Opinion

नये मिजाज का ये ‘इंडिया’ भारत से किस तरह अलग और किस तरह से खतरनाक है

 

Faisal Aurag

यह नया इंडिया है. नये इंडिया का मिजाज बिल्कुल अलग है. यह न्यू नार्मल बनता नजर आ रहा है. हर तरफ वर्चस्व स्थापित करने की होड़ लगी हुई है. यह वह दौर है जब सत्ता के खिलाफ कोई उठने की कोशिश भर करता है, तो उसे डिमोनाइज करने का चैतरफा अभियान चलाया जाता है. इस निजाम की भाषा और शैली भी भारत में अनोखी है. राजनीतिक कामयाबियों के तूफान के बीच इस दौर के अपने रिवाज हैं.

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जिस भारत में सत्ता के विकेंद्रीकरण पर जोर था, अब इस नये इंडिया में वर्चस्व और एकाधिकार का दौर और दौरा है. इतिहास के साथ उन मान्यताओं पर नये तरीके से बहस खड़ा किये जाने की हर मुमकिन कोशिश है, ताकि उस बोझ से देश मुक्त हो सके जो इतिहास उसे दायित्व के रूप में देता है. इस नये निजाम के जिम्मेदार लोग कब क्या कहेंगे यह उन पर ही निर्भर है. जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल ने जिस तरह राजनीतिक विरोध और सरकार के फैसलों के खिलाफ बोलने वालों को जूतो से मारने का आह्वान किया है, वह भी इसी नये मिजाज को दिखाता है. इस पर मीडिया की खामोशी भी दिलचस्प है. लोकतंत्र का प्रहरी बनने का दावा करने वाली मीडिया को यह भाषा भी लोकतांत्रिक ही लग रही है. राजनीतिक तौर पर विपक्ष को डिमानाइज करने का यह बेहद संगीन मामला बनता है.

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राज्यपाल होता तो है केंद्र का प्रहरी. लेकिन वह किसी भी राजनीतिक दल की प्रतिबद्धता से बाहर माना जाता है. सत्यपाल मल्लिक भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के पहले समाजवादी धारा के नेता थे. अपने इस इतिहास की ग्लानि से ग्रस्त दिखते सत्यपाल मल्लिक की नजर में न तो विपक्ष का कोई सम्मान है और न ही वह असहमति के मौलिेक लोकतांत्रिक अधिकार को ही स्वीकार करते नजर आते हैं. राहुल गांधी की श्रीनगर यात्रा ओर उसके बाद दिये गये बयान से बौखलाये राज्यपाल की अभिवयक्ति है यह. मल्लिक ने गिरफ्तार किये गये कश्मीरी नेताओं की हिरासत का समर्थन करते हुए कहा कि वे भी 30 बार जेल गये हैं. मल्लिक उन नेताओं की कतार में रहे हैं जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध किया था. और  सत्ता की तानाशाही के प्रतिरोध की बात की थी. आज वे ही उस राजनीतिक गिरफ्तारी को सही ठहरा रहे हैं. यह भी नया राजनीतिक मिजाज को दिखा रहा है. मल्लिक के इस बयान को ले कर देश में कहीं कोई बेचैनी का नहीं होना भी नया मिजाज है.

अदालतों की निष्पक्षता किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है. कुछ घटनाएं ऐसी हो रही हैं जिसके निहितार्थ गंभीर हैं. दिल्ली हाई कोर्ट के जज सुनी गौड़ ने रिटायर होने से ठीक पहले चिदंबरम की याचिका रद्द कर दी थी. उसी गौड़ को रिटायर होने के तीन दिनों के भीतर ही केंद्र सरकार ने मनी लॉनडरिंग निवारण अधिनियम के अपीलीय न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया है. इस नियुक्ति के बाद यह मांग की जा रही है कि रिटायर होते ही किसी जज को इस तरह का पद नहीं देने का नियम बनाया जाना चाहिए. चिदंबरम की जमानता याचिका रद्द किये जाने ओर इस नियुक्ति को ले कर सोशल मीडिया पर अनेक तल्ख टिप्प्णी  सार्वजनिक हैं. इस प्रकरण ने सुप्रीम कोर्ट के जज सदाशिवन की याद दिला दी है कि अमित शाह के पक्ष में दिये गये उनके फैसले भी उनके रिटायर होने के समय ही आये थे. और केंद्र ने उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया था. हो सकता है दोनों मामलों के बीच किसी तरह का तारतम्य नहीं हो. लेकिन इससे संदेह तो उभरता ही है. लोकतंत्र को इस तरह के संदेहों से बचाना जरूरी भी है.

इस संदर्भ में प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की सुप्रीम कोर्ट को दी गयी हस्तक्षेप याचिक और दबाव के बाद यू टर्न का मामला भी बेहद संगीन है. प्रेस काउंसिल ने कश्मीर टाइम्स के कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन की याचिक में हस्तक्षेप किया था. भसीन ने बंद अखबारों के और प्रेस की स्वतंत्रता के सवाल को ले कर याचिका दर्ज की थी. प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष की याचिका में मीडिया की स्वतंत्र भूमिका के खिलाफ लगे प्रतिबंधों का समर्थन किया गया था. इसके बाद मीडियाकर्मियों में गुस्सा उभरा और एडिटर गिल्ड ने भी तल्ख बयान जारी किया. काउंसिल कुछ सदस्यों ने भी अध्यक्ष के निर्णय को एकतरफा बताया और विरोध के स्वर बुलंद किये. इसके बाद चेयर परसन को यू टर्न लेना पड़ा.

भारत ने इमरजेंसी का वह दौर भी देखा है जिसमें मौलिेक अधिकारों को ही स्थगित कर दिया था. और सुप्रीम कोर्ट ने उसे सही ठहरा दिया था. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की उस त्रासदी के बाद कल्पना की गयी थी कि कभी फिर उसकी पुनरावृति नहीं होगी. लेकिन इन घटनाक्रमों के बाद कई तरह की आशंकाएं हवा में हैं.

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