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बड़े प्रकाशनों की इस भूल को कैसे देखा जाना चाहिये

Priyadarshan

कुछ देर के लिए कल्पना करें कि अंकित नरवाल ने नामवर सिंह की जीवनी न लिखी होती तो क्या होता? राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘आमने सामने’ में तथ्य की यह‌ चूक बनी रहती कि नामवर सिंह कभी संघ परिवार से जुड़े थे.

इसके तीस-चालीस बरस या इसके भी बाद, जब नामवर सिंह के समकालीन या उत्तरकालीन वे लोग नहीं रहे होते जो कह सकते हैं कि हमने नामवर को देखा है तो फिर क्या होता? ‘आमने सामने’ की चूक उनके सुयोग्य पुत्र द्वारा प्रस्तुत एक प्रमाण में बदल गई होती. ‌यह इतिहाससम्मत तथ्य हो गया होता कि नामवर सिंह शुरू में संघ परिवार से जुड़े थे.

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हिंदी की साहित्यिक आलोचना के इतिहास में मेरी न गति है न दिलचस्पी, इसलिए इस विवाद पर बोलने का अधिकार मुझे नहीं है.

लेकिन एक लेखक और पत्रकार होने के नाते मैं यह जानता हूं कि तथ्य कितने महत्वपूर्ण होते हैं और उनके लिए ज़िम्मेदारी कैसे तय होती है. तो मेरे लिए पहला सवाल ही बनता है कि आखिर राजकमल प्रकाशन जैसे बड़े संस्थान से यह चूक कैसे हुई? वह कौन शख्स था जिसने एक अखबार में छपे दो अलग-अलग साक्षात्कारों को फेंट कर नामवर सिंह को संघ की शाखा का मृग बना डाला?

फिर हिंदी के दिग्गज माने जाने वाले तथाकथित आलोचकों ने दो साल तक इसे नज़रअंदाज कैसे किया? जो नामवर सिंह से प्रेम करने का दावा करते हैं, क्या उनमें से किसी ने यह किताब नहीं पढ़ी? क्या राजकमल प्रकाशन की संपादकीय टीम ने इस किताब का एक बार भी अध्ययन नहीं किया? और अगर किया तब क्या यह सवाल उनके भीतर नहीं उठा कि इस तथ्य को चेक किया जाना चाहिए? या उन्होंने भी मान लिया कि नामवर जी के पुत्र ने जो दिया है, वह प्रामाणिक ही दिया होगा? क्या नामवर सिंह के बेटे को इस किताब के संपादन की ज़िम्मेदारी बस राजकमल ने इसीलिए सौंप दी कि वह नामवर के पुत्र हैं. और भारत में बेटा ही बाप की विरासत का हक़दार होता है?

अंकित नरवाल और आधार प्रकाशन से निश्चय ही चूक हुई, लेकिन यह वही चूक है जो सिर्फ राजकमल प्रकाशन ने नहीं, पूरे हिंदी संसार ने की. यह दो प्रकाशनों के अंदरूनी कक्ष से निकली गलती भर नहीं है बल्कि हिंदी के सार्वजनिक संसार में दो साल तक तैरती रही एक गलती है. जिसे हमने तब तक बनाए रखा जब तक किसी एक सजग पाठक या आलोचक ने इसकी ओर ध्यान नहीं खींचा. अंदेशा यह है कि हिंदी साहित्य की आलोचना से जुड़ी अन्य किताबों में भी ऐसी अप्रामाणिक सूचनाओं की बाढ़ न हो,

क्योंकि इनकी जांच के लिए या इनकी पुनर्पुष्टि के लिए न हिंदी के प्रकाशन तंत्र में कोई व्यवस्था है और न ही हिंदी की अकादमिक दुनिया में. बेशक इसके कुछ ज़िम्मेदार खुद नामवर सिंह भी थे. जिन्होंने हिंदी के अकादमिक संसार को काफी कुछ फैलाया लेकिन उसे ऐसी लापरवाहियों की सांस्थानिक निगरानी का संस्कार नहीं दिया.

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शुक्र है कि ‘राजकमल’ और ‘आधार’ दोनों अपनी प्रकाशित पुस्तकें वापस लेने और उन्हें नए सिरे से प्रकाशित करने का आश्वासन दे चुके हैं. लेकिन इस प्रसंग में अंकित नरवाल के लिए ही नहीं, हम तमाम लोगों के लिए कई सबक छुपे हैं- एक तो यह भी है कि हिंदी की दुनिया अपनी खामियों को दूर करने की जगह उनका इस्तेमाल पहले अपना-अपना पक्ष चुन कर दूसरों पर हमला करने में करती है. यह प्रवृत्ति कुछ कम हो तो ज़्यादा वस्तुनिष्ठ और तथ्यपरक काम हो.

(वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार प्रियदर्शन का यह आलेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है)

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