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हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटलाइट अंतरिक्ष से लैंडमाइंस भी ढूढ़ निकालने में सक्षम होगा

17 सालों में सेना के जवानों समेत 3700 से अधिक लोग लैंडमाइंस की चपेट में आने की वजह से मारे जा चुके हैं, लेकिन अब आगे जवानों की कीमती जिंदगी बचाई जा सकेगी

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NewDelhi :  एक स्टडी के अनुसार पिछले 17 सालों में सेना के जवानों समेत 3700 से अधिक लोग लैंडमाइंस की चपेट में आने की वजह से मारे जा चुके हैं, लेकिन अब आगे शायद  जवानों की कीमती जिंदगी बचाई जा सकेगी.  इसमें मददगार साबित होगा इसरो का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटलाइट. बता दें कि इसरो ने पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी सी-43 द्वारा 31 सैटलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है.  इसमें भारत का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटलाइट, HySIS भी शामिल है.  यह अंतरिक्ष में 600 किमी से भी अधिक ऊंचाई से लैंडमाइंस मैपिंग करने में सक्षम होगा.  जानकारी दी गयी है कि HySIS  का कैमरा इतना शक्तिशाली है कि यह कीचड़ या बर्फ पर टायरों के निशान, स्वस्थ व खराब फसलों में फर्क और जमीन में छिपे खनिजों की भी खोज कर सकता है.  अबतक अमेरिका और चीन जैसे कुछ देशों ने ही HySIS जैसी तकनीक अपने सैटलाइट में शामिल की है.

आईआईटी मद्रास के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर उदय खानखोजे के अनुसार   नियर इन्फ्रारेड औ शॉर्टवेब इन्फ्रारेड क्षमता वाले हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरे मिट्टी में 5 सेमी अंदर तक देख सकते हैं.  हालांकि उन्होंने कहा कि यह रेडार जितने उपयोगी नहीं हैं.  रेडार वेब एनर्जी भेज ज्यादा गहराई तक पता लगा सकता है.

HySIS जमीन का अध्ययन करने वाले सभी सैटलाइट से बेहतर

HySIS जमीन का अध्ययन करने वाले अभी मौजूद सभी सैटलाइट से बेहतर बताया गया है.  यह ज्यादा स्पष्ट तस्वीर देता है.  सैटलाइट एक्सपर्ट और इसरो के पूर्व चेयरमैन एएस किरण कुमार के अनुसार मनुष्य की आंख लाल, हरे और नीले रंग का कॉन्बिनेश ही देख सकती है.  हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजर्स इलेक्ट्रोमैगनेटिक स्पेक्ट्रम में किसी भी दो रंग के बीच में मौजूद रंगों की पहचान कर सकता है, उनकी तस्वीर ले सकता है.  HySIS का कैमरा धरती पर 55 अलग-अलग रंगों की पहचान कर सकता है.  यानी यह मिट्टी, इसके नीचे दबी चीजें, यहां तक कि जमीन के नीचे मेटल और मिनरल्स की भी पहचान कर सकता है.   यहां तक कि यह जीवित और मृत पौधों में फर्क भी कर सकता है.  लेकिन यह सिंथेटिक अपर्चर वाले सैटलाइट की तरह अंधेरे में नहीं देख सकता है. सूरज की रोशनी में इसकी देखने की क्षमता हमारे एक मीटर तक की दूरी तक की चीजों को देखने की क्षमता के बराबर होगी.  सर्विलांस के अलावा खेती, फॉरेस्ट्री, कोस्टल जोन की निगरानी, धरती के नीचे पानी, मिट्टी और दूसरे जियोलॉजिकल इन्वायरनमेंट्स के लिहाज से मददगार होगा.

इसरो के अधिकारियों ने बताया कि 2008 में IMS-1 एक्सपेरिमेंटल सैटलाइट में पहली बार ऐसे कैमरे का इस्तेमाल हुआ था.  अमेरिका और चीन जैसे कुछ ही देश हैं जिन्होंने इस टेक्नॉलजी को अपने सैटलाइट में इस्तेमाल किया है.   इस सैटलाइट में डिटेक्टर आरे चिप अहमदाबाद के स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर ने डिजाइन की है.  इसे चंडीगढ़ की सेमी कंडक्टर लैबरेटरी ने बनाया है.  बता दें कि यह चिप 1000*66 पिक्सल्स को रीड कर कती है.

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