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एक मशीन बनाने की सोच रहा हूं, जो ‘काले’ रंग की पहचान कर ‘टीं-टीं’ करे…

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Subhash Shekhar

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एक ऐसी मशीन हो जो काला रंग को आस-पास पाते ही बीप-बीप की आवाज करे. यह मशीन आज के समय में बन जाये तो सुरक्षा के लिहाज से बहुत काबयाब हो सकती है. काला रंग से बड़े-बड़े मंत्री और नेताओं को गोलियों और बमों से भी ज्यादा खतरा सताने लगा है. जानलेवा अटैक का डर हो तो वीवीआईपी अपनी सुरक्षा जेड प्लस कर लेते हैं, लेकिन डर काले रंग का हो तब यह जेड प्लस भी पिद्दी सी लगती है.

सरकार को काले रंग का डर

याद है न 15 नबंबर 2018 का झारखंड स्थापना दिवस का वह दिन. प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद रांची में पारा शिक्षकों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को काला झंडा दिखा दिया था. वही परिस्थितियां अब भी हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पलामू आ रहे हैं. पारा शिक्षकों ने विरोध का एलान कर दिया है. प्रशासन ने भी एहतियात के तौर पर काले रंग के जूता-मोजा समेत सभी तरह के परिधानों पर बैन लगा दिया है. अभी धनबाद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम में भी लोगों के काले परिधान उतरवा दिये गये.

काला रंग विरोध का प्रतीक

काला रंग विरोध का प्रतीक है. रंगों का इंसानी जीवन में बड़ा महत्वय है. हर रंग का अपना अलग मतलब होता है. हमले पढ़ा है और टीवी सीरियल्स में देखा भी है कि इतिहास में युद्ध के दौरान अलग-अलग रंगों के पताकों से ही सिग्नल देने का काम हो जाता था. युद्ध के दौरान किसी ने अगर सफेद झंडा लहरा दिया तो समझा जाता था, कि अगला शांति चाहता है और बातचीत करना चाहता है. कहने का मतलब यह है कि रंगों का इस्तेमाल हमेशा से ही शांतिपूर्ण कार्यों के लिए हुआ है.

अब भी वैसा ही हो रहा है. काले रंग का इस्तेमाल शांति पूर्ण आंदोलन के लिए किया जा रहा है तो क्या यह गलत है. आंदोलन करने वाले बल का तो प्रयोग नहीं कर रहे, कि उन्हें कुचलना सरकार के लिए जरूरी है. भारतीय इतिहास में आजादी का आंदोलन भी इस बात का गवाह रहा है कि शांतिपूर्ण आंदोलन को बल पूर्वक दबाया नहीं जा सकता है. जो गांधी जी को पूजते हैं और उनके अहिंसावादी प्रयासों की सराहना करते हैं, उन्हें आज के भारतीयों के शांतिपूर्ण आंदोलन से तकलीफ भी नहीं होनी चाहिए.

शुरूआत काले रंग की पहचान वाली मशीन से हुई थी. अब उसी बात से खत्म भी करते हैं. गोली बारुद को रोकने के लिए मशीन बनायी जा सकती हैं. मेटल डिटेक्टर का इस्तेमाल भी इसी तरह के काम के लिए किया जाता है. लेकिन क्या अहिंसात्मनक आंदोलन को क्या रोका जा सकता है, क्योंकि यह तो बापू का हथियार है, जो अचूक है. ऐसे ही गांधी जी ने देश को आजादी नहीं दिला पाये.

आज हम आजाद हैं. लेकिन क्या हम गांधी जी के आजाद देश में उन्हीं के हथियारों का इस्तेमाल नहीं कर सकते. सरकार और शासन बिना मांगे कुछ देती नहीं है. आंदोलन करें तो सुनती नहीं है. बात करके मुकर जाती है. अगर सरकार को ऐसे विरोध और आंदोलन से फजीहत का डर लगता है तो ऐसे मुद्दों पर गंभीरता पूर्वक समाधान करना चाहिए, क्योंकि पब्लिक सब जानती है.

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