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IL & FS संकट: सरकार क्यों कर रही जल्दबाजी ?

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Mukesh Asim

अगस्त-सितंबर महीने के घटनाक्रम, जिसे कई आर्थिक जानकार शुरू से ही भारत का लीमैन ब्रदर्स मान रहे थे, को शुरू में पर्दे के पीछे से ही एलआईसी व एसबीआई के जरिये संभालने के प्रयास और प्रकट में किसी वित्तीय संकट से इंकार करते रहने के बाद आखिर केंद्र सरकार ने आईएलएफएस समूह को अपने नियंत्रण में ले लिया. उसने कंपनी के निदेशक बोर्ड को भंग कर देश के सबसे अमीर वित्तीय पूंजीपति उदय कोटक सहित 6 सदस्यों का एक नया बोर्ड बनाया है. जो इस संकट को फौरी तौर पर संभालने और फिर इसके स्थाई बंदोबस्त की ज़िम्मेदारी संभालेगा. सरकारी बयान के मुताबिक, आईएलएफ़एस देश की वित्तीय व्यवस्था व स्थिरता के लिए एक बड़ी अहम संस्था है. जिसमें संकट पूरी वित्तीय व्यवस्था को संकट में ला सकता है.

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आईएलएफ़एस मामले में सरकार के निर्णय क्या बताते हैं? यही कि वह अपनी और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों की तिजोरी का मुंह सरमायेदारों के लिए खोल देगी. ताकि उन्हें सस्ती दरों पर पूंजी हासिल हो सके और उनके भुगतान वादों में कोई रुकावट न आने पाये. दूसरे, उदय कोटक के नेतृत्व में संकट को संभालने की ज़िम्मेदारी देने से यह स्पष्ट है कि पहले तो सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा उपलब्ध कराई गई, पूंजी से संकट को संभाला जाएगा. फिर इसकी संपत्तियां संकट के नाम पर कौड़ियों के दाम निजी क्षेत्र को सौंप दी जाएंगी. इसकी यातायात क्षेत्र की सहायक कंपनी पहले ही अपनी संपत्तियां बेचने के लिए बाजार में है.

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इसकी सलाहकार एसबीआई कैप्स ने इसे 6 योजनाएं बंद कर देने और 10 को बेचने का सुझाव दिया है. यह अपनी वित्तीय सेवा और ऊर्जा क्षेत्र की सहायक कंपनियां भी बेचकर नकदी जुटाने का प्रयास कर रही है. 2009 में सत्यम मामले में हम यह सब होते देख चुके हैं. तीसरे, आईएलएफ़एस को दिवालिया बनाने, इसका फायदा उठाकर मुनाफा कमाने वाले निजी पूंजीपति और पूंजीपतियों से मिलीभगत कर फायदा पहुंचाने वाले प्रबंधक सबको इसकी कोई सजा नहीं मिलेगी, ना ही मुनाफा कमाने वालों से कोई वसूली की जाएगी.

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यही पूंजीवादी राजसत्ता का वर्ग चरित्र है- कभी आम लोगों की दुख-तकलीफ में इतनी जल्द मामला संभाल लेने का आश्वासन देते या निर्णायक कदम उठाते देखा गया है? तब हमेशा धन के अभाव का रोना शुरू हो जाता है. नोटबंदी के वक्त नकदी की कमी से जूझते लोगों का मज़ाक उड़ाते मोदी याद है ना! यह घटनाक्रम 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद संकट के जिम्मेदार बैंकों और उनके मालिकों/प्रबंधकों के बारे में अमेरिका में चलन में आई कहावत– ‘टू बिग टू फेल, टू बिग टू जेल’ की याद फिर ताजा कर रहा है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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