Opinion

अगर कहीं वोटिंग हो तो झारखंड की ऊंचाई पर स्थित झुमरा पहाड़ के पोलिंग स्टेशन जैसी हो

Divy Khare

वोट का महत्त्व जानना है तो झुमरा पहाड़ पर रहने वाले यहां के निवासियों से जानिये. जिन्होंने आतंक के साए को बहुत करीब से देखा है या यूं कहिये कि उसी में जिये हैं ये लोग.

झारखंड के ऊंचे स्थान में से एक स्थित मतदान केंद्र, माओवाद प्रभावित झुमरा पहाड़ पोलिंग बूथ नंबर 44 में लोगों ने इस लोकतांत्रिक प्रणाली में बिना नक्सलवादियों से डरे जमकर मतदान किया. उनको इस बार शायद इस बात का एहसास था कि उनके कीमती वोट से ही सरकार बनेगी और वही सरकार उनके इलाके में विकास करेगी. उनके अंदर एक अलग सी ‘डर के आगे जीत’ वाला जुनून था.

Catalyst IAS
ram janam hospital

झुमरा पहाड़, राज्य के सबसे कठिन इलाकों में से एक इलाका है. यहां प्रशासन के लिए शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव कराना हमेशा एक चुनौती बना रहता है. पिछले बार की तरह इस बार भी पोलिंग एजेंट हेलिकॉप्टरों से उतारे गए और सीआरपीएफ ने कड़ी सुरक्षा प्रदान की.

The Royal’s
Sanjeevani
Pushpanjali
Pitambara

इसे भी पढ़ेंःलॉ छात्रा गैंगरेप मामला, कोर्ट में आज चार्जशीट दाखिल करेगी पुलिस

बोकारो के डीसी मुकेश कुमार ने दिन भर अपनी नजर झुमरा पहाड़ पर गड़ाये रखी. अन्य प्रशासनिक पदाधिकारियों का भी प्रयास काम आया. गोमिया विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के तहत झुमरा मतदान केंद्र में 72.54 प्रतिशत मतदान हुआ.

जो गोमिया विधानसभा के अन्य 340 मतदान केंद्रों की तुलना में काफी बढ़िया है. झुमरा निवासियों ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए नक्सल अब इतिहास बन चुका है.
वे अपने भविष्य को मुख्यधारा में देखते हैं जहां विकास की बात होती हैं.

जमनीजारा गांव के सबसे पुराने मतदाता श्याम लाल महतो ने कहा कि “मैंने क्षेत्र के विकास के लिए मतदान किया. और दूसरे लोगों को भी कहा है”. इनकी उम्र गांव वालों के कहे अनुसार 100 साल होने की उम्मीद है.

झुमरा पहाड़ पोलिंग बूथ समुद्र तल से लगभग 2,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जो घने जंगलों से घिरा हुआ है. यह सबसे कठिन इलाका है. ठंड भी अन्य इलाक़ों के तुलना में ज्यादा पड़ती है.

एक पोलिंग एजेंट ने कहा, “इस कंपकंपाती ठंड में महिलाओं और पुरुषों ने बड़ी उत्साह के साथ मतदान किया. वे बहुत सकारात्मक थे.” इस अच्छे मतदान का श्रेय बूथ स्तर की अधिकारी (BLO) आरती कुमारी को जाता है, जो मतदान केंद्र पर अपना वोट डालने वाली पहली मतदाता भी थीं.

उनके बाद झुमरा की 26 वर्षीय कमली देवी ने वोट किया. आरती कुमारी ने कहा कि प्रशासन द्वारा किए गए SWEEP अभियान ने वोट के महत्व के बारे में निवासियों को संवेदनशील बनाने में मदद की.

इसे भी पढ़ेंःव्हिप का उल्लंघन कर #IIM के कॉन्फ्रेंस में पहुंचे BJP सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी

उन्होंने कहा, “पहाड़ी इलाकों के जंगलों के बीच पगडंडियों पर लगभग पांच किलोमीटर से पैदल चलकर आने वाली महिलाओं को देखकर मैं अभिभूत हूं”

लगभग एक दशक पहले झुमरा माओवादियों के कैंपों, नक्सली हिंसा और मुठभेड़ों के लिए बदनाम था और अभी भी इसे हाइपरसेंसिटिव के रूप में चिह्नित किया जाता है.

गोमिया और बेरमो विधानसभा सीटों पर गुरुवार को हुए चुनाव में भारी मतदान हुआ. शहरी बेरमो विधानसभा क्षेत्र की तुलना में ग्रामीण बेल्ट गोमिया का मतदान प्रतिशत काफी अच्छा रहा.

चुनाव प्रक्रिया पर कड़ी निगरानी रखने वाले जिला निर्वाचन अधिकारी मुकेश कुमार ने पुष्टि करते हुए कहा, “गोमिया में 67.18 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि बेरमो में लगभग 61.13 प्रतिशत मतदान हुआ”.

हालांकि इस बार के चुनाव में माओवादियों का डर नाम मात्र भी स्थानीय लोगों के बीच में नहीं देखा गया. सुअरकट्वा निवासी जलेश्वर महतो इस सर्द में सुबह चार किलोमीटर चलकर वोट देने आए. उनका मानना है कि उनके वोट में सरकार बनाने की शक्ति है, जो उनके गांव तक सड़क का निर्माण करेगी.

झुमरा के छह टोलो में 711 मतदाता हैं जिनमें सिमरआबेड़ा, बलथरवा, सुअरकट्वा, मुर्गटोला, लेडिआम और जमनीजारा शामिल हैं. झुमरा गाँव को छोड़कर, ये सभी गांव झुमरा पहाड़ी में अलग-अलग बसे हुए हैं.

जमनीजारा झुमरा से तीन किलोमीटर नीचे है, अन्य गांव शिखर की ओर स्थित हैं जहां कोई सड़क नहीं है. गुरुवार के चुनाव में 518 मतदाताओं ने मतदान किया है जिसमें 237 पुरुषों और 281 महिलाओं ने वोट डाले.

झुमरा निवासी मोहनलाल महतो ने कहा, “गांव के जो लोग काम करने के लिए बाहर गए हुए हैं उनको छोड़कर, सभी ग्रामीणों ने अपना वोट डाला. जो भी गांव में मौजूद थे, चाहे वह महिलाएं हो, पुरुष हो या बुजुर्ग हो सभी ने आकर मतदान किया. हमने वोट अगले पांच वर्षों में और अधिक विकास की उम्मीद करते हुए डाला है”.

पिछले 2014 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इसबार झुमरा में मतदान अधिक हुआ. पिछली बार 61.24 प्रतिशत ही मतदान हुआ था. जबकि 2009 के विधानसभा चुनाव तक यहां वोटिंग 40 प्रतिशत से भी कम रहता था.

इसे भी पढ़ेंःदिहाड़ी मजदूरों ने पहले किया मतदान, फिर काम की तलाश, इधर शहरी मॉडल बूथों पर नहीं दिखे मतदाता

ग्रामीणों ने अपने गांव में सकारात्मक बदलाव को देखा है. उनका विश्वास सरकार पर बढ़ रहा है. वह उस काले युग से निकलकर आज की सुविधाओं से भरे हुए मार्डन दुनिया में जीना चाहते हैं.

बोकारो से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित झुमरा को पहले माओवादी मुख्यालय के रूप में जाना जाता था. माओवादियों के नक्शे में झुमरा पहाड़ नेपाल से आंध्रप्रदेश तक फैली पहाड़ी श्रृंखलाओं को जोड़ने वाले रेड कॉरिडोर का केंद्र था.

हालांकि माहौल बदल चुका है और नक्सलवाद के नाम पर अब सिर्फ पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों के सर्च ऑपरेशन करने की बात ही सुनाई देती है. धूमिल हो रहे माओवाद से लोगों की मानसिकता में भी बदलाव आया है.

लोग अब पहले की तरह माओवादी द्वारा चिपकाए गए पोस्टर-बैनर की फुसफुसआहट से ज्यादा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों पर चर्चा करते दिखाई पड़ते हैं.

इसे भी पढ़ेंःतीसरा चरणः 62.35 प्रतिशत मतदान, पिछली बार से 1.6 प्रतिशत घटा, रांची में सबसे कम पड़े वोट

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button