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मोदी का नया नरेटिव कितना कारगर होगा

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FAISAL ANURAG

भारतीय जनता पार्टी तेजी से अपनी चुनावी रणनीति बदल रही है. भाजपा ने पहले यह कोशिश की कि 2019 का चुनाव मोदी बनाम राहुल के नरेटिव पर लड़ा जाये. लेकिन राहुल गांधी ओर दूसरे कई विपक्षी नेताओं ने इस नरेटिव के मुकाबले अपनी रणनीति को भारत बनाम मोदी बनाया है और तीन राज्यों के चुनाव में भाजपा की शिकस्त इसी रणनीति से हुई है. लेकिन एक एजेंसी को दिये गये अपने साक्षात्कार में मोदी ने भाजपा की चुनावी रणनीति को नया नरेटिव देने का प्रयास किया है. उन्होंने आसन्न चुनाव को जनता बनाम महागठबंधन कहा है. भाजपा जिस नरेटिव को गढ़ रही है, उससे विपक्ष पर उसे बढ़त नहीं मिल रही है.

पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि भाजपा के तर्क ज्यादातर बचाव की मुद्रा में हैं. उनके आक्रमण में 2014 की तरह की धार नहीं है. यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में भी कोई नयापन नहीं है. वे लगातार बचाव की मुद्रा में दिख रहे हैं. और एक तरह से उनका प्रहार कांग्रेस पर पुराने आरापों का दुहराव भर है. नए साल में उनकी सभाओं या उनके इंटरव्यू में भी ऐसी कोई बात नहीं कही गयी है, जिससे यह लगे कि 2014 की तरह वे अपने को व्यक्त कर रहे हैं. राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि प्रधानमंत्री अपने साढे चार साल की सरकार की उपलब्धियों को बता नहीं पा रहे हैं और न ही उनकी बातों की अपील मतदाताओं पर अब तक दिख रही है.

क्या मोदी का नया नरेटिव 2014 की तरह का हालात बना सकता है. इस बात की संभावना अब तक नहीं दिख रही है. और मोदी के नए नरेटिव से बहुत लोगों के जेहन में देवकांत बरूआ की याद ताजा हो गयी है. बरूआ ने इमरजेंसी के दौरान कहा था कि इंदिरा ही भारत है. तो क्या मोदी स्वयं को जनता का पर्याय साबित करना चाहते हैं. उनके नए नरेटिव की एक व्याख्या यह भी है कि वे इसी अवधारणा को चुनावी कामयाबी का मंत्र बना कर बताना चाहते हैं कि उनका विकल्प कोई नहीं है. लेकिन उनके इस नरेटिव पर जिस तरह की ठंडी  प्रतिक्रिया हुई उससे भाजपा के कैंप में बेचैनी देखी जा सकती है.

चुनाव की एक और रणनीति के रूप में भाजपा उस संभावित गठबंधन में हर संभव दरार बनाने के लिए लगी हुई है जिससे भाजपा और मोदी विरोधी वोट का बिखराव अधिक से अधिक हो. और भाजपा अपने कोर वोट आधार से चुनावी जीत को संभव बना सके. भाजपा की एक बड़ी चिंता उसके सहयोगियों की लगातार बढ़ी नराजगी और विलगाव भी है. 2014 में इन दलों के वोट आधार ने भाजपा को बहुमत में पहुंचाने में बड़ी  भूमिका का निर्वाह किया था. महाराष्ट् में शिव सेना की नारजगी को ले कर भाजपा की परेशानी बढ़ी हुई हैं. भाजपा के अध्यक्ष ने संकेत दे दिया है कि उनकी पार्टी महाराष्ट् में अकेले चुनाव लड़ेगी. इससे उस राज्य में भाजपा की राजनीतिक परेशानी साफ दिख रही है. राजनीतिक प्रेक्षक मानने लगे हैं कि हिंदी पट्टी में भाजपा को जो सीटों का नुकसान होने जा रहा है, उसकी भरपाई कहीं से होने की संभावना नहीं के बराबर है. इसलिए भाजपा की रणनीति चुनाव बाद के अपने साझेदारों की तलाश पर भी है. दक्षिण भारत में भाजपा जानती है कि उसे कोई खास कामयाबी नहीं मिलने जा रही है. लेकिन उसके कुछ संभावित सत्ता साझेदार मिल सकते हैं.

चुनावी घोषणा के पहले भाजपा ने 2014 की तरह ही मोदी की 100 चुनावी सभा की योजना को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है. इसके बावजूद उसे 2014 की तरह का आतमविश्वास नहीं दिखाई दे रहा है. 2014 में उसके सामने केंद्र में यूपीए की सरकार थी और उस पर भ्रष्टाचार के आरोप थे. दस सालों की सरकार की एंटी इनकमबेंसी का बोझ था. इस बार ये सब सवाल भाजपा के सामने हैं. किसान, युवा ओर मजदूर के साथ मध्यवर्ग के एक तबके में भाजपा को ले कर नाराजगी है.

किसानों ने अनेक आंदोलनों के माध्यमों से अपनी नाराजगी दिखायी है. किसानों का आराप है कि 2014 में मोदी ने किसानों के लिए जो वायदे किए थे, उन्हें पूरा नही किया गया. इसी जरह रोजगार के फ्रंट पर उनकी नाकामयाबी है. पिछले चार सालों में भारत में रोजगार में कमी आयी है और निर्यात के क्षेत्र में भी कमी के आकड़े हैं. इसी तरह निवेश भी घोषित अपेक्षाओं पर पूरा नहीं हो पाया है. इसी तरह आर्थिक क्षेत्र के अनेक आंकड़े अपनी दास्तान बयान कर रहे हैं. मोदी सरकार आकड़ों के आधार, वर्ष और मानकों में परिवर्तन कर भी उस मकसद को हासिल नहीं कर पा रही है जो इन तबकों में भरोसा व्यक्त कर सके. ऐसी स्थिति में मोदी का नया नरेटिव बहुत कारगर चुनावी नारा नजर नहीं आ रहा है.

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