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यहां मां को मुकट चढ़ाना है, तो करना होगा 40 साल इंतजार

हर साल दुर्गापूजा में एक भक्त को मिल पाता है मुकुट चढ़ाने का मौका

Jharkhand Rai

Chatra : चतरा शहर से 49 किमी दूर मयूरहंड प्रखंड में एक दुर्गा मंदिर में एक अनोखी रस्म अदा होती है. मां दुर्गा को मुकुट चढ़ाने की रस्म. यह रस्म अनोखी इसलिए है, क्योंकि यहां मां दुर्गा को मुकुट चढ़ाने के लिए भक्तों को पहले से ही बुकिंग करानी पड़ती है. हाल यह है कि हर साल दुर्गा पूजा के दौरान एक भक्त को मां को मुकुट चढ़ाने का मौका मिलता है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अभी इस मंदिर में मां दुर्गा को मुकुट चढ़ाने के लिए अगले 40 साल, यानी वर्ष 2060 तक के लिए बुकिंग फुल है. यानी, अगर आप भी यहां मां दुर्गा को मुकुट चढ़ाकर आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको अगले 40 साल तक इंतजार करना पड़ेगा.

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भक्त की सभी इच्छाएं पूरी करती हैं मां, ऐसी है मान्यता

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में मां दुर्गा को मुकुट चढ़ानेवाले भक्त की सभी इच्छाओं को मां पूरा कर देती हैं. अगर कोई अपनी बारी आने से पहले मर जाता है, तो उसके परिवार के सदस्यों को यह रस्म अदा करनी पड़ती है. पिछले वर्ष भुवनेश्वर प्रजापति वह भाग्यशाली व्यक्ति रहे, जिन्हें यहां मां को मुकुट चढ़ाने का अवसर मिला. इस साल चतरा निवासी व्यवसायी अनंत कुमार सिन्हा ने अपने पिता बलदेव प्रसाद सिन्हा की मन्नत पूरी की, जो उन्होंने 1996 में मांगी थी. उन्होंने बताया कि स्लॉट बुकिंग कराने के बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी. उसके बाद इस साल उनकी बारी आयी.

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70 साल पहले शुरू हुई प्रथा

पूजा समिति के अध्यक्ष अश्विनी सिंह ने कहा, “यह प्रथा 70 साल पहले शुरू हुई थी और तब से भक्तों के बीच एक मौका पाने की होड़ शुरू हो गयी. समिति ने तब नवरात्रि से पहले हर साल एक विशेष बैठक के दौरान बुकिंग शुरू की. हमारे पास ऐसे लोगों की एक लंबी सूची है, जो मौका पाने की इच्छा रखते हैं.” उन्होंने बताया कि इस वर्ष तीन व्यक्तियों- अशोक सिंह, गोकुल नंदन और श्रवण कुमार सिंह ने इस मंदिर में मां को मुकुट चढ़ाने की इच्छा जतायी, जिन्हें 2058, 2059 और 2060 के लिए स्लॉट आवंटित किये गये हैं.

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मुकुट बनाने के लिए बंगाल से आते कलाकार, भक्त वहन करते हैं खर्च

अश्विनी सिंह ने बताया कि मां को चढ़ाये जानेवाले मुकुट की कीमत भक्तों द्वारा वहन की जाती है. उन्होंने बताया कि मुकुट बनानेवाले कारीगर पश्चिम बंगाल से आते हैं और प्रत्येक पर लगभग 20 हजार रुपये का खर्च आता है. पूजा समिति के सदस्य एक विशेष वर्ष में चुने हुए भक्त के घर जाते हैं और मुकुट बनाने और उसके भुगतान की औपचारिकताएं शुरू करते हैं. उसके बाद वहां से मुकुट को एक जुलूस के रूप में पूजा पंडाल में लाया जाता है.

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