Opinion

कांग्रेस के भीतर उठ रहे नेतृत्व के सवाल को नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है

Faisal Anurag

कांग्रेस के ही कुछ नेता यदि पार्टी में नेतृत्व के उलझन को ले कर सवाल उठा रहे हैं, तो उसकी गंभीरता को खारिज नहीं किया जा सकता. शशि थरूर कांग्रेस के महत्वपूर्ण सांसद हैं ओर बौद्धिक दुनिया में उनकी अपनी साख है. उन्होंने कांग्रेस की वर्तमान हालत पर गहरी चिंता प्रकट की है. थरूर अकेले नहीं हैं जो इस तरह का सवाल उठा रहे हैं.

लोकसभा चुनाव के बाद से ही ऐसे हालात कांग्रेस में पैदा हुए हैं जहां पार्टी न केवल विवश बल्कि नेतृत्वविहीन दिख रही है. सेनिया गांधी को अंतरिक अध्यक्ष तो बना दिया गया लेकिन अपने स्वास्थ्य संबंधी कारणों के कारण वह कांग्रेस में जान नहीं फूंक पायी है.

हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद दो राज्यों में कांग्रेस साझा सरकार तो बना सकी है, लेकिन सरकारों के गठन में उससे ज्यादा भूमिका उसके पार्टनर दलों की ही रही है.

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लोकसभा चुनाव के बाद हुए चुनावों के मैदान में जिस तरह पार्टी दिखी है, उससे थरूर जैसे अनेक नेता सवाल उठा रहे है. थरूर पार्टी में अकेले नहीं हैं, लेकिन पार्टी पर काबिज सीनियर नेताओं ने ही ऐसी स्थिति बना रखी है कि कांग्रेस वास्तविक विपक्ष की भूमिका निभाने पाने में असफल साबित हो रही है.

लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस हार गयी हो, लेकिन राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी के फ्रंट लाइन से अगुवाई की थी, और कांग्रेस ने चुनावी घोषणा पत्र बनाने की जो कवायद की थी, उसने भी उम्मीद पैदा किया था. और पार्टी में युवा नेतृत्व दस्तक से राजनीति में नये दौर की बात की जाने लगी थी.

लेकिन पार्टी की दूसरी बड़ी पराजय के बाद राहुल गांधी ने न केवल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया बल्कि किसी गैर-गांधी को पार्टी का नेतृत्व देने पर जोर दिया.

समस्या की शुरुआत तो यहीं से हुई जब किसी युवा नेतृत्व की संभावनाओं को सीनियरों के राजनीतिक छल ने रोक दिया. और अपने को टिकाये रखने के लिए सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनने को तैयार कर लिया. कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है और 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए उसने कोई ठोस बदलाव अपने भीतर नहीं किया है. असली समस्या तो यही है.

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कांग्रेस का एक धड़ा तो यह सोच भी नहीं पाता है कि बिना गांधी-नेहरू परिवार के कोई भी पार्टी को एक रख पायेगा. सीताराम केसरी के जमाने में जिस तरह पार्टी में बिखराव हुआ था, उन कारणों की समीक्षा किये बगैर पार्टी के बड़े तबके ने मान लिया कि कांग्रेस किसी नये प्रयोग के लिए तैयार नहीं है.

सोनिया गांधी ने न केवल कांग्रेस को पुनर्जीवन दिया था बल्कि एक को छोड़ तमाम बिखरे धड़े को एकजुट कर पार्टी को 2004 और 2009 के चुनावों में सत्ता तक पहुंचा दिया था.

श्रीमती गांधी की मेहनत और गठबंधन राजनीति तथा प्रधानमंत्री पद पर गैर गांधी के प्रयोग ने कांग्रेस को उत्साह दिया. लेकिन 2009 के चुनावों के बाद से जो हालात बदले हैं उसमें कांग्रेस पुराने समीकरणों और फार्मुले से राजनीतिक तौर पर कारगर नहीं दिख रही है.

गुजरात, मध्यपद्रेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में राहुल गांधी ने अपनी मेहनत और नये तौर तरीकों से तीन राज्यों में सत्ता से भाजपा को बेदखल किया और गुजरात में बेहतर प्रदर्शन किया. उन राज्यों में जिस तरह के समीकरण बनाये गये उससे उत्साहित कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में नये प्रयोग किये.

जैसा कि राहुल गांधी ने ही चुनाव की हार के बाद कहा वे मैदान में अकेले लड़ने के लिए छोड़ दिये गये.

उनका आरोप निश्चित तौर पर पार्टी के उन सीनियर नेताओं पर ही था जो सत्ता की मलाई तो खाना चाहते हैं लेकिन पार्टी को कारगर भूमिका के लिए तैयार करने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहते. विपक्ष को जिस साहस और तकनीक की जरूरत है वह इन नेताओं में नहीं दिखती हैं.

प्रियंका गांधी जरूर अलग अंदाज में उत्तर प्रदेश में लगी हुई हैं, और इसका लाभ भी कांग्रेस को मिल रहा है.

जिस तरह प्रियंका योगी सरकार के दमन के खिलाफ आवाज उठाती हैं, वह कांग्रेस की राजनीति में बिल्कुल अलग कहानी है. लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी को ले कर भी कांग्रेसजनों में अनेक सवाल हैं. राहुल ने जरूर कुछ तीखे बयान दिये हैं लेकिन एक मजबूत विपक्ष की आवाज संगठित करने के नजरिए से बिल्कुल नाकामयाब साबित हो रहे हैं.

देश में जिस तरह विभिन्न मोरचे मोदी सरकार के खिल जनांदोलन खड़ा किये हुए हैं, उसमें कांग्रेस पूरी तरह अनुपस्थित है. छात्र और नौजवानों के साथ महिलाओं ने अपने अकेले के दम पर देश के राजनीतिक व्यकरण में संघर्ष के नये मुहावरे गढ़े हैं. विपक्ष के तौर पर यदि कांग्रेस इस स्वर को नहीं सुन पा रही है तो अनेक नेताओं का निराश होना असामान्य नहीं है.

थरूर के बयान को इसी संदर्भ में समझा और देखा जाना चाहिए. कांग्रेस के एक और बड़े नेता जयराम रमेश ने सीएए विरोधी आंदोलनों से दूरी की बात की है.

इससे जाहिर होता है कि कांग्रेस के भीतर संवाद की प्रक्रिया तक बाधित है. कांग्रेस की उम्मीद दिख रहे सिंधिंया और पायलट जैसे नेता यदि असहज हैं, तो इसे लंबे समय तक नजरअंदाज करना पार्टी के लिए खतरनाक ही है.

भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कांग्रेस इस तरह की हालत और नेतृत्व के असमंजस में नहीं कर सकी है.  कांग्रेस का संकट तो यह भी है कि वह अपने पुराने विचारों पर भी दृढता नहीं दिखा पा रही है. मुद्दो पर साफ्ट रुख को ले कर पार्टी की विभिन्न कतारों में ही असंतोष है.

राजनीतिक पहिरदृश्य में अनेक युवा नेता आमजन की आवाज बुलंद करने की पहचान बना रहे हैं. इन नेताओं ने वास्तविक विपक्ष की भूमिका में मीलों आगे का सफर तय कर लिया है. इस पूरे परिप्रेक्ष्य में देखें तो थरूर की बातों को हल्के में लेना आत्ममघाती साबित हो सकता है.

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