न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

एग्जिट पोल 23 को आने वाले एग्जेक्ट पोल के कितने करीब

1,536

Faisal Anurag

एग्जिट पोल 23 को आने वाले एग्जेक्ट नतीजों के कितने करीब हैं?  यह प्रश्न इसलिए जरूरी है कि भारत में एग्जिट पोल अपनी साख को चुके हैं और गलत साबित होने के बाद भी न तो खेद व्यक्त करते हैं और न ही प्रक्रियागत भूल को स्वीकार करते हैं. यूरोप या अमेरिका में एग्जिट पोल नहीं होते हैं. क्योंकि तुंरत बाद मत गिनने की शुरूआत हो जाती है.

Aqua Spa Salon 5/02/2020

ओपिनियन पोल यदि गलत साबित होते हैं तो तुरंत खेद प्रकट करते हुए उसके गलत होने के कारणों की तलाश की जाती है. आमतौर पर वोटर के बिहेवियर के अध्ययन से ही तथ्यातमकता हासिल की जा सकती है. भारत में जिस तरह की प्रतिस्पर्धा दिखायी जाती है उससे आमतौर पर एग्जिट पोल के रूझान नहीं बदलते रहते रहते हैं और देर शाम तक कई बार उसमें भारी बदलाव देखने को मिलता है.

इसे भी पढ़ेंः रवीश कुमार का प्राइम टाइम, योगेंद्र यादव ने कहा-23 मई को हैरान होने के लिए हो जाइए तैयार  

आमतौर पर एग्जिट पोल का शेयर बाजार पर असर पडता है और स्थिर सरकार की संभावना मात्र से ही उसमें उठाल होने लगता है. अतीत का अनुभव बताता है कि बाद में लोगों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पडता है. 2014 में ही एग्जिट पोल ओर वास्तविक रिजल्ट के बीच लाखों करोड़ रुपये लोगों के डूब गये थे. इस बार भी शेयर बाजार में चमक है और भारी चढाव देखा जा रहा है.

चुनाव आयोग ने 2012 में भारत मे एग्जिट पोल पर रोक लगा दी थी. उसके बाद से जो भी एग्जिट पोल दिखाये गये हैं वे वास्तव में पोस्ट पोल सर्वे हैं की श्रेणी में हैं. आमतौर पर एग्जिट पोल का मतलब होता है जो मदतान केंद्र के आसपास वोट दे कर निकलने वाले लागों के बीच किये जाते हैं. इसमें न तो वोटर की पहचान होती है ओर न ही उसकी जाति का पता लगता है. जबकि पोस्ट पोल उस पोल को कहा जाता है जो मतदान के एक दिन बाद विस्तार से किये जाते हैं और जिसमें मतदाता की पहचान और नाम सर्वे करने वाले को पता होता है.

Gupta Jewellers 20-02 to 25-02

इसलिए भारत के एग्जिट पोल के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत रहती है. ऐसा नहीं है कि भारत में ही इस तरह के सर्वेक्षण गलत होते हैं. अभी अस्ट्रेलिया के ताजा चुनावों में भी ओपिनियन पोल पूरी तरह गलत साबित हुए हैं. अस्ट्रेलिया में पिछले सप्ताह ही चुनाव नतीजे आये हैं.

इसे भी पढ़ेंः News Wing Impact: सीएस ने सीएम को कोयला चोरी व लचर बिजली व्यवस्था की दी जानकारी, वितरण निगम के एमडी तलब

लगभग सभी ओपिनियन पोल ने मोरिसन के दौर की समाप्ति की घोषणा कर दी थी. उन ओपिनियन पोल ने लेबर ग्रीन की जीत की बात की थी. उस पोल के हिसाब से इकोलॉजी का सवाल वहां अहम चुनावी मुद्दा था. दिलचस्प बात तो यह थी की वोट के पहले ही इस ओपिनियन पोल को देखते हुए लेबर पार्टी ने जीत का उत्सव मना लिया था. लेकिन वास्तविक पोल में मोरिसन की लिबरल पार्टी ने बहुमत के करीब पहुंच कर जीत हासिल कर लिया. पिछले कुछ समय में ही यूरोप के अनेक देशों के चुनावों में भी इस तरह ओपिनियन पोल लोगों के रूझान का आकलन करने में विफल रहे हैं.

भारत में ही यदि 2014 के बाद से देखा जाये तो अधिकांश विधानसभा चुनावों के नतीजे एग्जिट पोल को गलत साबित करते हैं. हाल में हुए पांच राज्यों के चुनाव में तेलांगना को छोड़ कर शेष सभी राज्यों के चुनावों में एग्जिट पोल धाराशायी हुए. छत्तीसगढ़ में तो वह बुरी तरह गलत साबित हुआ.

बिहार विधानसभा चुनाव में तो एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल दोनो ही गलत साबित हुए हैं. भारत में भी 2014 के चुनावों में एग्जिट पोल बुरी तरह गलत साबित हुए. एग्जिट पोल में अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की शाइनिंग इंडिया की वापसी की बात की गयी थी. बाजपेयी सरकार को 290 सीट तक आने की बात की गयी थी. लेकिन वास्तविक नतीजों में एनडीए को 189 और भाजपा को केवल 145 सीट पर ही जीत मिली थी.

उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू का यह बयान बेहद दिलचस्प है कि एग्जिट पोल को एक्जेक्ट पोल गलत साबित करते रहे हैं. और 1999 से कभी सही साबित नहीं हुए हैं. नायडू के इस बयान को 20 मई के अंक में द हिंदू ने प्रकाशित किया है.

कई बार इस तरह के पोल लोगों के रूझान को प्रकट करते रहे हैं. हालांकि तब वे वास्तव में एग्जिट पोल ही होते थे. 2014 में पोस्ट पोल में रूझान तो सही बताया गया था. चाणक्य का आकलन तथ्य के करीब था. लेकिन यही चाणक्य कुछ ही समय बाद हुए बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में गलत साबित हुआ था. 2019 के चुनाव को ले कर जो नरेटिव प्रचलित रहा है उस संदर्भ में एग्जिट पोल के रूझान वास्तविकता से अलग हैं.

देश भर के गांवों से घूम कर जिन रिपोर्टरों ने चुनावों पर लिखा है, उनमें अधिकांश का तो देश में कहीं लहर नहीं दिखा. लेकिन एक सभा में मोदी ने कहा था कि न तो करंट है न ही अंडरकरंट बल्कि भाजपा के पक्ष में सुपरकरंट हैं. मोदी के इस सुपरकरंट को एग्जिट पोल सही बता रहे हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को देश भर में कहीं लहर नहीं महसूस हुआ था वे 23 मई का इंतजार कर रहे हैं.

2014 के चुनाव में भाजपा उस कांग्रेस के खिलाफ लड़ रही थी जो दस सालों से सत्ता में थी. साथ ही यूपीए  दूसरे कार्यकाल के अंतिम ढाई सालों में अनेक भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप का सामना कर रही थी. गुजरात मॉडल के विकास का उसे सामना करना पड़ रहा था.

पूरे देश में भ्रष्टाचार के नरेटिव के खिलाफ माहौल था और भाजपा सुनहरे भविष्य का सपना दिखा रही थी. लेकिन 2019 के चुनाव में भाजपा सत्ता में पांच साल गुजार कर मैदान में है और विकास संबंधी अनेक तरह के उसके दावे विवादास्पद बन चुके हैं. राजगार के संकट और किसानों की जबरदस्त परेशानी के बीच यह चुनाव हो रहा है. इसके साथ पिछले पांच सालों में देश भर के किसानों के आंदोलन हुए हैं. इसके साथ रफाल का विवाद भी है. संवैधानिक संस्थाओं के कमजोर किये जाने के आरोप के बीच भाजपा ने भी 2014 में विकास के जिन सपनों को चुनाव का नरेटिव बनाया था, उसे इस बार ओझल कर दिया गया है. भाजपा ने पाकिस्तान, मुसलमान और राष्ट्वाद के मुद्दे को विकास के तमाम मुद्दों  को विस्मृत करते हुए इस चुनाव का अपना नरेटिव बनाया है.

23 मई किस नरेटिव के पक्ष में जनादेश देता है इसे देखना दिलचस्प होगा. क्योंकि प्रधानमंत्री ने भी बीच चुनाव में जिस तरह गठबंधन सरकार चलाने में अपनी दक्षता की बात की है, उससे लगता है कि पूर्ण बहुमत को ले कर भाजपा का नेतृत्व आशंकित है. यही कारण हे एग्जिट पोल से वे खुश तो दिख रहे हैं लेकिन उत्सवधर्मी होने से बच रहे हैं. क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के दिन शुरूआत में ही मिठाई बांट कर और पटाखें छोड़ कर अपनी हंसी उड़वा चुके हैं.

इसे भी पढ़ेंः एग्जिट पोल का असर :  शेयर बाजार में उछाल, 900 अंकों की तेजी के साथ खुला मार्केट  

 

 

 

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like