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महाराष्ट्र सरकार ने पत्रकारों को दिये 15 करोड़, झारखंड में पत्रकारों की उपेक्षा आखिर कब तक ?

झारखंड के पत्रकारों के हित पर उदासीन रघुवर सरकार !

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NW Desk: विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका को लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्‍तंभ माना जाता है. इसमें चौथे स्‍तंभ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया. कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता और सततता के लिए जरूरी है कि उसके ये चारों स्तंभ मजबूत हों. चारों अपना अपना काम पूरी जिम्मेदारी व निष्ठा से करें. लेकिन लोकतंत्र के लिए जरुरी चौथा स्तंभ, मीडिया कहीं ना कहीं उपेक्षा का शिकार है. सरकार ना तो पत्रकारों के लिए सुविधा मुहैया कराती है, ना ही योजना का लाभ मिलता है. हालांकि, कुछ राज्यों की सरकार ने पत्रकारिता के महत्व को समझते हुए पत्रकारों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई है. ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है, जहां फडणवीस सरकार ने वरिष्ठ पत्रकारों के लिए पेंश योजना लागू करने के लिए 15 करोड़ रुप आवंटित किये गये हैं.

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महाराष्ट्र पत्रकारों के पेंशन के लिए 15 करोड़

महाराष्ट्र सरकार ने 4 जुलाई को विधानसभा में 11,445 करोड़ रुपये की अनुपूरक मांगें रखी जिनमें 15 करोड़ रुपये राज्य में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए पेंशन योजना लागू करने के लिए आवंटित किए गए गये है. सरकार ने ‘आचार्य बलशास्त्री जमशेखर संमान योजना’ नाम से पत्रकारों के लिए पेंशन स्कीम की शुरुआत की है.

केरल में 10 हजार प्रतिमाह पेंशन

बात अगर केरल की करें तो 3 मार्च 2017 को केरल की माकपा नीत एलडीएफ सरकार ने पत्रकारों की पेंशन राशि में 2,000 रुपए की वृद्धि का ऐलान किया, जिससे अब 10,000 रुपए प्रतिमाह हो गयी.  वित्तमंत्री टीएम थॉमस इसाक ने 2017-18 के लिए पेश बजट में बताया कि स्वैच्छिक पेंशन योजना में सदस्य के रूप में शामिल पत्रकारों की पेंशन 2,000 रुपए प्रतिमाह बढ़ाई गई है.

झारखंड के पत्रकार उपेक्षित !

बात अगर झारखंड के पत्रकार की करें तो रघुवर सरकार के शासन में पत्रकारों का हित उपेक्षित नजर आता है. हालांकि, 29 नवंबर 2016 को राज्य सरकार ने ‘झारखंड राज्य पत्रकार स्वास्थ्य बीमा योजना’ को स्वीकृति प्रदान की, जिसके तहत झारखंड सरकार द्वारा पत्रकारों का पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कराए जाने की बात कही. इस बीमा योजना का लाभ बीमित पत्रकार की पत्नी तथा दो बच्चों को भी दिये जाने की बात कही. इसमें कहा गया कि दुर्घटना अथवा असाध्य बीमारी की स्थिति में पत्रकारों तथा उनके परिवारों को सरकार द्वारा सूचीबद्ध अस्पतालों में कैशलेस चिकित्सकीय सुविधा मिलेगी. बीमित व्यक्ति की आयु सीमा 18 से 60 साल के बीच होनी चाहिए. सरकार ने इस मद में एक करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति देने की भी बात कही गई. ये भी एलान हुआ कि चालू वित्तीय वर्ष में इसका लाभ राज्य भर के लगभग 2000 पत्रकारों को मिलेगा. लेकिन इस घोषणा को घरातल पर उतारा नहीं गया, ना ही पत्रकारों का बीमा हुआ. इतना ही नहीं, रांची प्रेस क्लब के उद्घाटन के दौरान सीएम रघुवक दास ने केरल सरकार की तर्ज पर पत्रकारों को पेंशन देने की बात कही थी. इसके अलावे ये भी कहा कि आवास योजना का लाभ भी पत्रकारों को मिलेगा, लेकिन उसके लिए इंतजार करना होगा. हकीकत ये है कि झारखंड के पत्रकार आज भी इंतजार ही कर रहे हैं. क्योंकि किसी तरह की योजना का लाभ इन्हें नहीं मिला.

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इससे पहले 2013 में हेमंत सोरेन के शासन में भी पत्रकारों के लिए बीमा योजना शुरु की गई थी. 3 अक्टूबर 2013 को रांची में मीडिया पर आयोजित एक सेमिनार में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पत्रकार हित में कई बड़ी घोषणाएं की. उन्होंने राज्य के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए पांच लाख रुपये का बीमा कराने की घोषणा की. बीमा प्रीमियम में पचास प्रतिशत हिस्सा सरकार खुद भुगतान करेगी और बाकी पचास प्रतिशत पत्रकार करेगा. साथ ही राज्य के गैर-मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आकस्मिक मौत या स्थायी विकलांगता की स्थिति में राज्य सरकार ने पांच लाख रुपये तत्काल देने की घोषणा की है. इसके अलावा पत्रकार कल्याण ट्रस्ट स्थापित किए जाने की भी घोषणा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की. इस ट्रस्ट की राशि का खर्च सिर्फ और सिर्फ पत्रकारों पर किया जाएगा. इस योजना के तहत पत्रकारों का बीमा तो हुआ, लेकिन एकसाल के बाद प्रिमियम नहीं भरने पर ये योजना भी खटाई में पड़ गयी. कुल मिलाकर कहें तो स्थिति आज भी वही है.

यूं तो पत्रकारों के निष्पक्ष काम करने, लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सेमिनार होते हैं. पत्रकार हित की झारखंड सरकार बात तो करती है, लेकिन उनकी कथनी और करनी में अंतर साफ दिखता है.

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