Opinion

डूबती राजनीति को बचाने के लिए वैक्सीन पर सवाल उठाना कितना उचित?

Uday Chandra

लोकतंत्र में नेताओं की नौटंकी का कोई अंत नहीं. वह युग बीत गया जब राजनीतिज्ञ आदर्शों पर चलते थे. भारतीय राजनीति उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है. चारों ओर भ्रम और मायाजाल का वातावरण है.

भ्रष्टाचार और घोटालों के शोर और किस्म-किस्म के आरोपों के बीच देश ने अपनी नैतिक एवं चारित्रिक गरिमा को खोया है. मुद्दों की जगह अफ़वाह की राजनीति हावी होती जा रही है.

समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कोरोना वैक्सीन पर जो बयान आया है, वो इसकी ताजा मिसाल कही जा सकती है. उन्होंने कहा है कि वो कोरोना की वैक्सीन नहीं लगवायेंगे क्योंकि उन्हें बीजेपी की वैक्सीन पर भरोसा नहीं है.

अखिलेश यादव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश भर में कोरोना वैक्सीन को लेकर चर्चा जोरों पर है. वैक्सिनेशन के लिए केंद्र सरकार आज यानी 2 जनवरी 2021 से देश के हर राज्य में कोरोना वैक्सीन का ड्राई रन (Dry Run) चला रही है.

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अखिलेश का यह बयान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है. सवाल यह है कि आखिर देश के वैज्ञानिकों की क्षमता पर सवाल उठाने का अधिकार किसने दिया? क्या उन्हें देश के वैज्ञानिकों पर भरोसा नहीं है.

एक साल से कम समय में अगर भारतीय वैज्ञानिकों ने कोरोना का टीका तैयार किया है, तो वे शाबाशी के पात्र हैं. उनकी क्षमताओं और मेहनत को राजनीति के माइक्रोस्कोप से देखने की कोई ज़रूरत नहीं है.

अखिलेश यादव को शायद यह नहीं मालूम कि भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहां एक साथ कोरोना की चार-चार वैक्सीन पर काम चल रहा है और सभी अंतिम चरण में हैं. इनमें से एक सीरम इंस्टीट्यूट की वैक्सीन कोविशील्ड को आपात इस्तेमाल की मंजूरी भी मिल चुकी है.

यह देश के लिए गौरव की बात है कि पूरी दुनिया कोरोना की वैक्सीन के लिए भारत की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रही है. इस कड़ी में सौ से अधिक देशों के राजनयिकों का उन भारतीय प्रयोगशालाओं का दौरा करना, जहां कोरोना वैक्सीन पर काम चल रहा है, इस बात का प्रतीक है कि दुनिया को भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमताओं पर कोई संदेह नहीं है.

ऐसे में अखिलेश यादव का अपनी डूबती राजनीति को बचाने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता पर सवाल उठाना और उसे राजनीतिक रंग देना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्हें लगता है कि ट्वीट करके भी राजनीति की जा सकती है. अगर ऐसा होता तो मोदी और अमित शाह के सामने भी बार-बार जनता के सामने आने की मज़बूरी न होती.

जिस पार्टी को लोकसभा में 303 सीट का बहुमत है, पॉपुलर मैंडेट पक्ष में है, उस पार्टी के नेता और देश के पीएम नरेंद्र मोदी तो दिन में कई बार जनता से मुखातिब हो जाते हैं.

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उनका नंबर दो यानी अमित शाह तीन-तीन बार हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद भी बार-बार बिहार, अब बंगाल व असम और न जाने कहां-कहां नहीं आ जा रहा है, जनता से मिल रहा है, रैली कर रहा है. बीजेपी के तमाम नेतागण सड़क पर हैं, जनता से मिल रहे हैं, अपनी बातों को जनता के सामने रख रहे हैं.

लेकिन मोदी के मुकाबले देख लीजिए तो हिन्दी प्रदेश के तीन बड़े नेता मायावती, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव (इनके विधानसभा चुनाव कंपैन को छोड़ दीजिए) ने पिछली छह रातें भी अलग-अलग जिलाओं में नहीं गुजारी हैं.

लेकिन दलित-बहुजनों के बुद्धिजीवियों को लगता रहता है कि मोदी और बीजेपी इन समुदाय के साथ बहुत बुरा कर रही है. इन तीनों नेताओं को देख कर यह भी प्रमाणित हो गया है कि ट्वीट करके भी राजनीति की जा सकती है. तो फिर क्या यह मान लिया जाये कि जो लोग जनता के बीच जा रहे हैं वे मूर्ख हैं, क्योंकि वे कुर्सी के भूखे हैं?

वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. लोकतंत्र एक जीवित तंत्र है, जिसमें सबको समान रूप से अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार चलने की पूरी स्वतंत्रता होती है. लोकतंत्र की नींव जनता के मतों पर टिकी होती है.

नागरिकों की आशा-आकांक्षाओं के अनुरूप प्रशासन देनेवाला, संसदीय प्रणाली पर आधारित इसका मजबूत संविधान है. लेकिन अखिलेश यादव सरीखे नेताओं की नौटंकी कई बार इस पर चोट कर कमजोर करने की कोशिश प्रतीत होती है. वैक्सीन पर सवाल उठाना वैज्ञानिकों का अपमान है, उनको इसके लिए अखिलेश यादव को माफ़ी मांगनी चाहिए.

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