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धनबाद में अवैध कोयला कारोबार और डीजीपी के तेवर

धनबाद में कोयला चोरी का धंधा चल रहा है

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Surjit Singh

धनबाद में अवैध कोयला का कारोबार चल रहा है. अगर इसपर रोक नहीं लगेगा, तो जिला के एसपी पर कार्रवाई होगी. 26 जुलाई को रांची से प्रकाशित सभी अखबारों में डीजीपी डीके पांडेय का यह बयान प्रकाशित हुआ है.

हिंदी दैनिक प्रभात खबर में डीजीपी धनबाद के एसएसपी से कड़े लहजे में कह रहे हैं कि तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम्हारी पोस्टिंग किसी नेता ने करायी है, कानून का इकबाल बुलंद करो.

हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में खबर है कि कोयला चोरी रोकें एसपी नहीं तो नपेंगेः डीजीपी

दैनिक भास्कर में भी खबर है कि डीजीपी ने धनबाद के एसएसपी से कहा कि कोयला से जुड़ी गैरकानूनी घटनाओं की शिकायतें मिल रही हैं.

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खबरें पढ़कर लगता है कि धनबाद में कोयला चोरी और अवैध कोयले का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है. डीजीपी डीके पांडेय इसे लेकर गुस्से में हैं. वह हर-हाल में ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाना चाहते हैं.

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सवाल यह उठ रहा है कि क्या डीजीपी को अब पता चल रहा है कि धनबाद में अवैध कोयला का कारोबार चल रहा है. क्या इससे पहले डीजीपी को इसकी सूचना नहीं मिली थी. पुलिस विभाग का सीआईडी (अपराध अनुसंधान विभाग), जो इस तरह के अपराध पर नजर रखता है. वह क्या कर रहा है. क्या उनके सूचना तंत्र ने काम करना बंद कर दिया है.

या कहीं ऐसा तो नहीं कि जब अवैध कोयला कारोबार की चर्चा खुलेआम होने लगी है, तब डीजीपी इस तरह के तेवर दिखा रहे हैं.

याद करें, सात मार्च 2018 को न्यूज विंग ने एक खबर प्रकाशित किया था. जिसमें यह कहा गया था कि धनबाद में कोयला का अवैध कारोबार तो चल ही रहा है. पश्चिम बंगाल से कोयला चोरी करके भी धनबाद में ही एकत्र किया जाता है. फिर उसे ईंट-भट्ठों में या बनारस की मंडियों तक पहुंचाया जाता है. इस खबर पर धनबाद पुलिस तो चुप ही रही. पुलिस मुख्यालय ने भी चुप्पी ही साधी रखी थी.

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न्यूज विंग की खबर के नौ दिन बाद 16 मार्च को राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास धनबाद गये थे. उन्होंने सार्वजनिक रुप से धनबाद के एसएसपी मनोज रतन चौथे को फटकार लगायी थी. सीएम ने कहा था कि 24 घंटे के भीतर कोयला चोरी रोकें. बेईमान थानेदारों को हटायें. इसके बाद भी कुछ नहीं हुआ.

संभव है, न्यूज विंग में प्रकाशित खबर डीजीपी डीके पांडेय तक नहीं पहुंची होगी. सीआईडी की पुस्तकालय शाखा और पुलिस मुख्यालय का मीडिया सेल ने इस पर ध्यान नहीं दिया होगा. पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने धनबाद में जो कहा था, वह भी डीजीपी को पता नहीं चला होगा, यह संभव नहीं है. और अगर पुलिस मुख्यालय को धनबाद में चल रहे अवैध कोयला कोरोबार की जानकारी थी, तो निश्चित रुप से मुख्यालय ने धनबाद के एसएसपी को इसे रोकने का निर्देश दिया होगा. पर अभी जो हालात हैं, उससे तो यही लगता है कि अवैध कोयला कारोबार को रोकने की कोशिश नहीं हुई. फिर पुलिस मुख्यालय ने सीआईडी की टीम को वहां भेजकर छापेमारी क्यों नहीं करायी. क्यों सीआईडी ने अपने स्तर से यह नहीं की. कहीं ऐसा तो नहीं सबको पता था और अब धनबाद के एसपी को जिम्मेदारी डालकर अपनी गर्दन बचाने की कोशिश की जा रही है.

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दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर में एक और सूचना है. डीजीपी ने सभी जिलों के एसपी से कहा है कि अखबारों में अपराध की जो खबरें छपती हैं, उसकी कटिंग पुलिस मुख्यालय में भेजें. अब इसे क्या कहा जाये. यह काम तो सीआईडी की पुस्तकालय शाखा की है. पुस्तकालय शाखा कर क्या रहा है. यह शाखा काम भी कर रहा है या नहीं. जिलों में अपराध से संबंधित जो कुछ भी होता है, उसकी एक रिपोर्ट हर दिन सीआईडी को भेजी जाती है. उस रिपोर्ट पर सीआईडी कुछ काम करता भी है या नहीं. रिपोर्ट में ऐसी-ऐसी जानकारियां होती हैं, जिसपर अगर सीआईडी के एडीजी के स्तर से जिलों से सूचना मांगी जाये, तो पुलिस का सिस्टम अपने आप काम करने लगेगा. लेकिन रेजी डुंगडुंग के बाद शायद ही सीआईडी के किसी एडीजी ने यह काम किया होगा. एक पुलिस अधिकारी ने सवाल उठाया कि अखबारों की कटिंग जिलों के एसपी से मांगने के बजाय डीजीपी को यह सूचना पास में बैठे सीआईडी एडीजी से मांगनी चाहिए थी.

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अब बात करते हैं, धनबाद के एसएसपी की. प्रभात खबर में जो खबर है, उससे यही लगता है कि धनबाद के एसएसपी से जिला नहीं संभल पा रहा है. वैसे भी सूचना है कि धनबाद के पुलिस अधिकारी या तो डरे-सहमे हुए हैं या फिर मिले हुए हैं. यह हालात कैसे बन गये. इसे ऐसे समझा जा सकता है. आईपीएस 14 साल की नौकरी तक एसपी रैंक में काम करते हैं. 13 साल की नौकरी पूरी करने पर उन्हें सीनियर सेलेक्शन ग्रेड मिलता है. यह परंपरा रही है कि किसी जिला में एसएसपी के रैंक में एसपी रैंक के सीनियर अफसरों की पोस्टिंग की जाती है. करीब 12 साल की नौकरी करने के बाद. क्योंकि तब तक वह कई जिलों में एसपी के रुप में काम कर चुके हैं. उन्हें 10 साल तक फिल्ड में काम करने का अनुभव होता है. एक और तथ्य यह होता है कि एसएसपी के अंदर दो आईपीएस काम करते हैं. सिटी एसपी व ग्रामीण एसपी के रुप में. ऐसे में अगर 12 साल की नौकरी कर चुके आईपीएस की पोस्टिंग एसएसपी के पद पर होती है, तो सिटी व ग्रामीण एसपी के पद पर नौ साल तक नौकरी कर चुके अफसर को पदस्थापित करने में दिक्कत नहीं होती.

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अपने डीजीपी के कार्यकाल में डीके पांडेय ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया. वर्ष 2016 में वर्ष 2010 के आईपीएस सुरेंद्र कुमार झा को धनबाद का एसएसपी बना दिया. वह जिला नहीं संभाल सके. उनके बाद मनोज रतन चौथे को एसएसपी बना दिया गया. वह भी वर्ष 2010 बैच के ही हैं. जिस वक्त एसएसपी बनाये गये, उस वक्त उनकी नौकरी को सिर्फ छह साल ही हुआ था. फिल्ड में ड्यूटी तो सिर्फ चार साल. अनुभव के नाम पर कुछ दिन के लिए रांची के सिटी एसपी के पद पर और कुछ दिन के लिए लोहरदगा के एसपी के पद पर. फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह एक अनुभवी अफसर की तरह काम करेंगे. दबाव में नहीं आयेंगे.

यहां उल्लेखनीय है कि जिस वक्त सुरेंद्र कुमार झा और उनके बाद मनोज रतन चौथे को धनबाद का एसएसपी बनाया गया था. उस वक्त उनसे सीनियर आईपीएस भी उपलब्ध थे, जिन्हें लंबे समय तक संटिंग में रखा गया. यह अपने आप में बड़ा सवाल है कि एसपी रैंक के सीनियर अफसरों के रहते हुए उस वक्त जूनियर आईपीएस की पोस्टिंग सीनियर पदों पर क्यों, किसके दवाब में और किस उद्देश्य से किया गया था. क्या इसलिए ऐसा किया गया कि वह जैसे बोलेंगे, वैसा करेंगे. क्योंकि उसे समय से पहले और उम्मीद से ज्यादा दिया गया था.

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