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मेरे पैरों में घुंघरू पहना दे तो फिर मेरी चाल देख ले- जब इस गाने से शुरू हुई कहानी ने झारखंड में बदल दी थी सत्ता

सियासी महत्वाकांक्षाओंं के टकराव की कहानी

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Ranchi. मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले! 60-70 के दशक में मोहम्मद रफी के गाये इस सुपरहिट सांग ने एक बार झारखंड की राजनीति में तहलका मचा दिया था. इस गीत के बोल के साथ सियासी शतरंज की ऐसी बिसात बिछी थी कि उसकी परिणति में आखिरकार राज्य की सत्ता पलट गयी थी. आइए बताते हैं पूरी कहानी.

15 नवंबर 2000 को देश के नक्शे पर झारखंड का उदय हुआ, तो भाजपा के बाबूलाल मरांडी को राज्य का प्रथम मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला. इसके पहले बाबूलाल केंद्र में वाजपेयी जी की सरकार में वन एवं पर्यावरण विभाग के मंत्री थे. झारखंड में भाजपा के संगठन के जमीनी विस्तार में बाबूलाल जी ने जो मेहनत की थी, उसके पुरस्कार के रूप में उन्हें मुख्यमंत्री का पद हासिल हुआ था. उस वक्त मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में भाजपा के वरिष्ठ नेता कड़िया मुंडा का नाम भी प्रमुखता से उभरा था, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने अंततः युवा नेता बाबूलाल पर भरोसा जताया था. उन्हें भाजपा, समता पार्टी, आजसू और कुछ निर्दलीयों के गठबंधन की बदौलत बनी राज्य की पहली सरकार के नेतृत्व का मौका मिला. पहले मुख्यमंत्री के तौर पर बाबूलाल का प्रदर्शन अच्छा माना जाता है, लेकिन उस वक्त सियासी दांव-पेंच में उतने माहिर नहीं हुए थे और इसी का नतीजा रहा कि उन्हें कार्यकाल पूरा करने के पहले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. मुख्यमंत्री की कुर्सी से उन्हें बेदखल करने के लिए जो सियासी खेल शुरू हुआ था, उसके एक प्रमुख किरदार थे तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी. सियासी उथल-पुथल के बीच बाबूलाल मरांडी की सीएम की कुर्सी डगमगायी तो इंदर सिंह नामधारी ने इसे अपने लिए एक अवसर की तरह देखा. उनके अंदर मुख्यमंत्री बनने की इच्छा बलवती हो उठी तभी उन्होंने इशारों-इशारों में पत्रकारों से बातचीत में अपनी इच्छा का परोक्ष रूप से इजहार करते हुए कहा था- मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले !

दरअसल, राज्य में बनी पहली गठबंधन सरकार में विधायकों-मंत्रियों की महत्वाकांक्षाएं कुलांचे मारने लगी थीं. बाबूलाल के लिए सीएम के तौर पर इन सभी की महत्वाकांक्षाओं को साध पाना आसान नहीं था. कई मुद्दों पर बाबूलाल ने अपने मंत्रियों-विधायकों को “ना” किया, तो वे नाराज हो उठे. मंत्रियों-विधायकों की इस नाराजगी को इंदर सिंह नामधारी ने अपने पक्ष में भुनाने और उन्हें गोलबंद कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी निगाह गड़ा दी थी. यह और बात है कि नामधारी की यह इच्छा पूरी नहीं हो पायी, लेकिन उनकी सियासी दांव-पेंच से जो हालात पैदा हुए, उसमें बाबूलाल को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी.

 

जैसा कि बताया जा चुका है कि महत्वाकांक्षाएं पूरी न होने से नाराज बाबूलाल की सरकार में शामिल मंत्री लालचंद महतो,  मधु सिंह,  समरेश सिंह,  रमेश सिंह मुंडा व जोबा मांझी ने 2002 का अंत होते-होते बगावत का झंडा थाम लिया. इन्होंने राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष जदयू के इंदरसिंह नामधारी को अपना नेता घोषित कर दिया. दावा किया जाने लगा कि बाबूलाल मरांडी की सरकार को सदन में विश्वास मत नहीं है. विधायकों के बीच खेमाबंदी शुरू हो गयी. विधायक तौले जाने लगे. यूपीए अपने विधायकों सहित एनडीए के इन असंतुष्टों को बस (कृष्णा रथ) से बुंडू ले गया था.तब  राजद विधायक संजय यादव चालक बने थे व स्टीफन मरांडी कंडक्टर. 16 मार्च 03 को बुंडू की लाह कोठी में सभी लोग टिकाये गये. सियासी उथल-पुथल के बीच मनोरंजन के नाम पर ये विधायक ताश, चेस व लूडो खेलते रहे . पिकनिक भी हुई. पूर्व मंत्री स्व. रमेश सिंह मुंडा विधायकों का नेतृत्व कर रहे थे और उनका साथ दे रहे थे मधु सिंह, लालचंद महतो, राजेंद्र प्रसाद सिंह, जोबा मांझी, समरेश सिंह, स्टीफन मरांडी, संजय यादव सहित अन्य विधायक. बुंडू में दो दिनों तक विधायकों की पिकनिक चलती रही. इधर भाजपा के लोग सरकार बचाने की कवायद में लगे हुए थे.

दरअसल एनडीए में खटराग शुरू हुआ विभागों को लेकर. मधु सिंह उस समय भू-राजस्व मंत्री थे. वे इसके साथ निबंधन विभाग चाहते थे, साथ ही अपने कुछ लोगों को बोर्ड और निगमों में अध्यक्ष बनवाना चाहते थे. वहीं लालचंद महतो ऊर्जा विभाग के साथ टीवीएनएल का अध्यक्ष भी बनना चाहते थे. बगावत यहीं से शुरू हुई. बागी मंत्रियों की गाड़ी मुख्यमंत्री आवास के बजाय स्पीकर इंदर सिंह नामधारी के आवास पर रुकने लगी. बागियों ने कह दिया था कि वे इंदर सिंह नामधारी को अपने नेता यानी मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. उस समय दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने भी पूर्व के सभी मतभेदों को भुलाकर नामधारी को समर्थन देने की घोषणा कर दी थी.

सत्ता हाथ से जाते देख दिल्ली में भाजपा के क्राइसिस मैनेजर रातों-रात एक्टिव हो गये. राजनाथ सिंह को तारनहार  बनाकर झारखंड भेजा गया. पार्टी आलाकमान के निर्देश पर राजनाथ सिंह रांची पहुंचे और बागी मंत्रियों को अपने पाले में करने की मुहिम में जुट गए. एक-एक कर सभी बागी मंत्रियों से मिले. बात नेतृत्व परिवर्तन पर आई. बागी मंत्री बाबूलाल को किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री बने रहने देना नहीं चाहते थे. लाख मान-मनौवल के बाद भी बाबूलाल पर बागी मंत्री सहमत नहीं हो रहे थे. जब बागी मंत्रियों की बैठक राजनाथ सिंह के साथ होने लगी तब विपक्ष को यह एहसास होने लगा था कि बाजी पलट सकती है लेकिन तब भी कई विधायक नामधारी के साथ थे. अंत में नेतृत्व परिवर्तन पर बात बनी और भाजपा ने बाबूलाल मरांडी की जगह अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री के रूप में आगे किया. बाबूलाल हटे और अर्जुन मुंडा झारखंड के मुख्यमंत्री बने. इन्दर सिंह नामधारी ने नैतिकता के आधार पर स्पीकर के पद से इस्तीफा दे दिया था लेकिन भाजपा नेताओं के आग्रह पर वह फिर से झारखंड विधानसभा के स्पीकर बने.

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