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किसान, मजदूर और बेरोजगारों को मोदी-गोयल बजट साधने में कितना कारगर साबित होगा

पिछले दो दशकों से तमाम अंतरिम बजट मतदाताओं को खुश करने के नजरिए से ही पेश किए जाते रहे हैं.

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Faisal Anurag

क्या अंतरिम बजट भाजपा को चुनावी कामयाबी दिला पाएगी?  पीयूष गोयल के सबसे लंबे बजट भाषण के बाद यह सवाल लगातार राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. पिछले दो दशकों से तमाम अंतरिम बजट मतदाताओं को खुश करने के नजरिए से ही पेश किए जाते रहे हैं. लेकिन गोयल का यह बजट दो अर्थों में थोड़ा अलग है. पहला तो यह अपनी पूरी प्रकृति में पूर्ण बजट है और दूसरा यह कि आजाद भारत के इतिहास में पहली बार आर्थिक भुगतान को पूर्ववर्ती तारीख से देने की घोषणा की गयी है. चुनावों को देखते हुए माना जा रहा था कि मोदी सरकार का यह अंतिम बजट खेती को संकट से उबारने तथा रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए बड़ी घोषणाएं करेगा, लेकिन इन दोनों मामलों की मोदी सरकार ने उपेक्षा कर दी. बावजूद इसे भारतीय जनता पार्टी ऐतिहासिक बताने के अभियान में जुट गयी है और 10 करोड़ 2 हेक्टेयर तक के प्रति परिवार को सलाना 6000 हजार की सहायता देने की घोषणा को बड़ी उपलब्धि बता रही है.

बजट पर भाजपा और एनडीए खेमा यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह सरकार को लेकर फैली निराशा और नाराजगी का मुकाबला इस बजट से कर लेगा वहीं विपक्ष इसे एक ओर बड़ा जुमला साबित कर रहा है. अर्थशास्त्री भी दो खेमों में बंट गए हैं. मोदी समर्थक अर्थशास्त्री इसे एक कारगर कदम बता रहे हैं जब कि अर्थशास्त्रियों का बड़ा तबडा बजट को भारत की इकोनॉमी के लिए घातक बता रहा है. पहले से ही संकट में चल रही इकोनॉमी सरकार के आकड़ों से संतुष्ट नहीं है क्योंकि आंकड़ें और जमीनी हकीकत के बीच का फासला लगातार बढता जा रहा है.  एनएसएसओ के आंकड़ों  ने बेरोजगारी की जिस भयावहता की बात की है वह इकोनॉमी के ठहराव के ही संकेत हैं. हालांकि सरकार इकोनॉमी के लगातार बड़ा होने की बात कर रही है.

बजट पर दो अखबारों की प्रस्तुति दिलचस्प है. कोलकाता से प्रकाशित द टेलिग्राफ की बैनर शीर्षक बेहद बोल्ड है. अखबार ने शीर्षक दिया इंटरिम = डेलाइट रॉबरी. यह शीर्षक बजट के हितार्थो और नैतिकता पर गंभीर प्रश्न पैदा कर रहा है. अखबार मानता है कि  यह बजट नाराज मतदाताओं को जीतने का प्रयास है. इकोनॉमिक टाइम्स का बैनर है मोदी बिगिन वोट काउंट. इस अखबार में अर्थशास्त्री स्वामीनाथन एस अय्यर ने इसे मदर ऑफ इलेक्शन बजट बताते हुए कहा है कि इस  बजट से मुद्रा स्फीति बढेगी.

2014 में वाजपेयी सरकार ने भी अपने अंतिम बजट को ड्रीम बजट बताते हुए शाइनिंग इंडिया से मतदाताओं को आकर्षित करने की बात की थी. उस सरकार के वित मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा ने मोदी सरकार के बजट को वोट फॉर एकाउंट कह कर बड़ा हमला किया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार किसानों को रिश्वत देने का अनैतिक कार्य अंतरिम बजट से कर रही है. अंतरिम बजट आमतौर पर एकाउंट फॉर वोट ही होता है जिसे इस सरकार ने पलट दिया है. सीमांत किसानों को हर माह 500 रूपए देने की घोषणा के बाद भी खेती किसान का बुनियादी संकट दूर करने का कोई उपाय इस बजट में नहीं है. पिछले चार सालों से संघर्ष कर रहे किसान संगठनों ने मोदी के प्रस्ताव को नकार दिया है. इस संगठन के एक नेता सरदार वीएम सिंह ने कहा है कि 15 लाख हर अकाउंट में देने की मोदी सरकार के जुमले का ही यह एक और रूप है. किसान आत्मसम्मानी होते हैं. सरकार ने उनके वोट खरीदने का जो लालच इसमें दिया है, वह कारगर साबित नहीं होगा. किसान कृषि कर्ज और उत्पादकता के संकट से जूझ रहे हैं. खेती किसानी के संकट को सरकार पूरी तरह संबोधित भी नहीं कर रही है. सोशल मीडिया पर भी कहा जा रहा है कि सरकार ने किसानों के साथ बड़ा मजाक किया है. सोशल मीडिया पर लिखा गया है कि सरकार हर दिन किसान को मात्र 16.6 रू देगी, इससे तो चाय भी पूरा परिवार नहीं पी सकता है. प्रति व्यक्ति 3.35 रू यह होता है. गांवों में चाय भी 6 रू से कम में नहीं मिलती है. यह सवाल भी उठ रहा है कि मोदी सरकार 6000 रू तीन  किश्तों में देगी. पहली किश्त 31 दिसंबर तक दिया जाएगा. इस बजट ने प्रस्ताव किया है कि सरकार 1 दिसंबर 2018 से ही इस राशि को किसानों को देगी. बजट जानकारों का सवाल है कि क्या भूतलक्षी प्रभाव से कोई भी बजट धनराशि दे सकता है.

इसका एक और पहलू चर्चा में है. देश के दो राज्यों में पहले से ही इसी तरह की योजना राज्य सरकारें चला रही है. ओडिशा की पटनायक सरकार कालिया योजना के तहत अपने किसानों को 8000 और तेलंगाना की सरकार अपने किसानों को 10000 दे रही है. जानकार पूछ रहे हैं कि केंद्र की यह योजना जिसे किसान सम्मान योजना का नाम दिया गया है न केवल इन दोनों सरकारों की राशि प्रावधान से कम है बल्कि अधूरा भी है. तेलंगाना की योजना किसानों के अनेक दूसरे सवालों को भी अपनी योजना में शामिल करती है, जबकि केंद्र की योजना विस्तार से ज्यादा कुछ नहीं बता रही है सिवा इसके कि यह हड़बड़ी में आसन्न चुनाव को देखते हुए तैयार की गयी है. देश के अनेक राज्यों में किसानों के भूमि रिकॉर्ड भी पूरी तरह तैयार नहीं है और किसानों के परिवारों के बीच बंटे रिकॉर्ड  भी देश के अनेक राज्यों में तैयार नहीं है. ऐसी स्थिती में केंद्र की चुनौती उस बैंक अकाउंट की सही पहचान भी होगी कि जो इस घोषणा की जद में आ रहे हैं.

गैर संगठित क्षेत्र के लिए पेंशन की यह पहली पेशकश है लेकिन इसमें जिस तरह के प्रावधान किए गए हैं, उससे असंगठित क्षेत्र में कोई उत्साह पैदा होगा, कहना अभी जल्दबाजी है. पेंशन की जो प्रक्रिया गोयल ने प्रस्तुत किया है,  उसका लाभ भी तत्काल नहीं मिलने जा रहा है. इसी तरह बेरोजगारी के सवाल पर भी सरकार यह विश्वास दिलाने में कारगर नहीं हो पायी है कि देश में वह रोजगार के अवसर किस तरह पैदा करेगी. 6.1 प्रतिशत के खतरनाक बेरोजगारी वाले देश में सरकार की बजटीय चुप्पी निराशा ही बढ़ाएगी. गैर संगठित क्षेत्र के मजदूरों की मुख्य मांग न्यूनतम मजदूरी प्रतिमार 20 हजार रू करने की है. इसपर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है. देश के श्रमिक क्षेत्र  में पिछले दो सालों से गहरा असंतोष है. पिछले महीने ही दो दिनों के गांव बंद आंदोलन में किसानों और संगठित तथा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों ने भागीदारी कर अपनी मांगों को स्वर दिया था. यह बजट इन्हें शायद ही संतुष्ट कर पाए.

अगले चुनाव में विपक्ष किसान, मजदूर और रोजगार के जिस हथियार से मोदी सरकार पर प्रहार कर रहा है, इस बजट से वह धंधला नहीं हो पाया है.

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