन्हें प्रधानमंत्री का पद नसीब हो गया था. शरद पवार और संगमा ने भी विरोध किया था लेकिन पवार साहब ने महज कुछ साल में ही हथियार डाल दिये और खुद कांग्रेस नेतृत्ववाली सप्रंग सरकार में मंत्री बने थे.

राहुल  राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं

वर्ष 2003 से राहुल गांधी ने भी राजनीति में रुचि लेनी शुरू की थी. वे सार्वजनिक समारोहों में अपनी मां सोनिया गांधी के साथ दिखाई देने लगे थे . 2004 में अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे. 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली. राहुल को 2007 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया. उन्हें युवा कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी.

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सिर्फ खानदानी विरासत का बल

कांग्रेसियों के लिए शायद इतना ही काफी है कि राहुल गांधी नेहरू-गांधी खानदान के हैं, लेकिन देश की 130 करोड़ की आबादी का नेतृत्व करने के लिए इतनी योग्यता काफी नहीं है. राहुल ने अपने अब तक के राजनीतिक करियर में कहीं से भी वो माद्दा नहीं दिखाया जो उन्हें देश की बागडोर सौंपने लायक बनाता हो.

खैर, इससे पहले भी इंदिरा गांधी को भी पीएम जवाहर लाल नेहरू की बेटी होने बेटी होने का लाभ मिला था. लेकिन इंदिरा ने धीरे-धीरे काफी कुछ सिखा था. पाकिस्तान के साथ युद्ध (बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम) में उनके व्यक्तित्व का एक सशक्त पक्ष सामने आया लेकिन उन्होंने सत्ता के मोह में आपातकाल लागू कर सब गुड़गोबर कर दिया.

इसके बाद राजीव गांधी को हम पर थोप दिया गया. जिस व्यक्ति की राजनीति में एकदम से रूचि नहीं हो उसे देश की बागडोर महज इसलिए सौंप दी गई क्योंकि नेहरू-गांधी परिवार इस देश को अपनी जागीर समझता है.  वैसे भी राहुल गांधी ने अपने करीब 20 वर्ष के राजनीतिक करियर में कई बार अपरिपक्वकता का परिचय दिया है.

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खराब प्रदर्शन के बाद भी सबक नहीं

वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में देश की सबसे पुरानी और सबसे विस्तृत क्षेत्र में पैठ रखने वाली पार्टी की भद पिट गई थी. यह चुनाव सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया था. इस दुर्गति की जिम्मेदारी लेकर इनको खुद ही इस्तीफा देकर नये लोगों को मौका देना चाहिए था.

मणिशंकर अय्यर का कबूलनामा

कांग्रेस पार्टी ने अपने सबसे बुरे दिन देख लिए हैं. ऐसे में अब कांग्रेसियों के पास नेहरू- गांधी परिवार के नेतृत्व का जुआ उतार फेंकने का अच्छा मौका था. कांग्रेस पार्टी में इस बात को लेकर सुगबुहाट भी शुरू हुई थी. वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने भी कहा है कि देश की राजनीति में हमारा स्थान घट रहा है. इसलिए कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव की जरूरत है. पार्टी को युवा महासचिवों की जरूरत है. वरिष्ठ नेताओं को कार्यसमिति में भेजा जाना चाहिए.

बदलाव की मांग और तेज और स्पष्ट होनी चाहिए

इधर कुछ वर्षों में एक बार फिर से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व बदलने की मांग गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, शशि थरूर सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने की है लेकिन ये लोग पार्टी में अल्पसंख्यक और शक्तिहीन बन कर रह गये हैं. इन्होंने पार्टी में एक गुट G-23 बना लिया है लेकिन नेतृत्व में बदलाव नहीं ला पाये हैं. समय की मांग है कि कांग्रेस को अगर अपना अस्तिव बचाना है औऱ एक मजबूत पार्टी के रूप में फिर से खुद को उभारना है तो ये कदम अनिवार्य रूप से उठाना होगा.

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प्रशांत किशोर को लाने की कवायद बेकार गयी

अभी हाल में कांग्रेस पार्टी ने अपने संगठन में बदलाव और पार्टी को मजबूत करने के लिए सुप्रसिद्ध चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भी बुलाया था. पीके ने अपना प्रजेंटेशन भी दिया था लेकिन पीके की बातों को पूरी तौर पर नहीं माना गया. खासकर शीर्ष नेतृत्व में बदलाव के उनके सुझाव की वजह से पीके को कांग्रेस ने पार्टी में शामिल नहीं किया.

राहुल गांधी जैसे अपरिपक्व, अयोग्य और हवाई नेता से छुटकारा पाने का ये सुनहरा मौका था. कांग्रेसियों में अब लगता है वो हिम्मत नहीं रही कि वे नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को पार्टी का नेतृत्व दें. वैसे लोकतंत्र की सेहत के लिए भी मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है. अगर कांग्रेस यह भूमिका निभाना चाहती है तो उसे नया नेता चुनना चाहिए था. राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से सबसे खुश तो पीएम नरेंद्र मोदी होंगे. अपनी सरकार की कई मोर्चों पर नाकामी के बाद भी 2024 में वो तीसरी बार खुद प्रधानमंत्री बनेंगे या फिर उनकी ही पार्टी का के योगी आदित्यनाथ कोई अन्य नेता देश की बागडोर संभालेगा.

आखिर कैसा हो हमारा नेता

वो जननेता हो, माटी से जुड़ा हो,  नीचे से ऊपर गया हो, जिसकी रीढ़ की हड्डी हो, खुद अपनी छवि बनाई हो, हमारे विशाल देश की समस्याओं को हल करने के लिए जिसके पास स्पष्ट दृष्टि हो, जो विजनरी हो. देश से गरीबी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार को दूर कर सके. बेतहाशा बढ़ती महंगाई से छुटकारा दिला सके. देश को विकास के पथ पर तेजी से आगे ले जा सके.  मौजूदा अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत को उसका महत्वपर्ण स्थान दिला सके जिससे हम भारतवासी गर्व से कह सकें कि हम भारतीय हैं.

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