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घर भारत है और गृहिणी मोदी सरकार, फिर भी GST में नहीं कोई सुधार

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Girish Malviya

चलिए, आज एक घर की कल्पना करते हैं, जिसमें एक गृहिणी बहुत मुश्किल में है. उसके महीने का बजट 10 हजार था लेकिन उसने महीने की शुरुआत के पांच दिनों में ही 5500 रुपये खर्च कर दिए है. और समस्या यह भी है कि बाहर से जो आम जरूरत का सामान वो ले रही थी वह भी दिनों दिन महंगा हो रहा है. उसके खर्चे भी बढ़ रहे हैं. उसके अनुपात में उसकी कमाई घट रही है, उसे अब बाकी के 25 दिन निकालने है. अब वह क्या करेगी ?……..क्या वह अपने घर के भांडे बर्तन बेचकर खर्चे पूरा करेगी !…….. लेकिन वो यह काम पिछले महीने भी कर चुकी है पिछले महीने में भी उसने गृहस्थी का सामन बेचकर जैसे तैसे घर खर्च चलाया था…….

अब सबसे महत्वपूर्ण बात समझिए यह घर भारत है और गृहिणी मोदी सरकार है सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष के पहले दो महीनों (अप्रैल-मई, 2018) में राजकोषीय घाटा 3.455 लाख करोड़ रुपये रहा है जो पूरे साल के लिए तय लक्ष्य 6.243 लाख करोड़ रुपये का 55 फीसद था.

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अब आमदनी की बात कर लेते हैं. जब मोदी सरकार ने जीएसटी लागू की थी तब यह कहा गया था कि इससे शुरुआत में हर महीने एक लाख करोड़ की आमदनी केंद्र सरकार को होगी, जो कि बाद में और बढ़ेगी. पहले साल की यानी एक जुलाई 2017 से एक जुलाई 2018 तक इसकी हर महीने ओसतन आमदनी 89,995 करोड़ रुपये प्रति महीने की रही है. यानी हर महीने 10 हजार करोड़ का घाटा.

यह तो पिछले साल की बात थी. इस वित्तीय वर्ष में तो औसतन जीएसटी संग्रह 1.10 लाख रुपये प्रति महीने का होगा, यह कहा गया था. सीजीए के अनुसार सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में कर राजस्व के रूप में 14.80 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. और अभी क्या हालत हैं यह आपका पता चले तो आप चौक जाएंगे. चालू वित्त वर्ष के शुरुआती चार महीनों में यानी जुलाई तक सरकार सिर्फ 2.92 लाख करोड़ रुपये कर राजस्व के रूप में जुटा पायी है जो बजट लक्ष्य का 19.8 प्रतिशत है. अगस्त में भी जीएसटी संग्रह में 2.61 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी और यह घटकर 93,960 ही रह गया है. यानी यह दूर-दूर तक भी अपने लक्ष्य के पास नही पुहंच पा रहे हैं.

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अब इसका दुष्प्रभाव क्या है वह समझिए. जीएसटी जब लागू किया गया तब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से यह वादा किया था कि कुछ सालों तक उन्हें जो राजस्व का नुकसान हो रहा है उसे केंद्र की सरकार पूरा करेगी. लेकिन क्या सरकार अपने वादे को निभा रही है ? जवाब है नहीं. धन की कमी से लगभग सभी राज्य सरकारें जूझ रही है. नए विकास कार्य छोड़िए उसे पहले से स्वीकृत योजनाओं में आने वाले खर्च और अपने कर्मचारियों की तनख्वाह निकालने के लाले पड़ रहे हैं.

एक छोटा सा ताजा उदाहरण उत्तराखंड राज्य का लेते हैं. जीएसटी लागू होने से पहले उत्तराखंड में संयुक्त टैक्स कलेक्शन से सरकार को 8336 करोड़ का राजस्व मिल रहा था. जीएसटी के बाद राज्य में टैक्स कलेक्शन में 168 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. जीएसटी में 15139 करोड़ का टैक्स एकत्रित हो रहा है लेकिन राज्य को सेटलमेंट के बाद मात्र 3701 करोड़ मिला है. अब इस खर्च में उत्तराखंड सरकार क्या खाक विकास करेगी. अरे वह तो अपने कर्मचारियों को तनख्वाह भी ठीक से नहीं दे पाएगी. खर्च चलाने के लिए केंद्र सरकार के सामने उसे बार-बार हाथ फैलाने पड़ रहे हैं.

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यह स्थिति सिर्फ उत्तराखंड के साथ नहीं है. यह देश के हर राज्य के साथ है. किसी भी उच्च स्तर के अधिकारी से बात करके देख लीजिए वह आपको सब बता देगा. वित्‍त वर्ष 2017-18 में राज्‍यों का सकल राजकोषीय घाटे का लक्ष्‍य जीडीपी का 3.1 फीसदी था और वह भी तब, जब यह कहा गया कि केंद्र राज्‍यों को टैक्‍स में से ज्‍यादा हिस्‍सा दे रहा है.

मोदी सरकार ने इस राजस्व घाटे को पाटने के लिए पिछले साल 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज उठाया था. और इसके अलावा सार्वजनिक उपक्रमों को बेचकर इस ओवरऑल घाटे की पूर्ति की थी. इस बार हालात पिछले साल से भी बदतर नजर आ रहे हैं. मोदी सरकार की गलत नीतियों की वजह से आयात बढ़ता नजर आ रहा है और निर्यात अपेक्षाकृत गिरता जा रहा है. स्थिति फिर वही आने वाली है. विनिवेश के नाम सरकारी संपत्तियों को ठिकाने लगाया जायेगा यानी फिर घर के भांडे बर्तन बेचे जाएंगे और जैसे तैसे 2019 तक खर्चा चलाया जायेगा.

क्या यही अच्छे दिन दिखाने के लिए इस सरकार को चुना था ?

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं और ये इनके निजी विचार हैं.

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