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चुनावी साल में निगम के लिए सिरदर्द बना स्वच्छता सर्वेक्षण, घट सकती है रैंकिंग

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  • केवल 28 दिनों में ही निगम को दिखानी होगी स्वच्छ रांची
  • नुक्कड़ नाटक से ही ओडीएफ करना संभव नहीं, सीवरेड-ड्रेनेज योजना लटकी है अधर में
  • बायो कम्पोस्टिंग मशीन खरीदने के लिए सूडा दे सकता है चार करोड़ का फंड
  • नहीं निकाला जा सका है डस्टबिन खरीदने का टेंडर
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Ranchi : 2019 के चुनावी साल में स्वच्छता सर्वेक्षण कार्य रांची नगर निगम के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है. गत वर्ष की रैंकिंग को बरकरार रखना निगम के लिए जहां बड़ी चुनौती है, वहीं शहर की स्वच्छता के लिए सिटीजन फीडबैक लेना निगम के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है. कारण है सर्वेक्षण के लिए इस बार निगम को काफी कम समय का मिलना. यह सर्वेक्षण चार जनवरी से शुरू हुआ है. जबकि, लोकसभा चुनाव के पहले लगनेवाली आचार संहिता को ध्यान में रख सर्वेक्षण कार्य 31 जनवरी तक ही होगा. इस तरह केवल 28 दिनों में निगम को अपनी उपलब्धि गिनानी है. इसी अवधि में शहरवासियों को स्वच्छता सर्वेक्षण में फीडबैक भी देना है. इन सबके उलट हकीकत यह है कि सर्वेक्षण कार्य को लेकर निगम ने अपने स्तर पर अभी तक कोई विशेष प्रयास नहीं किया है. स्वच्छता के प्रसार और ओडीएफ जैसे कार्य के लिए नुक्कड़ नाटक तो शुरू हुआ है, पर सीवरेज-ड्रेनेज और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का कार्य अधूरा है. विभिन्न वार्डों में बायो कम्पोस्टिंग मशीन (करीब चार करोड़ की लागत से) और डस्टबिन लगाने के लिए निगम ने एक पहल की है. लेकिन, निगम को पहले से लगी मशीनों की स्थिति की स्पष्ट जानकारी नहीं है, वहीं डस्टबिन लगाने के लिए अभी भी टेंडर भी नहीं निकाला जा सका है.

शुरू हुआ सर्वेक्षण, निगम ने की कुछ पहल

मालूम हो कि देशभर में स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 की शुरुआत शुक्रवार (चार जनवरी) से शुरू हो गया है. स्वच्छता की जानकारी देने के लिए निगम ने पहले दिन अल्बर्ट एक्का चौक पर नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया. इस दौरान शौचालय, सफाई जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया. सिटीजन फीडबैक की अपील करते हुए स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 का वेबसाइट लिंक भी निगम ने जारी किया है. इसके अलावा शहर के सभी 53 वार्डों में बायो कम्पोस्टिंग मशीन और टिन के बने डस्टबिन को भी लगाने की पहल की जानी है.

चार करोड़ की लागत से खरीदी जायेगी बायो कम्पोस्टिंग मशीन

जानकारी के मुताबिक, स्वच्छता के लिए सभी वार्डों में लगनेवाली बायो कम्पोस्टिंग मशीन के लिए स्टेट अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी (सूडा) ने अपने स्तर पर फंड जारी करने की सहमति निगम को दे दी है. सूडा के मुताबिक 50 किलोग्राम कूड़ा के लिए एक मशीन की लागत करीब 3.50 लाख रुपये तक आती है, लेकिन विभिन्न वार्डों की जनसंख्या को देख 50 किलोग्राम की जगह 100 किलोग्राम की बायो कम्पोस्टिंग मशीन लगानी पड़ेगी. एक मशीन की लागत करीब 7.5 लाख रुपये आने का अनुमान है. इस तरह 53 वार्डों की मशीन के लिए कुल लागत करीब चार करोड़ रुपये पड़ेगी. उपरोक्त मशीन के अलावा निगम ने नागरिक सुविधा फंड के तहत मधुकम, डेली मार्केट, बस स्टैंड में भी इस तरह की मशीन लगाने का फैसला किया है.

डस्टबिन के लिए निगम नहीं निकाल सका टेंडर

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बोर्ड बैठक में स्वच्छता को लेकर निगम ने विभिन्न वार्डों के लिए टिन का डस्टबिन खरीदे जाने का फैसला किया था. इसके लिए टेंडर निकालने की बात कही गयी थी. स्वच्छता सर्वेक्षण कार्य शुरू हो गया है, लेकिन अब तक इसके लिए टेंडर नहीं निकाला जा सका है और न ही डस्टबिन का कोई रेट निर्धारित हुआ है. अगर यह टेंडर अगले दो से तीन दिन में निकाला जाता है, तब भी इसकी कोई गारंटी नहीं है कि 31 जनवरी तक टेंडर पूरा हो ही जायेगा.

सॉलिड वेस्ट और सीवरेज-ड्रेनेज योजना घटा सकती है रैंकिंग

स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए निगम के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बनी है सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और सीवरेज-ड्रेनेज योजना. रांची शहर में कूड़ा-कचरा कलेक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और डिस्पोजल का काम करने के लिए निगम ने एस्सेल इन्फ्रा कंपनी को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बनाने का जिम्मा दिया था. लेकिन, यह प्लांट अब तक नहीं बन पाया है. हालांकि, इसके लिए निगम ने इस बार कबाड़ीवालों की मदद ली है. लेकिन, केवल इनके भरोसे सॉलिड वेस्ट सेग्रीगेशन कार्य को पूरा करना संभव नहीं है. ठीक इसी तरह से सीवरेज-ड्रेनेज योजना भी अभी तक अधर में लटकी पड़ी है. ऐसे में ओडीएफ को लेकर सर्वेक्षण 2019 में रैकिंग में कमी आने की पूरी संभावना है. मालूम हो कि स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 की रैंकिंग में रांची को 21वां स्थान मिला था. इसके साथ ही सिटीजन फीडबैक में रांची ने बाजी मारते हुए देशभर में पहला स्थान प्राप्त किया था.

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