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वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्यपाल का पद कितना प्रासंगिक रह गया है?

Faisal Anurag

राज्यपालों की प्रासंगिकता पर सवाल उठते रहे हैं. हाल के विवादों ने न केवल राजभवनों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है बल्कि संविधान की भी खुलेआम अवज्ञा की गयी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर गंभीर टिप्पणियां समय-समय पर की हैं. राज्यपाल के सवाल पर संविधानसभा से ले कर अभी तक लगातार बहसें हुई हैं. और यह भी सवाल उठाया गया है कि भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में यह पद अपनी गरिमा और निष्पक्षता के अनुकूल कार्य नहीं करता रहा है. संविधान के अध्ययेता फैजान मुस्ताफा ने राज्यपालों की राजनीतिक वफादारी को संविधान के लिए खतरनाक माना है.

राजस्थान के राज्यपाल की भूमिका को ले कर कांग्रेस उन पर लोकतंत्र की हत्या का आरेाप लगा रही है.  राजस्थान के वर्तमान राज्यपाल जब उत्तर प्रदेश में सक्रिय भाजपा नेता थे, तब इस तरह के आरोप लगाया करते थे और राजभवन के घेराव के अगुवा भी रहते थे.

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      भारतीय जनता पार्टी राजभवनों को राजनीति का अखड़ा बनाए जाने के खिलाफ बोलती रही है. लेकिन पिछले छह सालों में देखा गया है कि भाजपा शासन के राज्यपाल इस आरोप से मुक्त नहीं हैं. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट 2016 में कह चुका है कि राजभवनों को राजनीति का अखड़ा नहीं बनाना चाहिए. अरूणाचल प्रदेश मामले में 2016 में टिप्प्णी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न केवल राज्यपालों के संवैधानिक अधिकारों की सीमा बतायी बल्कि उनकी भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्ण अय्यर और पीएन भगवती ने अपने कार्यकाल के दौरान भी राज्यपालों के विवेक से फैसले को ले कर गंभीर टिप्पण्यिां 70 के दशक में की थी.

आंध्रप्रदेश के राज्यपाल को ले कर 1984 में भी केंद्रीय एजेंट की तरह काम करने का आरोप लगा था. तब आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रामराव को अपदस्थ किया जा रहा था. उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी का फैसला किसे नहीं याद होगा. जिन्होंने जगदंबिका पाल को आनन-फानन में मुख्यमंत्री बना दिया और 24 घंटे के पहले ही उन्हें जाना पड़ा. इसी तरह का मामला पिछले ही साल महाराष्ट्र में देखा गया. जब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने फड़नवीस को मुख्यमंत्री बना दिया और उन्हें भी जाना पडा.

झारखंड में सिब्ते रज़ी, बिहार में बूटा सिंह, कर्नाटक में हंसराज भारद्वाज और गुजरात में कमला बेनीवाल के फ़ैसले राजनीतिक विवाद के बाद राजभवनों की प्रासंगकिता को ले कर सवाल उठे. एसआर बोम्बई का मामला तो भारत में प्रसिद्ध है. जिसमें राज्यपाल के विवेक पर गंभीर सवाल खड़ा किया गया.

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इसके अलावे भी कई विवाद हैं. बोम्बई बनाम भारत सरकार, रामेश्वर प्रसाद भारत बनाम केंद्र सरकार के मामले  में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों को ले कर जो फैसले दिए हैं उनसे भी कम से कम राज्यपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया के राजनीतिक इस्तेमाल और संविधान के उल्लंघन के आरोप प्रमाणित होते हैं.

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राज्यपाल के पद को ले कर संविधानसभा में भारी मतभेद थे. संविधानसभा ने राज्यपाल के प्रत्यक्ष वोट से चुने जाने पर सबसे पहले विचार किया था. लेकिन 1949 में एक बडी सहमति उभरी थी कि राज्यपाल को केंद्र नहीं बल्कि एक पैनल चुने. लेकिन इस पर आम सहमित नहीं बनी. डा अंबेडर ने संविधानसभा में कहा कि जब राज्यपाल के पास कार्यकारी अधिकार हैं ही नहीं तो उन्हें सीधे या पैनल के माध्यम से चुने जाने का कोई औचित्य नहीं है. बाद में यही तय हुआ कि वे राष्ट्रपति से सीधे नियुक्त होंगे.

लेकिन यह सहमित बनी कि बगैर राज्य सरकार के सुझाव के किसी को भी राज्यपाल के रूप में नहीं भेजा जाना चाहिए. नेहरू के 17 सालों में देखा गया कि एक भी राज्यपाल बिना मुख्यमंत्री की सहमित के नहीं नियुक्त किया गया. लेकिन बाद में यह प्रक्रिया सीधे प्रधानमंत्री से सत्ता पर काबिज पार्टी प्रमुख तय करने लगे. इसके बाद ही राजभवनों के राजनीतिक अखाड़ा बनने की शुरुआत हुई.

आजादी के बाद राज्यपालों को ज्यादा जिम्मेदार बनाने के लिए कई बार विचार किए गए और इसके लिए समितियों या आयोगों का गठन किया गया. इस सदर्भ में केंद्र राज्य संबंधों पर दिए गए सरकारिया आयोग की अनुशंसा महत्वपूर्ण है. हालांकि इसे रद्दी की टोकरी में उन्हीं लोगों ने फेंक दिया जो कांग्रेस के शासनकाल में राज्यों के अधिकारों की वकालत करते रहे हैं. इसमें जनसंघ जो बाद में भाजपा कहलायी अग्रणी है.

आज यही भाजपा न तो राज्यों के अधिकारों को ले कर उठे सवालों पर गंभीर है और न ही राज्यपालों की निष्पक्ष और स्वविवेक को ले कर चिंतित दिख रही है. 1980 में गठित सरकारिया आयोग ने 1988 में 1600 पेज की अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. जिसमें केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर बिंदुवार 247 सिफारिशें की गई थीं. सरकारिया आयोग की केंद्र-राज्य संबंधों के बारे में जो अनुशंसाएं हैं, उसके भाग-1 और अध्याय-4 में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल का पद एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है. राज्यपाल न तो केंद्र सरकार के अधीनस्थ है और न उसका कार्यालय केंद्र सरकार का कार्यालय है.

इसके पहले वर्ष 1966 में केंद्र सरकार द्वारा मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) का गठन किया गया था. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि राज्यपाल के पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिये जो किसी दल विशेष से न जुड़ा हो. पिछली सदी में 1970 में तमिलनाडु सरकार द्वारा केंद्र व राज्य संबंधों पर विचार करने के लिये राजमन्नार समिति का गठन किया गया था.

गौरतलब है कि इस समिति ने भारतीय संविधान से अनुच्छेद 356 और 357 खत्म करने की सिफारिश की थी. संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्य करने में असमर्थ है तो केंद्र राज्य पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित कर सकता है.

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अनेक काननूविदों ने समय-समय पर इस पर लेख लिख कर राज्यपाल को उस राज्य की जनता के प्रति जबावदेह बनाने की मांग को दुहराया है. न कि केंद्र सरकार के राजनीतिक हितों के एजेंट के बतौर. इसे ले कर काननू के अध्ययेता चिंतित रहे हैं कि स्वस्थ और गतिशील लोकतंत्र बगैर संवैधानिक मान्यताओं और मूल्यों के उसके स्प्रीट में अमल लाए बगैर टिकऊ नहीं हो सकता है. सवाल उठता है कि आखिर वो कौन से राजनीतिक हित हैं जो अपने ही द्वारा आयोगों की अनुशंसा पर अमल नहीं करते हैं.

1980 के दशक का इतिहास अभी ताजा ही है. जब सभी गैर कांग्रेस समूह एक साथ मिल कर न केवल राज्यपाल की स्वतंत्रता का सवाल उठा रहे थे बल्कि केंद्र राज्य संबंधों में संविधान की भावना को अमल में लाने के लिए भी सचेत थे. लेकिन भारत की राजनीति 1990 के बाद जिस तरह बदली है, उसने उन तमाम अनुशंसाओं को भी हाशिए पर डाल दिया जो जीवंत लोकतंत्र के लिए अक्सीजन माने जाते रहे हैं.

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