NEWSOpinion

मीडिया की स्वतंत्रता को किस तरह प्रभावित कर रहा है सत्ता पक्ष, संदर्भः अखबारों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन पर बैन!

Faisal Anurag

यह तो दब्बूपन की संजीदा त्रासदी है कि अधिकतर मीडिया ने सत्ता प्रतिष्ठानों के समक्ष बेशर्म आत्मसर्मपण कर दिया है. वह न तो अपने पर होने वाले प्रहारों का जबाव देता है और न ही तथ्यों को प्रस्तुत करने का साहस ही दिखा पा रहा है. केंद्र और ज्यादातर राज्य सरकारों ने जितना नियंत्रित करने का प्रयास किया है उससे कहीं अधिक मीडियाकर्मियों के दंडवत होने की प्रवृति है. इमरजेंसी के समय भी इस तरह का माहौल नहीं देखा गया था.

तब तो न ही मीडिया और न ही मीडियाकर्मियों ने स्वतः समर्पण किया था. अपवाद तब भी थे और अब भी हैं. कुछ ही मीडिया समूह हैं जो सच कहने का साहस दिखा रहे हैं. मीडियाकर्मियों और मीडिया पर होने वाले हमलों का सामूहिक विरोध करने में भी जिस तरह की भूमिका दिखती है, वह भी कम घातक नहीं है. हिंदी मीडिया तो इसमें अव्वल है.

advt

इसे भी पढ़ें: अब आदिवासी समाज को अपने पक्ष में करने के लिए संघर्ष कर रही है भाजपा

हिंदी मीडिया ने तो प्रतिरोध और तथ्यों के लिए खड़े होने की अपनी विरासत को ही जमींदोज सा कर दिया है. मीडिया के अनेक अध्येताओं ने मीडिया पर सत्ता वर्चस्व के इस दौर को लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक दौर  के रूप में शिनाख्त किया है. भारत इस समय मीडिया स्वतंत्रता के विश्व मापदंड में 172 देशों में 140वें स्थान पर है.

यह भी जाहिर करता है कि एक तरफ सत्ता मीडिया स्वतंत्रता को विभिन्न तरीकों से बाधित करती है दूसरी ओर हिंदी मीडिया में जिस तरह सत्ता को ले कर रुझान है वह तो बेहद चिंताजनक प्रवृति को ही रेखांकित कर रहा है.

टेलिग्राफ- आनंद बाजार पत्रिका समूह, द हिंदू और टाइम्स ऑफ इंडिया को दिये जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर केंद्र सरकार ने रोक लगा दी है. लोकसभा में बोलते हुए कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस तथ्य को उजागर किया है.

adv

टेलिग्राफ और द हिंदू ने पिछले दिनों साहस के साथ मोदी सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामयाबियों पर कई रिपोर्ट प्रकाशित की थी. द हिंदू ने रफाल मामले में जिस तरह दस्तावेजों को प्रकाशित किया उससे मोदी सरकारी की नाराजगी बढ़ी है. खबरों के अनुसार केंद्र सरकार ने इन मीडिया समूहों को सबक देने के मकसद से ही यह कदम उठाया है.

इसे भी पढ़ेंः क्या भाजपा की आक्रामक राजनीति का मुकाबला करने को तैयार हैं झारखंड के विपक्षी दल

तथ्य के उजागर होने पर जिस तरह मीडिया ने उपेक्षा का भाव दिखाया वह उसकी लाचारगी को ही सत्यापित कर देता है. महिमामंडन करने में दक्ष होने वाले प्रचारतंत्र के रूप में अधिकतर मीडिया ने अपनी भूमिका तय कर ली है. हिंदी मीडिया के बड़े संस्थानों का हाल तो और भी बुरा है. उनके छपे या दिखाये गये खबरों की भाषा और संख्या यह बताने के लिए काफी है कि उनका उस विरासत से कोई लेना देना नहीं बचा है जिसे हिंदी मीडिया के पुरखों ने जान की बाजी लगा कर विकसित की थी.

अधिकतर मीडिया के न्यूज रूम और संपादकीय बहसों का लब्बोलुआब यह है कि कि उन्होंने न केवल सामाजिक और वैचारिक विविवधता का त्याग कर दिया है, बल्कि इस दिशा में अब उनकी सोच एकात्मकता की परिचायक है.

आमतौर पर सरकारों ने सरकारी विज्ञापन को मीडिया को अपने अनुकूल करने का हथियार बना लिया है.  लेकिन इसका दुखद पहलू यह है कि मीडिया ने इस हालात को आतमसात् कर घुटनाटेकू प्रवृति का ही परिचय दिया है. बल्कि इसकी होड़ सी लग गयी है. लेकिन इस प्रवृति का घातक दौर मीडिया का सत्ता अनुकूल प्रचार तंत्र का स्वतः हिमायती बनना है. और इसके मूल में पाठकों के विचार को स्टेबलिश्मेंट के अनुकूल करना है.

दुनिया के बड़े लोकतंत्र के मीडिया ने कारपारेट दौर के वर्चस्व के बावजूद संपादकीय स्वतंत्रता को बुलंदी दी है. अमरीका में तो ट्रंप और मीडिया के टकराव ने मीडिया स्वतंत्रता के संघर्ष को मजबूत ही किया है. लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की मीडिया के संदर्भ में यह बात नहीं कही जा सकती है. आपातकाल के समय जनसंघ के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि मीडिया को झुकने के लिए कहा गया लेकिन वह रेंगने लगा. यह तब कहा गया था जब कई मीडिया समूहों के प्रकाशनों ने इमरजेंसी के विरोध में संपादकीय  को खाली छोड़ा था या काला रखा था.

21वीं सदी के इस दूसरे दशक के आखिरी सालों में यह नहीं कहा जा सकता कि बड़े मीडिया संथान तथ्यों की हिफाजत के लिए प्रतिरोध में साझा खड़े होंगे. और न झुकने की प्रतिबद्धता दिखायेंगे. इस दौर में भी अनेक ऐसे मीडियाकर्मी हैं जो साहस के साथ तथ्यों को उजागर कर रहे हैं. और उसकी कीमत भी चुका रहे हैं. जेल से लेकर ट्रोल तक हर किस्म की प्रताड़ना के वे शिकार हैं. इन मीडियाकर्मियों ने गणेश शंकर विद्यार्थी की विरासत को ही आगे बढ़ाया है. मीडिया के अंदर जिस तरह के सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हुए हैं, वह भी लोकतंत्र में विविधता और बहुलता के लिए खतरनाक संकेत हैं.

हिंदी अखबार भले ही प्रसार और विज्ञापनों की समृद्धि के दौर का दावा करें लेकिन पत्रकारिता के सारतत्व की दरिद्रता के वे शिकार हो गये हैं. हिंदी पत्रकारिता में इस तरह के जड़ दौर का इतिहास कभी नहीं रहा है. हिंदी पत्रकारिता जनगण की सांसों और धडकनों के साथ जुड़े होने के बेमिसाल इतिहास के दौर से अपनी पहचान बना सकी है.

मीडिया के लिए आत्म परीक्षण का समय तेजी से गुजरता जा रहा है. खबरों को तथ्यात्मक तरीके से प्रस्तुत करने की चुनौती को ज्यादा देर तक टालना उनके लिए एक ऐसे अंधेरे सुरंग का निर्माण कर रहा है, जहां से निकलना असंभव हो जायेगा. मीडिया के बारे में जब यह टिप्पणी की जाती है कि उसने लोकतांत्रिक गरिमा के अनुकूल अपनी भूमिका का दायित्व निर्वहन से पीछा छुड़ा लिया है. यह बेहद तकलीफदेह है. दुनियाभर में  आज भारतीय मीडिया को साख के संकट के दौर से गुजरना पड़ रहा है.

इसे भी पढ़ेंः दुविधाग्रस्त विपक्षी दलों के समक्ष अस्तित्व का गहराता संकट

 

 

 

 

 

 

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button