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कैसे दूर होगा अशिक्षा का अंधियारा, 245 दिन में सिर्फ 100 दिन ही होती है सरकारी स्कूलों में पढ़ाई

सरकारी स्कूलों में NGO का शिकंजा

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Ranchi : राज्य सरकार राज्य को एजुकेशन हब बनाने की बात करती है. स्कूलों में जीरो ड्रॉप आउट का दंभ भरा जाता है. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का स्लोगन भी लोगों को रटा दिया गया है. हर स्कूल-कॉलेज में क्वालिटी एजुकेशन देने की बात हर बार दोहरायी जाती है. लेकिन, इन सबके बावजूद प्रदेश में शिक्षा का अंधियारा दूर नहीं हो पा रहा है. न्यूज विंग की पड़ताल में सच्चाई कुछ और ही सामने आयी है. सरकारी स्कूलों में सभी छुट्टी को छोड़कर साल भर में पढ़ाई के लिए 245 दिन ही निर्धारित हैं. लेकिन, स्थिति यह है कि यहां के सरकारी स्कूलों में साल भर में बमुश्किल से 100 दिनों तक ही पढ़ाई होती है. ऐसे में सिलेबस भी पूरा नहीं हो पाता.

ऐसी है प्रदेश में शिक्षा की हकीकत

सूबे के सरकारी स्कूलों पर से शिक्षा विभाग का नियंत्रण कम होता जा रहा है, बल्कि इन स्कूलों पर एनजीओ और परियोजना का शिकंजा कसता जा रहा है. स्कूलों के शिक्षकों को परियोजना और एनजीओ के कामों में लगा दिया जाता है. फिलहाल सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का अधिक समय परियोजना के कार्य करने में बीतता है. शिक्षक मिड-डे मील, पोशाक वितरण, बच्चों का बैंक में खाता खुलवाने, प्रशिक्षण सहित अन्य कामों में लगे रहते हैं. झारखंड शिक्षा परियोजना के अधिकारियों के अनुसार परियोजना कार्य भी शिक्षकों के शिक्षा अधिगम में शामिल हैं. ये सभी काम शिक्षकों को ही करना है.

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एनजीओ का काम भी करते हैं शिक्षक

स्थिति यह है कि शिक्षकों को कई एनजीओ के कार्यों के आकलन के लिए भी लगाया जा रहा है. एनजीओ बताते हैं कि कुछ ऐसी रिपोर्ट तैयार की जानी है, जिससे प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा का हुलिया बदल सके. इसके लिए शिक्षक एनजीओ द्वारा सौंपे गये कामों को करने में लग जाते हैं. शिक्षा से संबंधित डेटा एकत्र करने की जिम्मेदारी शिक्षकों को ही सौंप दी जाती है.

22 एनजीओ के कामों में लगे हैं शिक्षक

वर्तमान में सरकारी स्कूलों के शिक्षक 22 एनजीओ के कामों को कर रहे हैं. इसमें प्रथम, लर्निंग लिटरेट, श्री ओरोविंदो सोसाइटी, बॉस्टन सोसाइटी सहित 22 एनजीओ शामिल हैं. इन एनजीओ की रिपोर्ट तैयार करने में शिक्षकों को पठन-पाठन के कार्य से दूर होना पड़ता है. एनजीओ के प्रतिनिधि सरकारी स्कूल के शिक्षकों से फॉर्मेट में रिपोर्ट मांगते हैं. परियोजना की चिट्ठी के अनुसार शिक्षकों को रिपोर्ट को देने के लिए बाध्य होना पड़ता है. कई एनजीओ तो शिक्षा विभाग के कई कार्यों में सीधे रूप से हस्तक्षेप कर रहे हैं. स्कूल मर्ज से लेकर अभिनव शिक्षा तकनीक की गाइडलाइन भी इन एनजीओ द्वारा तैयार की जा रही है.

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शिक्षकों को अन्य कार्य में लगा रही सरकार : संघ

अखिल झारखंड प्राथमिक संघ के श्याम सुंदर सिंह का कहना है कि पूरे साल सरकारी स्कूल 245 दिन खुले रहते हैं. इनमें से मात्र 100 दिन ही शिक्षक बच्चों को पढ़ा पाते हैं. बाकी के 145 दिन शिक्षकों को अन्य कार्य में विभाग की ओर से शामिल किया जाता है. राज्य के सरकारी स्कूलों में बहुत सारे एनजीओ कार्य कर रहे हैं. इन एनजीओ की रिपोर्ट तत्काल व्हाट्सएप के माध्यम से देनी होती है. विभाग की चिट्ठी दिखाकार एनजीओ के प्रतिनिधि शिक्षकों पर रिपोर्ट तैयार करने का दबाव डालते हैं, इसकी वजह से शिक्षकों को इन एनजीओ के अधीन कार्य करना पड़ता है. झारखंड की स्कूली शिक्षा को नीचे का स्तर दिखाकर ये एनजीओ बड़ी-बड़ी कंपनियों का पैसा यहां लगाकर मुनाफा कमा रहे हैं. इन सबके बीच शिक्षकों को मूल कार्य से अलग होना पड़ रहा है.

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शिक्षकों को परियोजना के माध्यम से नयी तकनीक दी जा रही है : अभिनव कुमार

झारखंड शिक्षा परियोजना के अभिनव कुमार ने कहा कि झारखंड शिक्षा परियोजना के माध्यम से जो कार्य शिक्षकों को प्रदान किये जाते हैं, उसका उद्देश्य शिक्षकों को शिक्षा की नयी तकनीक से अवगत कराना होता है. वर्तमान में शिक्षकों का स्तर एक समान नहीं है, शिक्षकों का ज्ञान स्तर एक समान करने के लिए परियोजना शिक्षकों के बीच कई तरह के कार्यक्रम चलाती है. जहां तक 245 दिन शिक्षण कार्य की बात है, तो परियोजना के कार्यक्रम में शिक्षकों के भाग लेने को भी शिक्षकों के शिक्षण कार्य में ही गिना जाता है.

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