Opinion

कोरोना पर WHO की चेतावनी को नजरअंदाज करने का मतलब आग से खेलने के बराबर

Faisal Anurag

भारत के लिए अगले दो सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण हैं. एशिया में नोबल करोना वायरस के प्रसार की गति यूरोप से भवाह हो सकती है, क्योंकि सांस्कृति लोक व्यवहार यूरोप से अलग है. भारत में लॉकडाउन से जितनी डिस्टेंसिंग की उम्मीद थी, उसे लेकर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है. भारत के तमाम बड़े डॉक्टर एकसाथ लॉकडाउन के समय को और बढ़ाने का सुझाव दे रहे हैं.

फोर्टीज अस्पताल के निदेशक डॉ अशोक सेठ जानेमाने डॉक्टर हैं. उन्होंने सरकार को सुझाव दिया है कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन समाप्त नहीं किया जाना चाहिए. डॉ सेठ के अनुसार, लॉकडाउन के बावजूद भारत में मरीजों की संख्या की बढोत्तरी ये बताती है कि उसका अखिल भारतीय रूप उभर आया है.

advt

ग्रामीण इलाकों में भी इसका असर दिख रहा है. बिहार के सीवान जिले में जिस तरह कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वह चिंता का विषय है. इस समय भारत के विभिन्न राज्यों के 38 जिले करोना वायरस के सघन केंद्र की तरह दिख रहे हैं. इसी तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सारेने ने रांची के चिकित्सकों से बात की है. बैठक में आये चिकित्सकों ने भी लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने और इसे पूरे स्प्रीट में अमल में लाने का सुझान दिया है.

इसे भी पढ़ें – #CoronaCrisis: कॉलेजों के बंद होने से 985 अनुबंधित असिस्टेंट प्रोफेसर की सैलेरी पर मंडरा रहा संकट

ओडिशा ने तत्वरित कदम उठाते हुए राज्य में लॉकडाउन की अवधि को 30 अप्रैल तक बढ़ा दिया है. आडिशा के मुख्यमंत्री ने केंद्र से भी लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने का सुझाव दिया है. राजस्थान, पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने भी केंद्र से इसी आशय का आग्रह किया है.

चीन के वुहान शहर में करोना के असर के बहुत देर बाद तक भारत ने इस तथ्य का आकलन करने में कोताही किया कि उसका वैश्विक असर भी हो सकता है. अमेरिका भी इस लापरवाही का शिकार साबित हुआ है. भारत के लिए तमाम स्वस्थ्य विशेषज्ञ लगातार चिंता प्रकट कर रहे हैं.

adv

जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीव हांके ने भारत को लेकर अपनी चिंता प्रकट की है. प्रो. जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी का चिकित्सा शोध के क्षेत्र में बड़ा रसूख रखते हैं. हालांकि प्रो स्टीव अप्लयड पढाते हैं, लेकिन चिकित्सा शोधाकर्मियों के कार्यो पर गहरी नजर रखते हैं.

उन्होंने भारत में टेस्टिंग की संख्या और गति को लेकर चिंता प्रकट किया है और साथ ही यह भी कहा है कि भारत को इटली की पुनरावृति नहीं करनी चाहिए. डब्लूएचओ का भी सुझाव यही है कि नोबल कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने के लिए टेस्टिंग को फोसक करना चाहिए.

भारत का संकट थोडा अलग है. तब्लीगी जमात की परिघटना के बाद जिस तरह पूरे देश में सांप्रदायिक  नफरत का चौतरफा विस्तार हुआ है. इसने बहस की मूल दिशा को ही बदल दिया है. नफरत का आलम तो यह है कि कई शहरों में उन चिकित्सकों का भी अपमान किेया जा रहा है, जो इस वायरस के अग्रिम पंक्ति पर मुकाबला कर रहा है.

यह सिर्फ महामारी का भय नहीं है, बल्कि एकतरह से उस अज्ञान का भी प्रदर्शन है, जो लोगों के मन मे मौजूद है. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में तरह-तरह के अफवाहों का दौर है. जिस तरह मीडिया के एक हिस्से ने सामाजिक तानेबाने में जहर घोला है, वह कोरोना वायरस के खिलाफ जंग को कमजोर ही कर रहा है. दरअसल उन व्यापक तस्वीरों से कोई सरोकार नहीं रखा जा रहा है, जो वास्तविकता है.

इसे भी पढ़ें – #FightAgainsrCorona : पुलिसकर्मियों के 50 लाख के बीमा को लेकर आइजी मुख्यालय ने सरकार को लिखा पत्र

भारत के सामाजिक तानेबाने के नजरिये से यह बेहद पेचीदा सवाल है. तमाम चेतावनियों के बाद अफवाह फैलाये जा रहे हैं और चिकित्साकर्मियों के सवालों को भी गौण किया जा रहा है. मध्यप्रदेश में तो कई चिकिस्किों ने अपनी कारों को ही आवास बना रखा है.

एक मजबूत सामाजिक तानेबाने वाला देश ज्यादा मजबूती से किसी भी संकट का मुकाबला कर सकता है. अफवाहों के फैक्ट चेक का बड़ा दायित्व सरकारों का ही है. राजनीतिज्ञों को इस खतरे के खिलाफ मुखर होने की जरूरत है. भारत वैसे भी सामाजिक सवालों पर बेहद संवेदनशील देश माना जाता है.

प्रवासी मजदूर भी जब अपने कार्यस्थलों से अपने घरों की ओर कूच कर रहे थे, तब भी एक खास तरह का रूझान देखने को मिला था. संकटों को दूसरे पर धकेल देने की प्रवृति हमेशा घातक होती है. उन मजदूरों के हालातों को लेकर चर्चा कम हो रही है.

जबकि अब भी खबरें आ रही हैं कि उनकी परेशानियां कम नहीं हो पा रही हैं. मदद को भी राजनीतिक लाभ से देखने वाले लोगों को समझना चाहिए कि उन नागरिकों के सवालों को इस तरह इस संकट में हल नहीं किया जा सकता है.

कई राज्य सरकारों ने लोगों तक राहत देने में मामले में माइलस्टोन स्थापित किया है. इसमें केरल सबसे आगे है. केरल ने वायरस के खिलाफ और उसके प्रभाव को झेल रहे लोगों के लिए वालंटियरों की मदद से जिस तरह के राहत केंद्र खोले हैं, उसकी चर्चा केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दिये हलफनामें में भी किया है.

लॉकडाउन के बाद की दुनिया इन श्रमिकों के लिए आसान नहीं होने जा रही है. लॉकडाउन की अवधि को लेकर जो संशय बना हुआ है, उसे तत्काल दूर किये जाने की जरूरत है और इन श्रमिकों के लिए पैकेज घोषित किये जाने की जरूरत है.

भारत सरकार से तो भारत की इंडस्ट्री के दो संस्थानों ने भी राहत पैकैज मांगी है. भारत की कई कंपनियों ने अपने कर्मचारियों का वेतन इस अवधि में कम कर कर्मचारियों को सांसत में डाल दिया है. असंगठित क्षेत्र की स्थिति को गंभीरता से लेने की जरूरत है. WHO  की इस चेतावनी को किसी को नज़रअंदाज़ नही करना चाहिए कि कोरोना पर सियासत आग से खेलना है.

इसे भी पढ़ें – #Lockdown: एक महीने में झारखंड को 15000 करोड़ के नुकसान का अनुमान

advt
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button