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भाजपा राज में झारखंड में भुखमरी और कुपोषण

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  • आदिवासी-मूलवासियों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का हनन
  • क्या 2019 में विपक्ष की नज़र इस मुद्दे पर पड़ेगी?

Siraj Dutt

पिछले दो वर्षों में झारखंड में कम-से-कम 19 लोगों की भूख से मौत हुई है. इनमें से 9 आदिवासी, 5 दलित और 5 पिछड़े समुदाय के थे. इन सभी के परिवारों के लिए पर्याप्त भोजन व पोषण का अभाव सामान्य बात थी. कई परिवारों में तो महीनों से दाल तक नहीं बनी थी. मरने के दिन घर में न तो अनाज था और न ही पैसे. परिवार के सदस्यों के पास आजीविका और रोज़गार के पर्याप्त साधन भी नहीं थे. दुमका के कोलेश्वर सोरेन ने तो मरने के एक महीने पहले केवल 250 रु और 1.5 किलो चावल के लिए अपने पलाश के पेड़ तक को बेच दिया था.

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ये मौतें झारखंड में व्यापक भुखमरी की स्थिति की सूचक मात्र है. राज्य की बड़ी आबादी को भूख का सामना करना पड़ता है. पांच वर्ष से कम आयु के 40 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे कुपोषित हैं. हाल के एक सर्वेक्षण में यह पता चला है कि परहैया जनजाति की लगभग आधी आबादी को भूख से जूझना पड़ता है.

खाद्य असुरक्षा की स्थिति में जी रहे परिवारों के लिए सामाजिक-आर्थिक अधिकार जैसे राशन, मध्याह्न भोजन, आंगनवाड़ी सेवाएं, पेंशन, मनरेगा में काम आदि जीवनरेखा समान हैं. भूख से मौत के शिकार हुए अधिकांश परिवार विभिन्न कारणों से जन वितरण प्रणाली से मिलने वाले अनाज से वंचित थे. कुछ एकल महिलाएं व वृद्ध सामाजिक सुरक्षा पेंशन से वंचित थे. कई महीनों से मनरेगा में काम भी नहीं मिला था. साथ ही, इन तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच न के बराबर थी.

इन मौतों ने उजागर कर दिया है कि भाजपा सरकार जन कल्याणकारी योजनाओं को लगातार कमज़ोर कर रही है. राज्य में 2015 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बावजूद भी कई वंचित परिवारों का राशन कार्ड नहीं बना है. आधार से न जुड़ने के कारण पिछले तीन वर्षों में लाखों राशन कार्डों को ‘फ़र्ज़ी’ बोलकर रद्द भी किया गया है. जन वितरण प्रणाली में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन की अनिवार्यता के कारण हर महीने लाखों कार्डधारी राशन नहीं ले पाते. इस व्यवस्था के कारण अब कार्डधारियों के लिए अनाज लेने के लिए राशन दुकान के चक्कर कांटना आम बात हो गयी हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार, हर आदिम जनजाति परिवार को अन्त्योदय राशन कार्ड मुहैया कराना है. लेकिन राज्य के अनेक आदिम जनजाति परिवारों के इस अधिकार का हनन हो रहा है. भाजपा सरकार अनाज की कालाबजारी के लिए ज़िम्मेदार भ्रष्ट डीलरों एवं अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई न कर राज्य की गरीब जनता को ही राशन से वंचित कर रही है.

बच्चों के पोषण के लिए मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी कार्यक्रम अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. लेकिन सरकार की ओर से इन्हें सुदृढ़ करने के कम प्रयास दिखते हैं. भाजपा ने मध्याह्न भोजन में बच्चों को मिलने वाले अण्डों की संख्या बढ़ाने के बजाए कम कर दिया है. साथ ही, आंगनवाड़ियों में बच्चों को सड़े अंडे दिए जा रहे हैं. सुनसान और बंद पड़े आंगनवाड़ी केंद्र राज्य में सामान्य बात है. आंगनवाड़ियों में न समय पर पर्याप्त पोषण मिल रहा है और न ही बच्चों को शिक्षा. प्राथमिक स्वास्थ सेवाओं को सुदृढ़ करने की बजाए भाजपा सरकार ने निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों को फ़ायदा दिलाने के लिए आयुष्मान भारत योजना शुरू कर दी.

राज्य के लगभग आधे वृद्ध, विधवा व विकलांग सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं के दायरे से बाहर हैं. पेंशन योजना या बैंक खाते से आधार का जुड़ाव न होने के कारण पिछले तीन वर्षों में सरकार ने व्यापक पैमाने पर हजारों पेंशनधारियों को पेंशन योजना से हटा दिया है.

औपचारिक रोज़गार के साधनों की कमी में झारखंड के मज़दूरों के लिए मनरेगा अत्यंत महत्त्वपूर्ण सहारा है. लेकिन आजकल गावों में मनरेगा की कच्ची योजनाएं ना के बराबर चलती हैं. झारखंड में पिछले चार सालों में आदिवासी और दलित परिवारों का कुल मनरेगा मज़दूरी में हिस्सा 50% से गिर कर 38% हो गया. सरकार ने फ़र्ज़ी और डुप्लीकेट जॉब कार्ड रद्द करने के नाम पर लाखों मज़दूर परिवारों को उनके काम के कानूनी अधिकार से ही वंचित कर दिया है. एक ओर रघुवर दास सरकार अपने को भ्रष्टाचार विरोधी बताती है, वही दूसरी ओर उसके राजनीतिक संरक्षण में ठेकेदारों एवं स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से करोड़ों की मनरेगा राशि की फ़र्ज़ी निकासी हो रही है. भाजपा नरेगा मज़दूरों को बंधुआ मज़दूर बनाकर रखना चाहता है. झारखंड की नरेगा मज़दूरी दर देश में सबसे कम है और राज्य के न्यूनतम दर से 67 रु कम है.

केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारें लगातार देश और राज्य की आर्थिक वृद्धि का ढिंढोरा पीटती हैं. लेकिन लोगों के पर्याप्त भोजन, पेंशन, पोषण, रोज़गार और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उनके पास पैसे नहीं है. और न ही इन योजनाओं को सही रूप से कार्यान्वित करने की मंशा. एवं कॉर्पोरेट कंपनियों के फायदे के लिए जन कल्याणकारी योजनाओं में आधार थोपा जा रहा है जिसके कारण बड़े पैमाने पर लोग अपने मौलिक सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से वंचित हो रहे है.

राज्य में विपक्षी महागठबंधन बनने की संभावना दिख रही है. क्या महागठबंधन की नज़र झारखंड में व्यापक भुखमरी और कुपोषण पर पड़ेगी?

ये लेखक के निजी विचार हैं

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