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एक जिला कलेक्टर (IAS) की शहीद की बेटी को चिट्ठी…

जब शहीद पिता के कॉफिन पर लेट गई आरु, अफसोस! इस बार पिता ने गले नहीं लगाया...

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Ranchi: राजस्थान के झालावाड़ जिला कलेक्टर ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हुए सेना के पैराट्रूपर मुकुट बिहारी मीणा की पांच माह की बेटी को एक खत लिखा है. वहां मौजूद झालावाड़ के कलेक्टर जितेंद्र सारी चीजों को देख रहे थे. आंखें नम थी. वहां से घर जाने के बाद उनसे रहा ना गया. शहीद मुकुट बिहारी मीणा की पांच महीने बेटी आरू को उन्होंने एक खत लिखा. खत देख कर किसी की भी आंखों में आंसू आ जाए. ये खत ना सिर्फ शहीद परिवार वालों के लिए हैं. बल्कि उन आईएएस अधिकारियों के लिए भी है, जो जिले के अधिकारी होंगे, पब्लिक के सुख-दुख का हिस्सा बनते हैं. न्यूज विंग को खत का एक पीडीएफ फाइल मिला था, जिसे बड़ी ही मुश्किल से पढ़ा जा सका है. पेश है उस नायाब और गौरवांवित करने वाले खत का पूरा अंश.

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प्यारी बिटिया आरू,
शुभाशीष!
आज तुम्हे गोद में उठाए तुम्हारे मामा और परिवार के लोग जब आर्मी के एएसएल में बैठे, और थोड़ी देर बाद तुम्हें तुम्हारे शहीद पिता की पार्थिव देहपेटी (कॉफिन) पर बिठाया, तो पहले तुमने तिरंगे को छुआ और फिर बिना रोए कॉपिंग पर ही लेट गयी. तब मैं नहीं जान पाया कि तुम्हारा अबोध मन-मस्तिष्क तुम्हें क्या बतला रहा था. हो सकता है कि थोड़ी देर पहले जब तुमने अपने पिता के देह-दर्शन के दौरान चेहरा देखा होगा तो अपरिभाषित जुड़ाव के साथ कॉफिन पर लेट गई होगी. वह जो कुछ भी था बहुत ही मार्मिक था. मैं और आर्मी के सारे ऑफिसर तुम्हें देख रहे थे और मुझे पता है कि सभी अलग-अलग तरीके से सोच रहे होंगे, मगर सोच का केंद्र तुम्हारी मासूमियत और तुम्हारे शहीद पिता थे.

जब शहीद पिता के कॉफिन पर लेट गई आरु
जब शहीद पिता के कॉफिन पर लेट गई आरु

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प्रिय आरू, जब तुम थोड़ी बड़ी हो जाओगी, समझोगी और खुद को अभिव्यक्त कर पाओगी तो जानोगी कि तुम्हारे जन्मदाता, झालावाड़ की खानपुर तहसील के लगभग 100 घरों की आबादी वाले एक छोटे से गांव, लड़ानिया के सपूत पैराट्रूपर शहीद स्वर्गीय मुकुट बिहारी मीणा थे. जिन्होंने कश्मीर में एक सर्च ऑपरेशन में देश के लिए अपनी जान न्योछावर की थी. शहीद स्वर्गीय मुकुट बिहारी मीणा, जो पिता जगन्नाथ, बड़े भाई श्री शंभूदयाल. तीन बहनों कमलेश, सुगना और कालीबाई की आंखों के तारे, उम्मीद तथा हौसला थे और तुम्हारी मां के लिए पूरा जीवन थे. केवल 25 साल के थे और अपनी शहादत से दो माह पहले तुम सब से मिलकर रक्षाबंधन पर आने का वायदा करके गए थे. मगर इस वायदे से कहीं गहरे में और मजबूत दृढता के साथ जो उन्होंने देश के लिए कसम खाई थी, वह उसके लिए कुर्बान हो गए और तिरंगे में लिपटकर घर आए थे.

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गर्व और आंखों में आंसू के साथ लोग पढ़ रहे खत
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आरू बिटिया, तुम बड़ी होकर जब आज उनके अंतिम संस्कार के फोटो और वीडियो देखोगी तो पता लगेगा कि वह पूरे देश के लिए किसी न किसी संबोधन से जुड़ गए हैं. आज के दिन हजारों लोग उनकी अंतिम यात्रा में थे. लोग तिरंगा उठाए, तिरंगे में लिपटे शहीद के पीछे भारत माता की जय के नारों के साथ चल रहे थे.
माननीय मंत्रीगण, सांसद, विधायकगण, अनेक अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधिगण, पुलिस-प्रशासन, आर्मी, मीडिया और पूरे हाड़ौती के अलग-अलग हिस्से से आए हुए सम्मानित महानुभाव, आपके शहीद पिता को श्रद्धासुमन अर्पित करने आए थे. जब पुष्पचक्र से शहीद वंदन हो रहा था, बिगुल बज रहे थे या सलामी फायर हो रहा था, तब पूरा आसमान आपके पिता की शहादत के जिंदाबाद के नारों से गूंज रहा था. तुम्हारे पिता अनेक युवाओं के लिए सेना में जाने के लिए प्रेरणा बनेंगे.

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बीटिया आरू, जब बड़ी होकर तुम देश के शहीदों के बारे में पढ़ोगी या कभी किसी सभा कार्यक्रम में बोलोगी या शहीदों पर सुनोगी तो यकीन करना कि तुम्हारे चेहरे पर एक फक्र होगा, आंखों में एक गर्वित चमक. तुम अपने शहीद पिता की ऊंगली पकड़कर तो बड़ी नहीं होगी, मगर उनकी शहादत के किस्से तुम्हें रोज सुनने को मिलेंगे. जब भी उनकी याद आए तो ध्यान रखना कि कुछ अभाव चुभते हैं, मगर तुम्हारे पिता की तरह देश के लिए कुर्बान होने का गौरव सबको नसीब नहीं होता. शहीद अमर होते हैं. तुम्हारे पिता के कॉफिन को कंधा देते हुए जब मैं चल रहा था और वंदे मातरम तथा भारत माता की जय के नारे लग रहे थे, तो रोंगटे खड़े हो गए थे. तुम्हारे दादा ने मुखाग्नि देने से पहले अग्निदंडिका को तुम्हारे हाथों से छुआकर मुखाग्नि दी थी तो सारी दृष्टा आंखें नम थी.

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आरू, तुम्हारे साथ पूरे क्षेत्र ही नहीं देश के हर जिम्मेदार संवेदनशील नागरिक की दुआएं और आशीर्वाद है. तुम खूब पढ़ना, बढ़ना और अपने पिता की गौरवमयी शहादत को अपना नूर और गुरूर बनाना.

आशीर्वाद और विशेष शुभकामनाएं
जितेंद्र

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