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महिलाओं की भागीदारी के बिना विकास की कल्पना उसी तरह, जिस प्रकार किसी पक्षी का एक पंख से उड़ान भरने की कल्पना करना

Ranchi : कोई भी समाज महिलाओं की उपेक्षा करके आगे नहीं बढ़ सकता है. महिलाओं की भागीदारी के बिना विकास की कल्पना करना उसी तरह है जिस प्रकार किसी पंक्षी का एक पंख से उड़ान भरने की कल्पना करना. अमूमन भारतीय समाज को एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है. इस आवधारणा को बदलना होगा. हमें लोगों को सदाचार, नैतिकता एंड मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रयास करना होगा.

सीयूजे में जेंडर बायस एंड स्टीरियोटाइपिंग, जेंडर इक्वलिटी एंड विमेंस राईट विषय पर आयोजित वेबिनार में मुख्य अतिथि राज्यपाल द्रौपदी मूर्म ने उक्त बातें कहीं. इस वेबिनार का आयोजन सीयूजे के शिक्षा विभाग और यूजीसी के संयुक्त प्रयास से किया गया था.

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महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की प्रक्रिया ही महिला सशक्तीकरण

वेबिनार में एसएनडीटी विश्वविद्यालय, मुंबई की कुलपति प्रो शशिकला वंजारी ने कहा कि सशक्तीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सकता है. शिक्षित होने पर ही महिलाएं अपने स्तर को समाज में समझ सकती हैं और अपने आकलन के अनुसार समस्याओं के निदान में अपनी भूमिका निभा सकती हैं. उन्होंने शिक्षा जगत में हंसा मेहता, सावित्री बाई फुले, ज्योति बाई फुले, रमा बाई रानाडे आदि के योगदान को भी याद किया. उन्होंने कहा कि ज्ञान से मन का अंधकार दूर होता है. हमारे देश की सभी व्यवस्थाएं जेंडर इक्वलिटी पर बल देती हैं.

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महिला हित के कानून को अमल में लाने में सामाजिक सहयोग जरूरी

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की डीन डॉ संगीता लाहा ने भारतीय कानून के सन्दर्भ में महिलाओं की स्थिति की समीक्षा करते हुए कहा कि 1956 से ही हमारे देश में महिला अधिकारों से संबंधित अनेक कानून बनाये गये हैं. जिनमें  हिंदू विवाह अधिनियम, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, हिंदू द्त्तक ग्रहण एवं रख रखाव अधिनियम आदि महत्वपूर्ण हैं. इस अधिनियमों को अमल में लाने हेतु समाज का सहयोग जरूरी है. उन्होंने रजिस्ट्रेशन ऑफ मैरेज ऑफ एनआरआई हसबैंड बिल 2019 को यथाशीघ्र लोक सभा एवं राज्य सभा द्वारा अनुमोदित किये जाने पर बल दिया.

भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय, सोनीपत की कुलपति प्रो सुषमा यादव ने अपने विचारों को भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त करते हुए कहा कि वैदिक युग में स्त्री शिक्षा उच्चतम सीमा पर थी. जब से मानव ने यह मान लिया की युद्ध करना पुरुषों का काम है और घर पर रहना स्त्रियों का काम, तभी से ही जेंडर बायस की अवधारणा समाज में अस्तित्व में आ गयी है. यदि किसी राष्ट्र की शक्ति और विकास के भावों को पता करना हो तो वहां की स्त्री शक्ति के भावों को पता करना चाहिए. उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि महिलाएं सिर्फ आदि शक्ति ही नहीं आधी शक्ति भी हैं.

इस एक दिवसीय वेबिनार में डॉ शशि सिंह, परीक्षा नियंत्रक प्रभु देव कुरले, रजिस्ट्रार प्रोफेसर एसएल हरि कुमार,  शिक्षा विभाग के अध्यक्ष एवं डीन डॉ विमल किशोर, डॉ मानवी यादव,  विजय कुमार यादव, डॉ नीरा गौतम, डॉ मनोहर कुमार दास, एंजल नाग, डॉ शिल्पी राज आदि मौजूद थे. यह जानकारी विश्वविद्यालय के पीआरओ नरेंद्र कुमार ने दी.

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