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IAS साहब! हम आज आपके रिजल्ट पर हर्षित हैं, कुछ ऐसा कीजिएगा कि कल आपके नायकत्व पर गर्वित हों

Shambhu Nath Choudhary

यूपीएससी का रिजल्ट 24 सितंबर को आया. करीब 24 घंटे हुए हैं. सोशल मीडिया की दीवारों पर रिजल्ट को लेकर तमाम तरह के पोस्ट टंगे पड़े हैं. सफल अभ्यर्थियों की तस्वीरें हैं. संघर्ष की गाथाएं हैं. मेधा और मेहनत की कहानियां हैं. पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रसंग हैं. उनके स्कूल-कॉलेज-कोचिंग के सफरनामे हैं. सफलता के फॉर्मूले हैं. कामयाब युवाओं के अपने गांव-शहर के किस्से हैं और इन किस्सों में उनकी जिंदगी के वो हिस्से भी हैं कि कैसे अपनी ही नाकामयाबियों से सबक लेकर उन्होंने ये सबसे बड़ा मुकाम हासिल किया है. पर, इन तमाम तरह के पोस्ट और अपडेट के बीच दो धाराएं काबिल-ए-गौर हैं.

एक धारा वह है, जो इन युवाओं की सफलताओं की कहानियों पर अपने गांव-अपने शहर-अपने राज्य के ‘गौरव’ का उद्घोष कर रही है. एक बिहारी सब पर भारी का नारा गुंजायमान किया जा रहा है. दूसरी धारा वह है, जो सफल युवाओं को बधाई तो दे रही है लेकिन एक खास तरह के डिस्क्लेमकर के साथ.

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दूसरी धारा वाले लोग कह रहे हैं कि जो युवा आज से आईएएस-आईपीएस-आईएफएस-आईआरएस नामक ‘प्रभु वर्ग’ में शामिल हो गये हैं, उनकी सफलता पर देश-राज्य-शहर को बहुत इतराने की जरूरत नहीं है क्योंकि इसके पहले भी इन जैसे कई युवाओं के नाम हमने टॉपर्स की लिस्ट में चमकते हुए देखा है, लेकिन उनकी ‘निजी सफलताओं’ से हमारे देश-समाज-राज्य-शहर-गांव की कोई तस्वीर नहीं बदली. उनके जरिए हमारा किसी भी प्रकार का भला नहीं हुआ. ‘बिहारी-झारखंडी गौरव के इन कथित झंडाबरदारों’ ने प्रभु वर्ग में शामिल होने के बाद ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे हमारी दुश्वारी कुछ कम हो. उलटे जब भी वक्त पड़ा, उन्होंने नाक-भौं सिकोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

…तो सवाल यह कि ऐसी सफलताओं पर हर्षित-गर्वित हुआ जाये या फिर इन्हें व्यक्तिगत सफलताएं मानकर उन्हें बधाई देने की ‘औपचारिकता’ के साथ आगे बढ़ जाया जाये?  मुझे लगता है कि दोनों तरह के विचारों के बीच एक बहस खड़ी करने की जरूरत है.

यूपीएससी की परीक्षा में बिहार-झारखंड के युवाओं की सफलताएं हमें यह आश्वस्ति जरूर देती हैं कि संसाधनहीनताओं, विषमताओं और प्रतिकूलताओं के बीच भी हमारी जमीन में इतनी उर्वरता है कि वह प्रतिभाएं पैदा कर सके. यह आश्वस्ति हमारे लिए निश्चय ही गर्व और हर्ष का विषय है. हां, हमें गर्व होता है कि हमारे बीच मौजूद एक फेरीवाले, एक परचून वाले, एक क्लर्क, एक प्राइमरी टीचर की संतान ने देश में सबसे कठिन मानी जाने वाली प्रतियोगी परीक्षा में सफलता का डंका बजा दिया है. इनकी सफलताएं हम सबकी आंखों में उम्मीदों की एक चमक भरती हैं. इनकी सफलताएं निजी जरूर हैं, लेकिन इनकी कहानियां हमारे भीतर प्रतिकूलताओं से जूझने का माद्दा भी पैदा करती हैं.

दूसरी तरफ इस सच्चाई से भला किसे इनकार है कि इनकी कामयाबी के प्रशस्तिगान में हम कोरस मिलाने को चाहे जितने तत्पर हो जायें, इन्हें बनाने-गढ़ने में हमारे शहर-राज्य का योगदान लेशमात्र रहा है. हकीकत यही है कि ऐसी प्रतिभाओं को खाद-पानी हासिल करने के लिए प्रायः दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है. हम ऐसे संस्थान खड़े ही नहीं कर पाये जिनके पास यहां पैदा होनेवाले टैलेंट को तराशने-गढ़ने का शऊर हो. इस इम्तिहान में कामयाब ज्यादातर युवाओं को दूसरे राज्यों और दूसरे शहरों ने संवारा है. यह अहसास हमें कहीं न कहीं जरूर सालता है कि अपने ही बीच से निकले जिन युवाओं की सफलताओं पर हम गर्व कर रहे हैं, उसपर दूसरे शहरों-राज्यों का अधिकार हमसे ज्यादा है. मुझे लगता है कि इस टीस को और तेज करने की जरूरत है. हमें अपने जख्मों को ढंकने के बजाय उन्हें इस हद तक आंच देने करने की जरूरत है कि हमारे भीतर इनका मुकम्मल इलाज करने की तड़प पैदा हो. अकुलाहट और बेचैनी हमें उस विमर्श के लिए विवश कर दे कि हमारे अपने राज्य में स्तरीय संस्थान कैसे खड़े हों, हमारे यहां अच्छी शिक्षा की आबोहवा कैसे बने?

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गर्व और हर्ष से इतर सबसे जरूरी बहस इस बात पर खड़ी की जानी चाहिए कि सैकड़ों-हजारों सिविल सर्वेंट्स पैदा करने के बाद भी हमारे देश-राज्य-शहर की दुश्वारियां क्यों कम नहीं होतीं? देश की सबसे मुश्किल परीक्षा पास करनेवाले ‘प्रतिभावानों’ से क्यों कोई उम्मीद नहीं बंधती कि इनकी वजह से हमारा कुछ भला होगा? देश-राज्य की दुर्दशा के लिए हम राजनीतिकों को तो फिर भी कोस लेते हैं, लेकिन ब्यूरोक्रेसी जब हमें रौंदती है या जब हमसे हिकारत वाला सलूक करती है तो हम सिर्फ मन मसोस लेते हैं. सबसे निरीह लोगों के प्रति ब्यूरोक्रेसी की निर्ममता की जितनी घटनाएं रोज हमारी आंखों के सामने घटती हैं, उसपर खून खौलता तो जरूर है लेकिन अंततः हम उनके सामने बेबस रह जाते हैं.

निश्चय ही, आजादी के बाद 75 सालों में भी प्रशिक्षण का वो तरीका नहीं इजाद कर पाये कि ब्यूरोक्रेट्स को उदारता और सहिष्णुता का शऊर सीखा पायें. हमारे देश की ब्यूरोक्रेसी ऐसे ‘प्रभुओं’ का कुनबा बनकर रह गयी है जिनके ‘करम’ हमपर कम हैं, ‘कहर’ कहीं ज्यादा हैं. जो लोग हमारे हालात में बदलाव का हरकारा बन सकते थे, वो सिर्फ अपना हित साधने वाले नाकारा बन जाते हैं. हमने देखा है कि हमारे शहर-जिले में एक ईमानदार-कर्मठ-निरपेक्ष ब्यूरोक्रेट आ जाये तो पूरी फिजां बदल देता है. सिर्फ एक कड़क एसपी आ आये तो अपराधियों को दड़बे में घुस जाना पड़ता है. सिर्फ एक डीएम संकल्प कर लेता है तो कुछ महीने में ही जंग लगे सिस्टम का कायाकल्प होने लगता है. हमने ईमानदार अफसरों को भ्रष्ट राजनीतिक सिस्टम में प्रताड़ित होते और ईमानदारी से काम करने की बड़ी कीमत चुकाते भी देखा है. हर राज्य में ऐसे अफसरों की कमी नहीं जिन्हें भ्रष्ट तंत्र में फिट न होने की वजह से शंटिंग में जाने की नियति झेलनी पड़ रही है.

आखिरकार सवाल यह कि हालात बदलें कैसे? हमारी सोसायटी ईमानदार और जिम्मेदार सिविल सर्वेंट्स कैसे पैदा करे?  जिन प्रतिभावानों से हमारी उम्मीदें सबसे ज्यादा हैं, उनके बीच जिम्मेदारी और ईमानदारी को लेकर कोई विमर्श पैदा हो पाये तभी बदलाव का आगाज हो सकता है. पूरी ब्यूरोक्रेसी को इस दिशा में विचार करने की जरूरत है कि जो लोग सबसे कठिन परीक्षा में उनकी सफलता पर खुशियां मना रहे हैं, वो लोग आगे चलकर उनके नायकत्व पर भी गर्व करें.

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