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हमारे परिवार के पास 100 प्रॉपर्टी है तो यह कोई बड़ा मामला नहीं: हेमंत सोरेन

हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार को दिये गये इंटरव्यू में बोले झारखंड के सीएम

मु    ख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि अगर उनके परिवार के पास 100 की संख्या में प्रॉपर्टी है तो यह कोई बड़ा मामला नहीं है. हमारे परिवार में पांच अंकल हैं और कुल मिलाकर कम से कम डेढ़ सौ सदस्य हैं. ऐसे में हमारे पास 100 प्रॉपर्टी है तो यह कोई मुद्दा नहीं है. इसे लेकर जो लोकपाल के यहां मैटर पड़ा, वो पता नहीं कब और कैसे पड़ा. किसने शिकायत की, इस तरह की कोई भी जानकारी लोकपाल की तरफ से हमें नहीं दी गयी है. हमें ये भी पता नहीं कि लोकपाल के कहने पर कोई जांच हो रही है? किसी तरह की कोई भी जानकारी लोकपाल की तरफ से हमें नहीं दी गयी है.

मुख्यमंत्री ने ये बातें हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार कुमकुम चड्ढा के साथ एक ऑनलाइन वीडियो इंटरव्यू के दौरान कहीं.

इसी इंटरव्यू में उन्होंने भोजपुरी और मगही को लेकर वह बयान भी दिया है, जिसे लेकर राज्य में सियासी बवाल मचा हुआ है. पेश है इंटरव्यू के कुछ प्रमुख अंश, जिसे हेमंत सोरेन ने खुद अपने ट्वीटर हैंडल पर शेयर किया है.

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सवाल: हेमंत जी, आप कहते हैं कि आप खुद को गरीबों में देखते हैं, लेकिन आप गरीब तो कहीं से नहीं हैं. आपके पास करीब हजारों करोड़ की लगभग 100 संपत्तियां हैं. और लोकपाल ने आपके पिता की उन संपत्तियों की जांच भी की है.

हेमंत सोरेन: आपने काफी अच्छा सवाल पूछा है. ऐसे कई चक्रव्यूह पहले भी रचे गए हैं. ये कोई नयी बात नही है. जो लोकपाल के यहां मैटर पड़ा, वो पता नहीं कब और कैसे पड़ा. किसने शिकायत की इस तरह की कोई भी जानकारी लोकपाल की तरफ से हमें नहीं दी गयी है. ये भी पता नहीं कि लोकपाल के कहने पर कोई जांच हो रही है. किसी तरह की कोई भी जानकारी लोकपाल की तरफ से हमें नहीं दी गयी है. लेकिन अलग-अलग सोर्स से लोकपाल के नाम पर लोग जांच कर रहे हैं. मेरे लिए यह कोई मुद्दा नहीं है.

जो भी है, उसका जवाब हम सही तरीके से देंगे. जिस तरह का केस वहां है, उसी तरह के केसेस सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अलग-अलग नाम से भी चल रहे हैं. एक ही तरह के कागजातों को हवाला देकर केस किया गया. लेकिन सभी जगह वो लोग हारते चले गए. सभी जगह उन्हें मुंह की खानी पड़ी. और अब लोग लोकपाल के पास गए हैं, तो वहां भी हम देखेंगे.

सवालः पर इतनी संपत्ति आयी कहां से? कहां से आपने इतना कमाया?

जवाबः पता नहीं ये लोग किस संपत्ति की बात कह रहे हैं. ये तो मुझे नहीं पता. लेकिन आपको मैं बता देना चाहता हूं कि यहां जो शिड्यूलड एरिया में हमारा सिस्टम है उसके मुताबिक यहां पर हमलोग खुद जमीन के मालिक होते हैं, जमींदार होते हैं. देश में जमींदारी प्रथा खत्म हो गयी है, लेकिन आदिवासियों की जमींदारी अभी तक खत्म नहीं हुई है. जहां तक हमारी संपत्ति की बात है. छोटी-मोटी संपत्तियों की बात है. हम एक ईंट खड़ा करते हैं तो लोगों के सीने पर सांप लोटता है. लेकिन जब लोग बहुमंजिला ईमारत बनाते हैं तो लोग कुछ नहीं कहते.

आज मैं पूरे तरीके से तैयार हूं. क्या मुझे कोई भी संपत्ति बनाने या रिसोर्स जेनरेट करने का अधिकार नहीं है ? क्या आदिवासियों को संपत्ति अर्जित करने पर मनाही है? कोई हमें ये बताए कि मैंने कहीं बेनामी तरीके से किसी चीज को खरीदा हो या इस्तेमाल कर रहे हों.

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सवालः हेमंत जी आपके पिता संघर्ष के परिचायक हैं. वो एक संघर्ष से उभरे हैं. तो जाहिर है कि पैसा या संपत्ति नहीं था और आपके अपने विधानसभा चुनाव के शपथपत्र में संपत्तियों का उल्लेख है, वो भी कई बार.

जवाबः मेरे पास संपत्तियां थीं. हां ये जरूर है कि मेरे पास कैश संपत्ति नहीं थी. संपत्तियां रही हैं हमारे पास. हमारे पास जो भी संपत्ति है उसे सरकारी एंगल से देखा जाए तो अरबों-खरबों की संपत्ति है. लेकिन प्रैक्टिकली देखें तो ऐसे लोग आज यहां हाशिए पर हैं. भले एक आदिवासी के पास 100 करोड़ की जमीन है, लेकिन वो आदिवासी आज रिक्शा चला रहा है.

इसका मतलब यह नहीं है कि आज हमारे पास 100 करोड़ की संपत्ति है तो हम 100 करोड़ के मालिक हो गए हैं. यहां के नियम के मुताबिक जाएं तो उसमें हमारे संपत्तियों की वैल्यू सिर्फ कागजों में है. वास्तविक में उसकी वैल्यू हमें मिलती नहीं.

सवालः क्या आप मानते हैं कि आपके पास 100 के करीब प्रॉपर्टी है? और 100 प्रॉपर्टी होने अपने आप में बड़ी बात है. जिसका आकलन कई हजार करोड़ में होता है.

जवाबः नहीं…नहीं…नहीं मैं इस बात से पूरी तरह से असहमत हूं. प्रॉपर्टी के नाम पर तो मेरे पास सिर्फ एक प्रॉपर्टी है.

सवालः पूरे सोरेन परिवार का मिलाकर बात हो रही है.

जवाबः मेरे सोरेन परिवार में पांच अंकल हैं. हमलोग करीब 150 सदस्य वाले परिवार हैं. और अगर मेरा परिवार 150 सद्स्यों वाला है और हमारे पास 100 प्रॉपर्टी है, तो ये तो कोई बड़ा मामला ही नहीं है.

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सवालः अपने पिता की जगह आपने ली है. कैसा महसूस करते हैं.

जवाबः मुझे बहुत अच्छा लगता है. आज जो मेरी पहचान है, उसमें निश्चित तौर पर मेरे पिता की काफी बड़ी भूमिका है. मैं हमेशा उन्हें फॉलो करता हूं. आज भी उनके पास जो राजनीति और समाजिक इंजीनियरिंग का कॉन्सेप्ट है वो देश में गिने –चुने लोगों के पास होगा.

सवालः मैं मानती हूं कि आपके पिता देश में गिने-चुने लोगों में आते हैं जिन्हें मर्डर के केस में उम्रकैद की सजा हुई हो.

जवाबः वो एक झूठा मामला था. आज किसी कुत्ते की हड्डी निकाल कर आप कहेंगे कि आपने मर्डर किया है. उनपर जो भी आरोप था वो गलत था. पूरी तरह से गलत. कभी मेरे फादर के पीएस के मर्डर केस की बात होती है या चीरुडीह मर्डर केस की बात हो, वो सारे आंदोलन के केस रहे हैं.

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सवालः आप अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. साथ ही क्रिमिनल केस को भी. आप पर भी क्रिमिनल केस दर्ज है.

जवाबः ऐसा जो कुछ भी है, उसे कोर्ट में साबित होना है. हम राजनीति करने वाले लोग सबसे कमजोर होते हैं. अगर कोई हमें एक थप्पड़ मार दे तो हम उसे चौराहे पर दूसरा थप्पड़ मार भी नहीं सकते. लोगों ने कीचड़ फेक दिया है, अब साफ कर रहे हैं. अभी तो बस शुरुआत है. अभी ऐसे सिस्टम के साथ मेरी जंग चल रही है जो इस देश का सबसे ताकतवर सिस्टम है. और मुझे किसी ना किसी तरीके से आने वाले समय में भी परेशान करेंगे.

लोकपाल के पास केस इसलिए डाला गया है, क्योंकि इन्हें पता है कि लोकपाल के दायरे में झारखंड का सीएम नहीं आता है, तो ऐसे सिस्टम को ऑपरेट किया जा रहा है कि सीएम हेमंत सोरेन तक पुहंचा जा सके. लोकपाल में मेरे पिता के नाम से कम्प्लेन डाली जाती है. धीरे-धीरे उसे बढ़ाकर परिवार तक लाया जाता है.

ये एक सोची-समझी चाल है. …और मैं समझता हूं कि इसमें मुझे घबराने की कोई जरूरत नहीं है. क्योंकि इनकी चालाकियों को अब थोड़ा-बहुत हमलोग भी समझने लगे हैं.

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सवालः अब गवर्नेंस की बात करते हैं. आपके पिता की वो क्या गलतियां हैं, जो आप दोहराना नहीं चाहेंगे? और आपकी शासन करने की कला कैसे आपके पिता से अलग है?

जवाबः उन्हें तो शासन करने का मौका ही नहीं मिला. वो तीन बार सीएम जरूर बने लेकिन महीने भर भी वो कुर्सी पर नहीं रह पाए. उन्हें शासन चलाने का मौका नहीं दिया गया.

सवालः आपने यह नहीं बताया कि उनकी कौन सी गलती को आप नहीं दोहराएंगे.

जवाबः इस सवाल का जवाब देना मेरे लिए काफी मुश्किल है. राजनीति की कोई सीमा नहीं होती है. उन्होंने जहां तक भी अपनी राजनीति को पहुंचाया, उन्होंने अपना बेस्ट दिया है. अब उसको आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है.

सवालः आपने अपनी कॉलेज तक की पढ़ाई पूरी नहीं की है. लेकिन झारखंड के पहले सीएम बाबूलाल और अर्जुन मुंडा दोनों ग्रेजुएट थे. लेकिन आप और आपके पिता दोनों ही अंडर ग्रजुएट हैं…साथ ही एक क्रिमिनल रिकॉर्ड भी है. क्या ये एक खराब उदाहरण नहीं है.

जवाबः जो संघर्ष करता है उसपर तो आरोप मुकदमे होंगे ही. जो कुछ करते ही नहीं है उनपर कोई क्या आरोप लगाएगा. रही बात पढ़ाई की तो हमलोग फिर बहुत आगे आ गए हैं. नहीं तो जिस आदिवासी समाज से हमलोग आते हैं उसमें कितने लोग आईएएस, डॉक्टर या जज बन पाते हैं, मुझे बताएं? अब जाकर समाज में परिवर्तन आ रहा है. बच्चे आगे बढ़ रहे हैं. यहां तो समस्या पेट पालने की है. पेट भरा रहेगा तभी तो पढ़ाई करेंगे. जहां तक मेरे और मेरे पिता की बात है, हमारे साथ हमेशा ट्रजेडी होता रहा है. पापा ने पढ़ाई दादा के हत्या की वजह से छोड़ी. उस समय वो नौंवी या दसवीं में थे. महाजनों ने उनकी हत्या कर दी थी.

छह फीट के आदमी को बोटी-बोटी करके बोरे में डाल दिया गया था. उसके बाद मेरे पिता ने सामंतवादों के खिलाफ कमर कसी और वो निकल पड़े. बिरसा मुंडा, सिद्धु कानू …ये सभी लोग अनपढ़ रहे हैं. लेकिन इनके पास चीजों को समझने की झमता थी. मुझे नहीं लगता कि किसी पढ़े-लिखे लोग को भी अपने समाज के प्रति इनती समझदारी होगी. जब देश के किसी ने अंग्रेजों से लड़ने का सपना भी नहीं देखा होगा, ये लोग उस वक्त से लड़ रहे हैं.

पढ़े लिखे लोग समाज के लिए राजनीतिक लड़ाई कितने लड़ते हैं आप बेहतर से जानती होंगी….और मेरे बारे बात की जाए तो जिस इंजीनियरिंग कॉलेज से मैं ड्रॉप आउट हुआ वहां मैं आज चीफ गेस्ट बनकर जाता हूं. और मुझे बोलने में कोई गुरेज नहीं है कि मैं इस कॉलेज का ड्रॉप आउट हूं. उस कॉलेज के सभी प्रोफेसर्स और तमाम लोग इस गौरव से बोलते हैं कि यहां पढ़ने वाला राज्य को लीड कर रहा है.

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सवालः मैं मानती हूं कि उस कॉलेज के लोगों को गर्व होता होगा कि यहां से ड्रॉप आउट लड़का राज्य को लीड कर रहा है. लेकिन आपको यह राज्य विरासत में मिला है. आपने इसके लिए कोई मेहनत नहीं की है. तो ऐसे में राज्य को लीड करने का क्रेडिट भी आपको नहीं जानी चाहिए. आपको ये विरासत में मिला है.

जवाबः नहीं…नहीं…नहीं…मैं इस बात से कतई सहमत नहीं हूं कि मुझे ये सारा कुछ विरासत में मिला. बल्कि राज्य के लोगों को हमने ये स्टेट विरासत में दिया. और आज मैं जहां हूं ये मेरे खुद के संघर्ष से हूं.

इस राज्य में हमारे पार्टी के 15-16 विधायक हुआ करते थे. लेकिन राज्य में सरकार बनाने के लिए 41 विधायकों की जरूरत है. स्टेट बनाने में तो हमने अपनी भूमिका मिभायी. लेकिन विरासत में हमें सिर्फ 17 विधायक मिले थे. उसे बढ़ाकर मैंने 30 विधायक किया.

सवालः आप आदिवासी भाषा को बढ़ाने की बात करते हैं. लेकिन आपने भोजपुरी और मगहई को छोड़ दिया. और आपके ऐसा करने से आपके गठबंधन के मित्र नाराज हैं.

जवाबः ये भाषा कोई रिजनल भाषा नहीं है. ये भाषा उधार की ली हुई है. जो लोग मगही और भोजपुरी बोलते हैं, दे आर डॉमिनेटिंग पर्सन. और जो यहां के लोग हैं, वो तो बेचारे बहुत ही कमजोर लोग हैं. जाहिर तौर पर जो मजबूत रहता है, उसके पैर के नीचे सभी रहते हैं. धीरे-धीरे राज्य में ये लोग आगे बढ़ते गए.

इन लोगों के साथ रहने की वजह से कुछ यहां के लोग भी वो भाषा बोलने लगे. नहीं तो यहां के किसी भी ग्रामीण क्षेत्रों में ये भाषा नहीं बोली जाती. ये तो बिहार की भाषा है. झारखंड की भाषा है ही नहीं. झारखंड का बिहारीकरण क्यों हो.

सवालः लेकिन इस बात को लेकर कांग्रेस को दिक्कत है. आप इस मसले को कैसे सुलझा रहे हैं.

जवाबः आपको नहीं पता कि जब यहां आंदोलन होता था तो आंदोलन करने वाले लोगों की छाती पर पैर रखकर महिलाओं की इज्जत लूटते वक्त भोजपुरी भाषा में गाली दी जाती थी. आज भी आंदोलनकारी लोग जिंदा हैं. पुरुष-महिला सभी जिंदा हैं. ये जंग भोजपुरी और महगई भाषा की बदौलत नहीं लड़ी गयी. जंग यहां की आदिवासी और क्षेत्रीय भाषा के बल पर. हमारे गठबंधन को कोई शिकायत है, उसे दूर किया जाएगा.

हमने जिलावार भाषा परिभाषित की है. राज्य की जो भावना है उसके अनुरूप ही सब किया जाएगा. शेर और बकरी को एक साथ रख देंगे तो आज नहीं तो कल बकरी मारी ही जाएगी. देश में ऐसे कई जगह हैं, जहां की चीजों को बचाने के लिए बाहर से किसी को भी वहां जाना ही मना है, तो यहां भी यही सिस्टम है.

इसी वजह से यहां के लोग थोड़े-बहुत बचे हुए हैं. नहीं तो लोग इस राज्य को गिद्ध की नजर से देख रहे हैं. वैसे भी जहां भी खनिज होता है, पूरी दुनिया में वहां का हाल बुरा रहता है. तो राज्य को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं.

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सवालः आपने खनिज नीति में बदलाव किया है. आप चाहते हैं कि राज्य के लोग सिर्फ खनिज पर आधारित रोजगार के भरोसे ना रहे. क्या ये सही है.

जवाबः हां ये बात सही है. 100 साल से खनिज के भरोसे ही सारी प्लानिंग की गयी है. कौन से ऐसे आदिवासी हैं जो पावर प्लांट चला सकते हैं? ऐसे कौन एससी वर्ग के लोग हैं जो न्यूक्लियर और स्टील प्लांट चला सकते हैं. सोनार का काम लोहार नहीं कर सकता. ऐसे में ट्राइबल का काम ननट्राइबल नहीं कर सकता.

उद्योग का दायरा हमलोगों ने बढ़ाया है. कुछ उत्पाद हैं यहां के जिसे आगे बढ़ाने का काम किया है. यहां के लोग अपार्टमेंट में रहने वाले लोग नहीं है. यहां के लोग जमीन पर रहने वाले लोग हैं. ट्राइबल के लिए पूरे देश में एक कॉमन सिस्टम बनानी चाहिए. इसकी मांग भी उठ रही है.

जैसी हिंदू, सिख, ईसाई एक कॉम्युनिटी है, वैसे आदिवासी भी है. इनको एक पहचान की जरूरत है. पूरे देश में लगभग 12 करोड़ है आदिवासियों की. अलग कोड देने की डिमांड भी हमने अपने विधानसभा के माध्यम से केंद्र को भेज रखा है. भारत सरकार उसको लेकर बैठी हुई है. उसमें हम कुछ कर ही नहीं सकते.

सवालः क्या ये बात सच है कि केंद्र आपके साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है. क्योंकि आप प्रधानमंत्री के खिलाफ ट्विट कर रहे हैं.

जवाबः मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कल को इससे भी मजबूत ट्विट मैं कर सकता हूं. हमलोग रोते नहीं हैं. हमलोग संघर्ष करने वाले लोग हैं. हमें पता है कि ऐसा ही होगा. हमलोग सकारात्मक सोच के साथ चलते हैं. आप पता करें कि बीजेपी के लोग इस सरकार से कितने खुश हैं. हल्ला करते हैं वो अलग विषय है, लेकिन सरकार से खुश हैं.

सवालः राज्य में बीजेपी बंटी हुई है. इसलिए आप सरकार चला पा रहे हैं. आपकी वजह से सरकार नहीं टिकी हुई है.

जवाबः बिलकुल नहीं. बीजेपी कितनी भी कमजोर है, उससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता.

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