Opinion

IBC यानी दीवालिया कानून मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि!

Girish Malviya

क्या आपको पता है कि जिस IBC यानी दीवालिया कानून को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है… उस कानून से मार्च  2019 तक कितने रुपये बैंको ने दीवालिया होने वाली कम्पनियों से वसूले हैं?… जवाब है मात्र 75 हजार करोड़ रुपए…

इन मामलों में बैकों की 57 प्रतिशत राशि डूब गयी है फिर भी इसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है और यह हम नहीं कह रहे, यह बात एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एस्सोचैम) और क्रिसिल की संयुक्त रिपोर्ट में सामने आई हैं…

advt

जबकि कुछ दिनों पहले ही लगभग 90-90 हजार करोड़ के दो बड़े मामले ( IL&FS ओर वीडियोकॉन) इस दीवालिया कानून के सामने पेश होने को कतार में लगे हुए हैं… तो 75 हजार करोड़ कहा लगते हैं!…

दीवालिया कानून इस महीने तीसरे साल में प्रवेश कर रहा है, जब यह IBC कानून लागू किया गया तब दिवालिया प्रक्रिया को लेकर बहुत शेखी बघारी गई थी कि इससे बैंको को अपनी डूबी हुई पूंजी पाने में मदद मिलेगी…. लेकिन 2 सालों का इतिहास बता रहा है कि इससे बैंकों को ज्यादा फायदा नहीं हुआ है….

अब बैंकों की कोशिश यह हो रही है कि मामले NLCT के पास नहीं जाएं, क्योंकि निपटारा होने में बहुत देर हो रही है… आंकड़े बता रहे हैं कि NLCT के पास 1,143 मामले लंबित थे और इनमें से 32 प्रतिशत मामले 270 दिन से अधिक समय से लंबित हैं…

इसे भी पढ़ें – मोदी राज के आखिरी महीनों में बर्बादी की कगार पर ONGC

adv

एक ओर खास बात है कि इस कानून में पहले साल यानी 2017-18 में कितने रुपये की वसूली हुई इसका कोई फिगर सामने नहीं आया है, हमने काफी खोजने की कोशिश भी की लेकिन कुछ पता नहीं चल पाया….

अब आते हैं सरकारी झूठ पर जो कंपनी मामलों के मंत्रालय में सचिव इंजेती श्रीनिवास ने पिछले साल बोला था…

पिछले साल अप्रैल में खबर आई थी कि आईबीसी के दिसंबर 2016 से लागू होने के बाद 9 लाख करोड़ में से करीब तीन लाख करोड़ रुपए की वसूली करने में मदद मिली है….

उसके कुछ महीने बाद इंजेती श्रीनिवास ने फिर बयान बदला कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के तहत 2018 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के जरिए 80,000 करोड़ रुपए वसूलने में मदद मिली है….

और आज पता लगा है कि सिर्फ 75 हजार करोड़ रुपये ही वापस आए हैं और बड़ी बात यह भी है कि यह नहीं बताया जा रहा है कि जिन नए मालिकों को यह कम्पनी थमाई गयी है, उन्हें और लोन भी देना ही होगा….ताकि वह यह कम्पनी रन कर सके…

इसे भी पढ़ें – Urban Transport की भूमि अधिग्रहण के लिए 97 करोड़ राशि स्वीकृत, पीपीपी मोड पर भी हो रहा विचार

इस कानून के तहत निपटाया जाना वाला पहला मामला सिनर्जी डूरे ऑटोमोटिव लिमिटेड का था, जिसपर 972 करोड़ रुपये का कर्ज था. लेकिन बैंक इसमें से केवल 54 करोड़ रुपये ही वसूल कर पाए. यानी कर्ज का 94 फीसदी डूब गया…

बिजनेस स्टैंडर्ड ने सालभर पहले ही अपनी एक रिपोर्ट में यह साफ कर दिया था कि आरबीआई की ओर से एनपीए की पहली सूची में शामिल 12 कंपनियों में से 9 मामलों के निपटान में बैंकों को अपने कुल बकाया कर्ज में औसतन 50 से 80 फीसदी की चपत लग सकती है…आज वही फिगर सामने आ रहे हैं.

बैंकों का सकल फंसा कर्ज (ग्रॉस एनपीए) वित्त वर्ष 2017-18 में बढ़कर 10.39 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया था. मोदी सरकार ने अब तक इस साल कोई आंकड़ा जारी नहीं किया है, एक अनुमान के मुताबिक यह 14 लाख करोड़ के ऊपर हो गया है ऐसे में बैंको की मात्र 75 हजार करोड़ की वसूली कितनी तर्कसंगत है…आप ही बताइए?

इसे भी पढ़ें – आचार संहिता उल्लंघन के मामले में अपर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने ऊर्जा विभाग से मांगा जवाब

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button