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IAS सुनील बर्णवालः सरों पर ताज रक्खे थे, क़दम पर तख़्त रक्खा था, वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था

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Ranchi:

सरों पर ताज रक्खे थे क़दम पर तख़्त रक्खा था

वो कैसा वक़्त था मुट्ठी में सारा वक़्त रक्खा था

ख़ुर्शीद अकबर का यह शेर मंगलवार को राजभवन के बिरसा मंडप में शपथग्रहण समारोह में उस शख्स को देख कर याद आ गया, जिनकी वहां मौजूदगी की कोई उम्मीद नहीं थी.

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Whmart 3/3 – 2/4

पांच साल तक रघुवर सरकार की चकाचौंध दूधिया रौशनी में इस तरह मशरूफ रहनेवाले एक आइएएस अधिकारी जिसे सियासी रौशनी की चमक के आगे सब अंधेरा लगा.

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मंगलवार को शपथ ग्रहण समारोह में वो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना से ज्यादा वो कुछ न लगे. बात हो रही है पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के प्रधान सचिव सुनील बर्णवाल की.

शपथग्रहण समारोह खत्म होने के कगार पर था. पांच मंत्री शपथ ले चुके थे. कांग्रेस की तरफ से बादल पत्रलेख को शपथ के लिए मंच पर बुलाया जा रहा था. तभी पत्रकारों की नजर वहां टहलनेवाले अंदाज में घूमते हुए पूर्व सीएम के प्रधान सचिव और वर्तमान सरकार में वेटिंग फॉर पोस्ट आइएएस अधिकारी सुनील बर्णवाल पर पड़ी.

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पहला सवाल जो एक पत्रकार के मुंह से निकला वो यह था कि आखिर वो यहां कर क्या रहे हैं. इधर बादल पत्रलेख का नाम जैसे ही मंच पर आने के लिए लिया गया, उनके समर्थकों ने जोर से ताली बजानी शुरू की और मंच के सामने मोबाइल से वीडियो बनाने और शपथ ग्रहण को सामने से देखने वालों की भीड़ और बढ़ गयी.

सुनील बर्णवाल उस वीवीआइपी लॉन्ज में जाने की कोशिश कर रहे थे, जहां कुछ सीनियर आइएएस अधिकारी बैठे हुए थे. लेकिन वो लाख चाह कर भी वहां तक नहीं पहुंच सके. आखिर में उन्हें वापस होना पड़ा. वो बिरसा मंडप से बाहर चले गये.

आखिरी शपथ मिथिलेश ठाकुर ने ली. मिथिलेश ठाकुर के शपथ लेने के बाद फिर से एक बार सुनील बर्णवाल वीवीआइपी लॉन्ज में जाने की कोशिश करने लगे. इस बार दो चार लोग उनके साथ थे. जो उन्हें अपने साथ लेकर वीवीआइपी लॉन्ज तक ले जाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन शपथग्रहण समारोह के खत्म होते ही राष्ट्र गान बजने लगा. समारोह में मौजूद सभी खड़े हो गये.

एक बार फिर से सुनील बर्णवाल भीड़ में फंसे. राष्ट्रगान खत्म होने तक उन्हें एक आम आदमी बन कर वहीं भीड़ के बीच खड़ा रहना पड़ा. जब धीरे-धीरे भीड़ छंटी तो वो जहां जाना चाहते थे वहां पहुंच सके. पत्रकारों के बीच चर्चा होने लगी “कि देखिए इसे ही सियासत कहते हैं. जो कभी किसी सूरत में आम नहीं था, वो कैसे खास से आम सा हो गया.

वहीं एक बार ऐसा भी हुआ था कि एक ब्यूरोक्रेट के शादी समारोह में जब ये पहुंचे थे तो इन्हें उस वक्त के सीएस से भी ज्यादा तवज्जो मिली थी.

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