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छोटे निवेशकों का कैसे बने बाजार!!

भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. आजादी के लगभग सात दशकों के बाद भारत अब जाकर एक ऐसी स्थिति में पहुंचा है,

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Rajesh Das 

भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. आजादी के लगभग सात दशकों के बाद भारत अब जाकर एक ऐसी स्थिति में पहुंचा है, जहां पूरे देश को अब एक देश एक मार्केट के रूप में रूपांतरित किया जा सका है.  GST आधारित एक ताकतवर और एकीकृत टैक्स व्यवस्था का लाभ, प्रारंभिक झटकों के बाद और हरेक वर्ग के व्यापारिक संगठनों के सुझावों के अनुरूप जल्द ही भारत की समूची अर्थव्यवस्था को समेकित रूप में प्राप्त होने लगेगा. नरेंद्र मोदी एप्प पर IIFL के द्वारा पोस्ट की गयी जानकारी के अनुसार GST अकेले भारत की अर्थव्यवस्था को 01% तक बढ़ा देगा और इसके साथ ही भारत की स्थिति वैश्विक प्रतिद्वंदिता के स्तर पर बहुत ही अच्छी हो जायेगी. मोदी सरकार के ही आंकड़ों के अनुसार देश में FDI भी काफी बढ़ गया है और साथ ही मेक इन इंडिया की वजह से अब देश में बहुत बड़े निवेश भी होने शुरू हो गये हैं. जिसका सीधा लाभ आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन के क्षेत्र में  देखने को मिलेगा.

राज्य सरकारों की पहल की वजह से भी देश के लगभग हर निवेश के माकूल स्थानों में देश और विदेश के कार्पोरेट्स अब पैसे लगाने के लिए तेज गति से आगे आ रहे हैं, जैसे झारखंड राज्य में ही 2017 में मोमेंटम झारखंड के बैनर तले  अकेले 3.19 लाख करोड़ रुपए के निवेश के लिए MoU हस्ताक्षरित किये गये थे, जिसपर वर्तमान के वास्तविक निवेश, रोजगार आदि की जानकारी इस ब्लॉग को लिखते समय तक अप्राप्त है.

  निवेश पैटर्न में भी बहुत बड़ा बदलाव पिछले वर्षों में देखने को मिला है

विभिन्न प्रकार के सरकारों की इन तमाम निवेशोन्मुख प्रयासों की वजह से देश में काम कर रही कंपनियों की संख्या में भी बहुत बड़ी वृद्धि होने का अनुमान लगाया जा रहा है. अब आगे आकर भारत की अर्थव्यवस्था में हाथ बंटाने के लिए इन कंपनियों को निवेशकों की एक बहुत बड़ी संख्या की आवश्यकता होगी और बड़े सांगठनिक निवेशकों, बैंकों आदि के अलावा एक बहुत बड़े धन की उगाही शेयर बाज़ारों के जरिये रिटेल और छोटे सांगठनिक निवेशकों के सहयोग से ही पूरी की जायेगी. कंपनियों को शेयर बाजारों में लिस्टेड कर या पुरानी कंपनियों के ही वैल्यू को अनलॉक कर या QIP, OFS, नये IPO आदि के जरिये इस अभियान को सामान्यतः पूर्ण किया जायेगा.भारत की बड़ी आबादी के वित्तीय जागरुकता और निवेश पैटर्न में भी बहुत बड़ा बदलाव पिछले वर्षों में देखने को मिला है. वे अब शेयर बाजारों के जरिये स्मार्ट निवेश कर अच्छा पैसा बना लेते हैं और अपने वित्तीय लक्ष्यों को पूर्ण करते हैं. भारत की पेशेवर युवा आबादी अब अपने बड़ों को भी निवेश के ऊपर अच्छे और क्षेत्र आधारित सुझाव देती है और शेयर बाजार के रास्ते उन्हें देश के अर्थव्यवस्था की भी अच्छी समझ हो गयी है.

भारत के शेयर बाजारों ने एक लंबा सफर तय किया है

1875 में बॉम्बे में सांगठनिक रूप से शुरू होकर और अप्रैल 1988 में SEBI के गठन से अब तक भारत के शेयर बाज़ारों ने भी एक लंबा सफर तय किया है. बीच में हर्षद मेहता, पारेख और राजू कांड को छोड़ दिया जाये, तो आम तौर पर शेयर बाजारों के जरिये टिक कर रहने वाले निवेशकों ने काफी अच्छा पैसा बनाया है. प्रेरक निवेशकों जैसे राकेश झुनझुनवाला, आरके दमानी और पोरिंजू वेलियाथ आदि ने भी युवा आबादी को भारत की शेयर बाजारों की ओर सफलतापूर्वक मोड़ा है. फिर भी हालिया घटनाएं, जैसे चंदा कोचर, दीपक कोचर और विडियोकॉन ग्रुप के वेणुगोपाल धूत से जुड़े 3250 करोड़ के लोन फ़्रॉड के मामले या ज़ी ग्रुप के शेयरों की भारी पिटाई, जिसमें अकेले जी एंटरटेनमेंट एक दिन में 30% से भी अधिक तक टूट गया था, छोटे निवेशकों का मनोबल भी जरूर तोड़ती है. हमारे शेयर बाजार और इसमें लिस्टेड कई कम्पनियां पूरी तरह पारदर्शी नहीं हैं और इनमें बड़ी सुधार की गुंजाइश भी दिखाई पड़ रही है. अतः बाजार को ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी और निवेशोन्मुख बनाये जाने की तुरंत जरूरत है. यह ठीक है कि शेयर बाजारों में निवेश में जोखिम का एक बड़ा स्थान है. परंतु सतत जानकारियों, शोध और ज्ञान के बूते इन जोखिमों को फायदे में भी बदला जा सकता है.

ग्रामीण स्तर पर भी लोग अब निवेश के लिए आगे आ रहें हैं : ग्रामीण स्तर पर भी लोग अब निवेश के लिए आगे आ रहें हैं और वह दिन दूर नहीं जब भारत की आधी से अधिक आबादी शेयर बाजार में निवेश कर भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपना महती योगदान देने लगेगी. वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के एक सितारे की तरह चमकने के उद्देश्य से कुछ सुझाव जो शेयर बाजारों में छोटे-मध्यम निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी है, निम्नवत हैं-

1-भारत के शेयर बाजारों में कई लिस्टेड कंपनियों का कोई खास वजूद नहीं है, इन्हें सिर्फ उन कंपनियों के ब्रोकर्स, ऑपरेटर और एजेंट्स अपने और कंपनियों के कुछ खास लोगों के फायदे के लिए कागज पर चलाते हैं. इन कंपनियों के शेयर बिना किसी खास वजह के बढ़ते रहते है और उसी प्रकार औंधे मुंह गिर भी जाते है, जिससे छोटे निवेशकों को बहुत भारी घाटा होता है. ऐसी कंपनियों की एक तय समय सीमा में जांच होनी चाहिए और सबसे पहले इन कंपनियों में निवेशित छोटे निवेशकों के वित्तीय हितों को सुरक्षित किया जाना चाहिए.

2- अच्छी कंपनियों में भी इसी प्रकार के ऑपरेटर्स अपने आंतरिक नेटवर्क्स और इनसाइडर ट्रेडिंग के माध्यम से शेयर के मूल्यों को घटाते और बढ़ाते रहते हैं, जिसका सीधा घाटा छोटे निवेशकों के खाते में दर्ज होता है, उन्हें इस बाजार से विरक्ति होने लगती है. इससे सरकार का भी बहुत नाम ख़राब होता है.

3- सभी लिस्टेड कंपनियों को वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ और प्रत्येक तिमाही में 5 वर्षों/1 वर्ष/आगामी तिमाही के लिए ग्रोथ, डिविडेंड, बोनस आदि का गाइडेंस दिये जाने को आवश्यक बनाया जाना चाहिए. ताकि उन जानकारियों के बूते छोटे और मध्यम निवेशक अपने वित्तीय हितों की रक्षा कर सकें. शेयर बाजार में लिस्टेड ऐसी कई कंपनियां हैं, जिनके बारे ज़रूरत पड़ने पर महीनों और सालों तक कोई भी जानकारी पब्लिक डोमेन पर उपलब्ध नहीं हो पाती है, आख़िर यह कैसा पारदर्शी निवेश है?

4- शेयर बाजार में लिस्टेड कम्पनियों के साथ कई बार विकट परिस्थितियां भी उत्पन्न हो जाती है, कभी उन्हें किसी कारणवश ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है, कभी उनके प्रमोटर्स ही किसी कानूनी पचड़े में फंस जाते हैं और इन सभी नकारात्मक ख़बरों के बूते उनके स्टॉक्स के मूल्य काफी कम हो जाते हैं या उनकी ट्रेडिंग ही बंद हो जाती है या लंबे समय तक उनके स्टॉक्स के मूल्य काफी नीचे के स्तर पर बने रहते हैं. ऐसी परिस्थितियों के उत्पन्न हो जाने की स्थिति में छोटे-मध्यम निवेशक बहुत ही ज्यादा घबरा जाते हैं और औने-पौने दामों में अपने शेयरों को बेचकर वे बड़े घाटे को झेलने के लिए अभिशप्त होते हैं. बुरी ख़बरें आती और जाती रहेंगी मगर SEBI किसलिए है, उन्हें निवेशकों को सही रास्ता दिखाना चाहिए और उनके वित्तीय हितों की हर कीमत पर रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए.

5- जिन कंपनियों में कॉर्पोरेट प्रशासन की चुनौतियां हैं, वहां तुरंत सरकार को कार्रवाई करने की जरूरत है और जिस प्रकार BCCI (बोर्ड ऑफ़ क्रिकेट कण्ट्रोल ऑफ़ इंडिया) में लोधा कमिटी ने जिम्मेदारी ली हुई थी, उसी प्रकार उन कंपनियों के प्रबंधकीय जिम्मेदारियों की निगरानी के कार्य को सरकार की देखरेख में एक स्वतंत्र और पेशेवर टीम के द्वारा किये जाने की भी बहुत बड़ी चुनौती और जरूरत है.

6- अगर हम सोशल मीडिया के विकास के दौर में इन कंपनियों को देखें तो पाएंगे कि वे सामान्यतः इन सोशल नेटवर्क्स को नज़रअंदाज करके ही चलना पसंद करते हैं. जब भारत के प्रधानमंत्री जैसा व्यक्ति सोशल नेटवर्क का इतना प्रभावी इस्तेमाल कर सकता है तो आखिर इन कंपनियों को किस बात का डर है कि वे सोशल मीडिया के जरिये अपने कारोबार की जानकारियां और उपलब्धियां तक साझा नहीं करना चाहते. उनके इसी सोच की वजह से यह एक बेहद निराशा भरा युग भी है, जो कतई भी न्यू इंडिया के सोच से मेल नहीं खाता है.

7- इसके साथ ही मैनें कई बड़ी-छोटी कंपनियों की वेबसाइट पर गौर भी किया है. मेरा ऐसा मानना है कि जितना निवेश वे हासिल करते हैं उसकी तुलना में जो जानकारियां वे इन वेबसाइट्स के जरिये साझा करते हैं वे बहुत ही कम है. इसके साथ ही कई कम्पनियां अपने वेबसाइट्स पर जानकारियों को महीनों तक अद्यतन तक नहीं करतीं. वेबसाइट्स पर उनके कॉन्टैक्ट डिटेल्स तक ढूंढने से सही तरीके से नहीं मिलते. इस महत्वपूर्ण विषय पर भी तुरंत संज्ञान लिए जाने की जरूरत है.

8- जिन शेयरों को तात्कालिक या अन्य कारणों से ट्रेडिंग के लिए सस्पेंड किया जाता है उनके बारे एक अनुमानित जानकारी निवेशकों को जरूर दी जानी चाहिए कि आखिर कब तक उन पर ट्रेडिंग की पाबंदी लागू रहेगी या उन्हें पूरी तरह से बंद कर दिया गया है. आखिर इस प्रकार के रहस्य से छोटे-मध्यम निवेशकों को क्या लाभ है?

9- मुख्य धारा के बहुत सारे टेलीविजन चैनलों पर लगातार बड़े-छोटे विश्लेषकों, न्यूज़ रीडर्स आदि के द्वारा भी कई शेयरों को निवेश हेतु सुझाया जाता है. 20:20, 50:50, दीपावली से दीपावली तक, इंडिपेंडेंस डे स्पेशल सरीखे कई कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं. कई छोटे निवेशक उनके शोध के आधार पर शेयर खरीदते भी हैं, उन्हें कभी लाभ होता है तो कभी भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है. यहां एक नियम बनाये जाने की जरूरत है कि जिन शेयरों को वे सुझाते हैं उन पर एक नैतिक जिम्मेदारी के तहत कम से कम 2 वर्ष तक या लक्ष्य की प्राप्ति तक वे निवेशकों को इन शेयरों के बाबत लगातार जानकारियां भी उपलब्ध कराते रहें.  इससे इस क्षेत्र में बहुत ही ज्यादा पारदर्शिता बढ़ जायेगी.

भारत तेज गति से अपनी आबादी के आमदनी को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है. सरकार ने अर्थव्यवस्था के सुधार और विकास के लिए कई कदम भी उठाये हैं. लेकिन सुधार की गुंजाइश भी हर समय बनी ही रहती है और अगर सुधार ढांचे में हो तो स्थायी तेजी बनी रह सकती है.

                                                                                                                                     नोटः ये लेखक के निजी विचार हैं.

 

 

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