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मैं काम करना चाह रहा था, लेकिन कुछ विभाग में फाइल बढ़ती ही नहीं, आखिर फाइल चलती क्यों नहीः Rtd. IAS अनिल स्वरूप

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Akshay/Rahul

Ranchi: अनिल स्वरूप एक रिटायर्ड IAS अफसर हैं. हाल ही में इन्होंने चर्चित किताब “Not just a Civil Servant” लिखी है. अनिल स्वरूप 1981 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं. IAS बनने से पहले एक साल के लिए इन्होंने IPS अधिकारी के तौर पर अपनी सेवा दी है. इन्हें  Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration (LBSNAA) की तरफ से “best officer trainee” का गोल्ड मेडल मिला है. ब्यूरोक्रेसी पर आए दिन श्री स्वरूप मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखते रहते हैं.

कुछ दिनों पहले इन्होंने झारखंड के ब्यूरोक्रेसी पर एक ब्लॉग लिखा था, जो झारखंड समेत दूसरे राज्यों में भी ब्यूरोक्रेसी में काफी चर्चा का विषय था. अनिल स्वरूप का रिश्ता झारखंड से भी रहा है. कुछ ही दिनों पहले इन्हें झारखंड विकास परिषद का सीईओ बनाया गया था. लेकिन वो इस पद पर ज्यादा दिन बने नहीं रह पाए. इनका इस्तीफा 10 अक्टूबर को रघुवर सरकार ने कबूल कर लिया.

श्री स्वरूप एक दिन के लिए रांची दौरे पर आए थे. रांची दौरे के दौरान उन्होंने झारखंड के ब्यूरोक्रेसी पर खुल कर न्यूज विंग के अक्षय कुमार झा और राहुल गुरू से बात की. पेश है प्रमुख अंश.

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सवालः आप झारखंड के विकास परिषद के सीईओ थे. लेकिन आप इस्तीफा देकर चले गए. ऐसा करने के पीछे क्या वजह थी. क्या झारखंड में आपको मन नहीं लगा.

जवाबः नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी. दरअसल मुझे किताब लिखनी थी और मैं किसी शासकीय पद पर रहकर यह किताब नहीं लिख सकता था. मुझे निर्णय लेना था कि मैं किताब लिखूं या यहां रहूं. अगर मैं यहां रहकर किताब लिखता तो यह एक conflict of interest का मामला हो सकता था. मैं शासन का अंग बनकर कैसे  लिख एक किताब लिख सकता हूं, जिसमें मैं शासन की चर्चा कर रहा हूं.

सवालः यही तो झारखंड में हो रहा है. ब्यूरोक्रेट्स ऐसा ही काम कर रहे हैं.

जवाबः इसपर मैं क्या और कैसे टिप्पणी कर सकता हूं कि दूसरे क्या कर रहे हैं. मुझे क्या करना है, यह मैं निर्धारित कर सकता हूं.

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सवालः ऐसा किया जाना ठीक है या नहीं.

जवाबः हमेशा ऐसा होता आया है कि लोग दूसरे पर टिप्पणी करते हैं. लेकिन मुझे यह अधिकार नहीं है कि मैं दूसरों पर टिप्पमी करूं. मुझे पता था कि मेरे पुस्तक का प्रभाव देश व्यापी अधिकारियों पर होगा. इसलिए मैंने शासन से पहले रिश्ता तोड़ा फिर किताब लिखी.

सवालः आपने झारखंड के ब्यूरोक्रेट्स पर एक आर्टिकल लिखी थी. उसमें आपने काफी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया था. आपने कहा था कि झारखंड के कुछ अधिकारी अयोग्य, अनिर्णायक, उदासीन, हठी और धूर्त हैं.

जवाबः जिस लेख की बात आप कर रहे हैं. उसमें मैंने एक सामान्य तरह की फिक्चर पेंट की थी, कि इस प्रदेश में कितनी ज्यादा संभावनाएं हैं और कितना अच्छा काम अधिकारी कर रहे हैं. लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे हैं, जो ठीक नहीं हैं और ऐसा लगभग हर प्रदेश में हो रहा है. अब सवाल है कि वो अधिकारी ऐसा क्यों कर रहे हैं. ये तो वो ही बता सकते हैं.

सवालः यहां के कुछ IAS अधिकारी जो जिले में डीसी हैं, वो अपने ट्विट के साथ #jharkhandwithmodi लगा कर ट्विट कर रहे हैं. ऐसा किया जाना सही है क्या.

जवाबः मेरा मानना है कि सामान्य रूप से जब आप सेवा में होते हैं तो आपको एक शासकीय सेवक के रूप में काम करना है. आप राजनीति से यथासंभव जितना दूर रह सकते हैं रहिए. ऐसा करना हर के हित में होगा.

सवालः आपने जो किताब लिखी है, वो किस ग्रुप के लिए. आपको किसको मैसेज देना चाहते हैं.

जवाबः ये किताब basically शासकीय सेवकों के लिए है. Civil Servants के लिए थी. लेकिन और भी लोगों को पसंद आ रही है. Non civil servants को भी अच्छी लग रही है क्योंकि जो बातें मैंने लिखी है, वो सामान्य नागरिकों के लिए भी उतनी ही लागू है.

सवालः Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration (LBSNAA) की तरफ से “best officer trainee” का गोल्ड मेडल मिला है. इसके बाद आप झारखंड के अधिकारियों के लिए अयोग्य, अनिर्णायक, उदासीन, हठी और धूर्त जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो इसे क्या समझा जाए.

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जवाबः देखिए कोई भी व्यवस्था में हर आदमी एक जैसा नहीं होता. कुछ अच्छे होते हैं और कुछ खराब होते हैं. चाहे वो कोई भी हो. IAS हो Civil service से हो. ऐसा कह देना कि सभी अच्छे हैं, यह भी ठीक नहीं है. सभी खराब हैं ऐसा कहना भी ठीक नहीं है. सवाल है कि उन सभी अधिकारियों को हम हैंडल कैसे करें. ये लीडरशिप का काम है. जो किसी काम के नहीं हैं. जो भ्रष्ट हैं. उनको कैसे हैंडल किया जाए ये चुनौती है. जो राज्य Successful हैं उन्होंने ऐसे अधिकारियों को सही तरीके से हैंडल किया है. मेरा यह मानना था कि इतने साल की Instability के बाद…एक सौभाग्य है प्रदेश का कि यहां एक ऐसा मुख्यमंत्री है प्रदेश का जो राज्य के बारे सोच रहा है. जब मेरी मुलाकात सीएम रघुवर दास से हुई तो मैंने पाया कि ये प्रदेश के लिए कुछ करना चाहते हैं और कुछ कर भी रहे हैं. इस काम में कई अधिकारियों का सकारात्मक काम है. लेकिन इन्हीं अधिकारियों के बीच कुछ ऐसे अधिकारी हैं जो किसी काम के नहीं है. तो मेरा यह संदेश था कि उनसे सतर्क रहना जरूरी है. क्योंकि ऐसे अधिकारी ही छवि को खराब कर सकते हैं.

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सवालः जिस तरह की IAS अधिकारियों को ट्रेनिंग मिली है, क्या वो उस तरह का काम झारखंड में वो कर पा रहे हैं?

जवाबः बिल्कुल है. यहां एक से बढ़ कर एक अच्छे अधिकारी हैं. मैंने यहां करीब 11 जिलों का दौरा किया है. उनसे गहन विचार विमर्श किया है. क्षेत्र के कुछ अधिकारियों से मैं बड़ा प्रभावित भी हूं. एक से एक बढ़िया डीसी राज्य में हैं. लेकिन मुझे इस बात को लेकर आश्चर्य होता था कि आखिर क्यों कुछ अधिकारी फाइलों को अपने पास दबा कर रखते हैं. क्यों विलंभ करते हैं निर्णय लेने में. उससे पूरी छवि खराब होती है. पूरी बिरादरी की छवि खराब होती है साथ ही प्रदेश की छवि खराब होती है. मेरी टिप्पणी इन्हीं लोगों के लिए थी. ऐसे लोगों की पहचान कर अलग करना चाहिए और उन्हें अच्छे से हैंडल करना चाहिए. ऐसा करने से ही प्रदेश की छवि बनेगी.

दूसरी बात है कि सभी उसी के बारे में बात करते हैं, जो हो रहा है. लिखते भी उसी के बारे में हैं. लेकिन कोई उसके बारे नहीं बात करता जो नहीं हो रहा है. ऐसा करने से नोटिस होता, मेरा संकेत उसी ओर था.

सवालः विकास परिषद के सीईओ रहते हुए क्या आप सरकार से नाराज चल रहे थे.

जवाबः मैं सरकार से नाराज नहीं चल रहा था. सरकार के लिए तो मैं काफी प्रयास रत था. जिस तरीके से मुख्यंमत्री चाह रहे थे. मैं काम करना चाह रहा था. लेकिन कुछ विभाग में मुझे लगता है कि वो फाइल बढ़ाते ही नहीं हैं. आखिर फाइल चलती क्यों नहीं है. मैंने बुला कर कहा कि ऐसा करने से पूरे प्रदेश की बदनामी होती है.  मेरी पूरी परेशानी कुछ विभागों से थी वो फाइल ही नहीं बढ़ाते. पूछने पर कहते हैं कि फाइल आ रही है. पहुंच रही है. अरे फाइल में पहिया लगा है क्या. फाइल को चलाना पड़ता है. वो खुद नहीं चलती. अगर गलत है तो मना कर दीजिए. सही है तो कर दीजिए. फाइल अपने पास रखिए नहीं. मैंने अपनी 38 साल की सेवा में यही किया. हमें चुनाव तो लड़ना नहीं है. नहीं होने वाले काम मना कर देंगे. हमें तो शीघ्र निर्णय लेना है. जब मैं जिलों में जाता था तो डीसी मुझसे कहते थे. सर मैं लिख तो पा नहीं रहा हूं. एक महीना से ज्यादा हो गया विभाग को फाइल भेजे. लेकिन कुछ हो ही नहीं रहा है. इसी बात से मुझे नाराजगी होती थी. मेरी नाराजगी इस बात से थी कि मेरे अफसर से चिट्ठी भेजी हुई है. लेकिन उसपर कुछ काम ही नहीं हो रहा है.

सवालः एक उदाहरण अगर झारखंड के लिए देना चाहे, तो वो क्या हो सकता है अच्छे काम के संदर्भ में.

जवाबः झारखंड में मैंने जो शिक्षा में सुधार देखा. मेरे ख्याल से यहां के लिए यह एक बड़ी उपल्बधी है. यहां जो ब्यूरोक्रेसी है शिक्षा की वो finest ब्यूरोक्रेसी है. मैं भारत सरकार के लिए शिक्षा सचिव के तौर पर भी सेवा दे चुका हूं. मैंने कई प्रदेशों को शिक्षा पद्धति को देखा. यहां हालत इतनी खराब थी पहले और उसमें जो सुधार हुए हैं उसके लिए मैंने शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव एपी सिंह को कहा है कि आप एक लिस्ट बनाएं कि आपने क्या क्या कदम उठाए हैं. अब कोई कहेगा कि अभी भी यहां कमी है. कमी तो है ही, यह कहना गलत होगा कि सब सुधर गया. लेकिन हमें उसकी तारीफ करनी पड़ेगी कि कितना इन्होंने प्रयास कर के जिस तरीके से कोर्ट केस को कम किया, वो एक बड़ी उपलब्धी है.

सवालः लेकिन देश की कोई भी युनिवर्सिटी विश्व रैंकिंग मे कहीं नहीं है.

जवाबः देखिए मैं किसी रैंकिंग के फेवर में हूं ही नहीं. हर संस्था हर आदमी अपने आप में Unique है. रैंकिंग तो एक बिजनेस बन गयी है. स्टेट की रैंकिंग हो रही है. जिले की रैंकिंग हो रही है. सभी एक बिजनेस है. प्रेइवेट सेक्टर में रैंकिग हो रही है. हमें यह देखना है कि हम कहां खड़े हैं. दूसरो से आखिर क्यों Compare करते हैं हम. हमें पता है कि हमारी कमी क्या है. हमें उसको दूर करनी है. आज हमें पता है कि उच्च शिक्षा और प्राइमरी एजुकेशन में कमी क्या है. उसे दुरुस्त करने की जरूरत है. रैंकिंग के चक्कर में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. यहां भी शिक्षा के क्षेत्र में काम हुआ है, वो रैंकिंग के चक्कर में पड़ने से नहीं हुआ है. यहां शिक्षा विभाग को अच्छे सचिव मिले. पहले अराधना थी उसके बाद एपी सिंह आए. दोनों ने अपनी पूरी टीम के साथ समस्या को समझा. उसका समाधान किया. इसमें रैंकिंग कहां से आ गयी.

सवालः जिस तरह से झारखंड के एक अच्छे काम का जिक्र आप कर रहे हैं, उसी तरह से कोई खराब हुआ का जिक्र करना चाहेंगे.

जवाबः यहां पर मुझे थोड़ी चिंता हुई. लेकिन मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा. कुछ विभागों में पत्राचार की जो गति है, वो ठीक नहीं है. आप निर्णय क्यों नहीं लेते हैं. काम करना है तो कर दीजिए. मना करना है तो कर दीजिए. जब काम शिक्षा विभाग और जिलों में हो सकता है, तो दूसरे विभागों में क्यों नहीं. इस बात की मुझे चिंता थी. हम यहां निवेश की बात करते हैं. निवेशकों को बुलाते हैं. लेकिन निवेशक इधर-उधर भाग रहा है. मैंने झारखंड में प्रयास किया था कि सारे दस्तावेज digitize हो. जिससे सबको पता चलें कि फाइल कहां अटकी हुई है. जब मैं शिक्षा या कोल सचिव था, तो मैंने अपने विभाग में सारी चीज digitize कर दी थी. वही व्यवस्था मैं यहां बनाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन कई विभागों ने इसे ठुकरा दिया.

सवालः आप भारत सरकार में कोल सचिव भी रहे हैं. एशिया की सबसे बड़ी कोलियरी आम्रपाली है. वहां सीबीआई की रेड हो रही है. 100-100 करोड़ के घपले की बात हो रही है. इसको आप कैसे देखते हैं.

जवाबः मुझे इसके बारे में ज्यादा आईडिया नहीं है. कोल इंडिया से अब मैं ज्यादा टच में नहीं हूं.

सवालः आप जब कोल इंडिया के सचिव का पद संभालने जा रहे थे, तो आपने अपने साथियों से पूछा था कि कोल इंडिया को किस तरह से डील किया जाए. आपके साथियों ने कहा था कि गैंग्स ऑफ वसेपुर देखें है ना बस उसी तरह से डील करना है. इसके क्या मायने हैं.

जवाबः गैंग्स ऑफ वसेपुर कहने का मतलब था कि यहां माफिया राज था. माफिया ही coal India को run करते थे. इस चीज को मैंने काफी नजदीर से महसूस किया. उसका कारण कुछ और था. माफिया का सिस्टम जो होता है वो कोयले की कमी से होता है. उत्पादन बढ़ाना ही उसका उपाय है और यही मैंने अपने कार्यकाल में किया.

सवालः आप झारखंड के ब्यूरोक्रेसी को क्या मैसेज देना चाहेंगे.

जवाबः मैं समझता हूं कि यहां की ब्यूरोक्रेसी एक Finest ब्यूरोक्रेसी में से एक है. काफी कठिन परिस्थितियों में ये काम कर सकते हैं. जो अच्छा काम हो रहे हैं, वो उजागर होने चाहिए और जो काम ठीक नहीं कर रहे हैं, जिनकी चर्चा मैंने अपने आर्टिकल में की थी. उनके साथ बैठकर चर्चा होनी चाहिए. उनको सुधारने का प्रयास होना चाहिए. लेकिन यह कह देना कि सब ठीक है, यह उचित नहीं है.

सवालः जिसे चिन्हित करने की बात आप कर रहे हैं, उन्हें कैसे चिन्हित करेंगे. क्या और वैसे पांच तरीके बताएंगे, जिसपर सरकार को गौर फरमाना चाहिए.

जवाबः 1) आप उनको ऐसे काम ना दें. जो critical है development के संदर्भ में.

2) जिनकी बारे में भ्रष्टाचार की शिकायते हैं. उनकी जांच समय पर करनी चाहिए.

3) जो अच्छा काम कर रहे हैं. जिन्हें reward दिया जा रहा है. उन्हें तो reward दें. लेकिन बाकी जो अच्छा काम कर रहे हैं उनकी पहचान कर उन्हें भी reward दी जाए. उन्हें यह शिकायत नहीं रहनी चाहिए कि उन्हें reward मिल रहा है और मुझे नहीं मिल रहा है. ईमानदार आदमी का reward शाबाशी होती है. उनके लिए पैसा कुछ नहीं है.

4) यह बिल्कुल clear होना चाहिए कि जिन्हें reward नहीं मिला है. उन्हें आखिर क्यों reward नहीं दिया गया.

5) जिसको जहां रखे हैं, उसे वहां लंबा रखें. Short tenure के लिए ना रखें. छह महीने आठ महीने के लिए तो कतई नहीं. झारखंड में शिक्षा विभाग में सुधार का कारण भी यही है. पहले अराधना लंबे समय तक के लिए रही उसके बाद एपी सिंह को भी लंबे समय तक काम करने का मौका मिला. गड़बड़ आदमी भी हो ना, तो उसको सजा देने के लिए भी समय देना चाहिए. उसको रखिए आप तीन साल और फिर अच्छे से हिसाब लीजिए उसका.

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