Opinion

आम आदमी की क्रय शक्ति कैसे बढ़ेगी- वित्तमंत्री के राहत पैकेज में फिलहाल इसका साफ जवाब नहीं है

Faisal Anurag

बीस लाख करोड़ की घोषणा के बावजूद सरकार की सबसे बड़ी चुनौती लोगों की क्रयशक्ति में इजाफा करना है. वित्तमंत्री के पैकेज में जो विवरण हैं, इससे यह भरोसा नहीं पैदा हो पा रहा है कि आखिर आम आदमी की क्रय शक्ति किस तरह बढ़ेगी. बाजार की गतिविधि लोगों की क्रयशक्ति पर ही निर्भर करती है. वित्तमंत्री ने लघु व मध्यम उद्योगों के लिए तीन लाख करोड़ के सहज कर्ज का प्रावधान किया है. यह बड़ी घोषणा है.

जिसका स्वागत भी हुआ है. लेकिन बेरोजगार हुए 14 करोड़ श्रमिकों के लिए जिस आर्थिक राहत की प्रतीक्षा है, वित्तमंत्री के आगे  की घोषणाओं में उस पर कितना ध्यान दिया जाता है, इससे देश की इकोनोमी की दिशा तय होगी. हालांकि प्रवासी मजदूरों के लिए केंद्र 11 हजार करोड़ देगा. इस राशि से उनके तत्काल रहने, तीन वक्त का खाना और दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. लेकिन क्रय शक्ति, जो बाजार की नियामक होती, उसका सवाल बना ही रहता है.

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 वित्तमंत्री की घोषणा का एमएसएमई के राष्ट्रीय संगठन के सचिव अनिल भारद्वाज ने स्वागत किया है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि उन की तीन प्रमुख मांग रही हैं. उसमें एक तो पूरा हुआ है. लेकिन दो पर सरकार ने अभी कोई बात नहीं कही है. एमएसएमई की मांग है कि लॉकडाउन पीरियड में श्रमिकों के देय वेतन का भार सरकार वहन करे.

क्योंकि एमएसएमई भार वहन करने की स्थिति में नहीं हैं. और पहले से लिये गये कर्ज के भुगतान और सूद को ले कर भी सरकार को मदद देनी चाहिए. दोनों ही बड़ी मांगें हैं. नकदी की मांग को ले कर भी सरकार ने कुछ खास भरोसा नहीं दिया है. इस समय लघु और मझोले उद्योग की मुसीबतें सिर्फ कर्ज से कितनी दूर होगी, इसे ले कर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है.

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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर प्रो रघुराम राजन ने तत्काल ग्रामीण भारत के लिए 65 हजार करोड़ की मदद की मांग की थी. और नोबेल लॉरेट अभिजीत बनर्जी ने हर जनधन खाते में धन देने की बात कही थी. ताकि आमलोगों की क्रयशक्ति प्रभावित हो. कैपिटल आफ ट्वेंटीफस्ट् संचुरी के एक लेख में थॉमस पिकेटी के सुझाव भी इसी तरह के हैं.

दुनिया की सर्वाधिक चर्चित इकोनोमिस्ट पिकेटी ने लोगों की न्यूनतम आय योजना पर जोर दिया है. और आर्थिक विषमता दूर करने के उपाय करने का भी सुझाव दिया है.

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इन सवालों के बीच  राहत पैकज को समझा जा सकता है. एक जानकार पंकज मिश्र ने तो इस पैकेज को ले कर कई बुनियादी सवाल उठाए हैं. जिन पर गौर करने की जरूरत है. अर्थशस्त्री प्रमीण झा के विचार भी कुछ इसी तरह के हैं. पंकज मिश्र के अनुसार डिमांड नहीं होगी तो कुछ नहीं होगा. पब्लिक के पास पैसा होगा तो छोटे हो या बड़े उद्योगपति, दौड़-दौड़ कर फैक्ट्री चलाएंगे. पैसा खुद अरेंज कर लेंगे. चाहे उनको लोन मिले न मिले. देश में उद्योगपतियों की कौम ऐसी मोहताज कौम नही है. जैसा कि मीडिया और उनके माउथपीस experts समझाते हैं .

मार्केट paying capacity पर निर्भर होता है. कोई रिक्शेवाले को हेल्थ इंश्योरेंस नहीं बेचता  न कोई उसे फ्लैट खरीदने के लिए pursue करेगा. फैक्ट्री चलेगी तो रोजगार मिलेगा, रोजगार मिलेगा तो पब्लिक के हाथ में और पैसा आएगा. साथ ही उन्होंने कहा है : मोदी जी के पैकेज से आमलोगों को कोई मदद नहीं मिलने वाली. यह मदद उद्योग धंधा करने वाले को मिलेगी. और जैसा कि पुराना अनुभव बताता है कि इससे सबसे अधिक फायदा लोन बांटने वाले बैंकरों को होगा.

इस समय भारत की इकोनोमी अपने सबसे बुरे दिनों में है. और बेरोजगारी की दर चरम पर है. केवल लॉकडाउन के समय ही 13 करोड़ लोगों के राजगार गए हैं. यह बेहद गंभीर स्थिति है. दुनिया के अनेक देशों ने अपने राहत पैकजों में श्रमिकों की हितों का पूरा ध्यान रखा है. खास कर कुवैत जेसे छोटे देश ने तो एक मॉडल पेश किया है.  

उसने अपने देश के प्रत्येक नागरिक और वर्किंग वीजा वालों के लिए वालों के लिए विशेष प्रावधान करते हुए इस पूरे दौर का मकान किराया तो माफ किया ही है, हर व्यक्ति को क्रयशक्ति को बनाए रखने के लिए भी कई तरह के राहत दिए हैं. कुवैत दुनिया के उन देशों में है, जो तेल और गैस के भंडार के लिए हमेशा बड़ी ताकतों के आकर्षण में रहता है. इसी कुवैत ने श्रमिक हितों के लिए अपने खजाने को खोल दिया है. इसका प्रभाव खाड़ी के अन्य देशों पर भी पड़ा है. वैसे रोजगार वहां भी गए हैं. लेकिन जिनके राजगार गए हैं, उनके लिए भी कुवैत की सरकार ने प्रबंध किया है.

भारत की चुनौती तो कहीं बड़ी है. क्योंकि भारत एक बड़ी श्रमशक्ति वाला देश है. इसलिए इस श्रमशक्ति के लिए केवल संकल्प, संयम या संघर्ष की बात नहीं की जानी चाहिए. बल्कि इनके लिए बीस हजार करोड़ में हिस्सेदारी भी दी जानी चाहिए.

43 दिनों में मनरेगा के लिए 10 हजार खर्च करने की बात वित्तमंत्री ने की है. न्यूनतम मजदूरी को 182 रुपये से बढ़ा कर 202 रुपये करने की बात की गयी है. मनरेगा के तहत 2.33 करोड़ लोगों के राजगार की मांग को इनरोल करने की घेषणा भी सरकार ने की है. देखना होगा इन घोषणाओं का कितना असर लोगों की क्रयशकित पर पड़ता है. सरकार की घेषणाओं और विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों के सुझाव में भारी अंतर है.

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