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हिंदी नाट्य परंपरा भी हो सकती है भारत को एक सूत्र में बांधने का माध्यम

Ashok Pagal

हिंदी भारत को जोड़ने में अन्त:सूत्र की भूमिका निभा सकती है. हिन्दी नाट्य मंचन की भारतीय परम्परा सम्भवत: विश्व भर में सबसे प्राचीन है. इसकी उपस्थिति का प्रमाण वैदिक काल में भी मिलता है. उड़ीसा के कोणार्या और गुजरात के मोढेरा के मंदिरों के भग्नावशेषों से संलग्न उन्नत रंगमधों के अवशेष आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कीर्ति गाथा कह रहे हैं. कई अन्य स्थानों में भी पुरातात्विक सर्वेक्षणों के लिए की गयी खुदाई में प्राचीन रंगमयों के अवशेष मिले हैं. विकास में नाटकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. नाटक पुराने अच्छे लगे सामाजिक-सांस्कृतिक के संवाहक की भूमिका तो निभाते ही हैं, नये मूल्यों की स्थापना भी करते हैं.

वस्तुत नाटक अतीत का प्रत्यक्ष दर्शन है वर्तमान का हू-ब-हू नकल है. और भविष्य का सुन्दर परिकल्पन है. निस्संदेह नाटक ईश्वर प्राप्ति का साधन नहीं है. नाट्य-देवता के रूप में नटराज की पूजा की भी कोई परम्परा नहीं है. हो, नाटक साधना का मार्ग अवश्य है. इससे आनन्द की बिरानन्द की प्राप्ति अवश्य सम्भव है. एक समतामूलक समाज की संरचना में भी नाटक का उल्लेखनीय योगदान है. नाटक की उत्पत्ति के जो कारण बताये जाते हैं, उनके अनुसार समाज में समरसता उत्पन्न करने के लिए चारों वेदों से थोड़ी-थोड़ी सामग्री लेकर पांचवें वेद की रचना हुई है. इसका उद्देश्य सर्वजन हिताय ही था.

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भरत ने अपने नाट्य शास्त्र में स्पष्ट ही लिखा है –

सर्व शास्त्र संपन्न सर्व शिल्प प्रवर्तकम् . माट्याख्यां पंचमं वेदसे इतिहास करोम्यहम् ..

ध्यान देने वाली बात यह है कि एक समय ऐसा भी था, जब वर्ण व्यवस्था का कड़ाई से पालन होता था. शूदों के लिए वेदों का पठन-पाठन सर्वथा निषिद्ध था. ज्ञान का मार्ग ही बन्द था उनके लिए. ऐसे में नाटक अर्थात पंचम वेद की उत्पत्ति हुई और ज्ञान का मार्ग सबके लिए प्रशस्त हुआ. उस काल में नाट्य प्रयोग में प्रयुक्त रंगमंच सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण हुआ करते थे. दर्शक दीर्घा वर्ण विहीन व भेद-भाव रहित हुआ करता था.

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कालिदास और उसके बहुत बाद तक नाट्य प्रयोगों की बड़ी समृद्ध परम्परा मिलती है. परन्तु उसके बाद एक लम्बे समय तक नाटक और रंगमंच का कुछ अता-पता नहीं चलता. इस अंधकार की अवधि को वर्षों में नहीं, दशकों में नहीं वरन् शताब्दियों में व्यक्त करना पड़ता है. इतिहास में यह काल संक्रमण काल (राजपूत काल) से प्रारम्भ होकर पुरा तुर्क काल (1206-1451), अफगान काल (1451) 1526), मुगल काल (15261757) और ब्रिटिश काल (1757 1947) तक अर्थात 13वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों से लेकर 19वीं सदी के अन्तिम दशकों तक फैला हुआ है. इसलाम शासकों के धर्मानुसार शासन प्रणाली ने केवल नाटकों को ही नहीं अन्य कलाओं को भी पनपने नहीं दिया. अंगरेजों की चिंता दूसरी थी. उन्हें भय था कि नाटक के माध्यम से लोगों में कहीं राष्ट्रीय चेतना का संचार न हो जाय. इन सात-आठ सौ वर्षों में नाटक की जो अवस्था थी, उसे सुषुप्तावस्था भी नहीं कहा जा सकता. एक तरह से नाटक मृतप्राय ही था.

नाटक का नवोन्मेष 19वीं सदी के अन्तिम दशकों में भारतेंदु के अभ्युदय से ही माना जा सकता. है हालांकि 3 अप्रैल 1858 को बनारस थियेटर काशी के तत्वावधान में शीतला प्रसाद त्रिपाठी के नाटक जानकी मंगल के मंचन से हिन्दी रंगमंच अपने अस्तित्व में आ चुका था. किन्तु इसका स्पष्ट स्वरूप भारतेंदु के रंगकर्म से ही उभरा. इसके पूर्व लीला नाटक रामलीला रासलीला आदि अथवा भांडों के तमाशे, स्वांग जैसे पारम्परिक नाट्य रूप ही प्रचलित थे. सभी प्रचलित नाट्य रूपों की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे सभी अपने युग से जुड़े हुए नहीं थे. समय और समाज सापेक्ष नहीं होना साहित्य की सबसे बड़ी दुर्बलता मानी जाती है.

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नाटक के अन्य जरूरी तत्त्वों का भी उनमें नितांत अभाव था. एक जरूरी बात यह भी कि उस समय नाटक खेलने और नाटकों में अभिनय करने को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था. इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में भारतेंदु ने 1870 में कवितावर्द्धिनी सभा और 1873 में पेनी रीडिंग क्लब की स्थापना कर सत्य हरिश्चन्द्र, अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा जैसे उत्कृष्ट कथानक वाले नाटकों की रचना की और उनके आरंगन से एक न unये रंगमंच का सूत्रपात किया. भारतेंदु स्वयं एक अच्छे अभिनेता थे. जानकी मंगल के अभिनेता दल में वह भी शामिल थे और अपने अभिनय से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे. भारतेंदु ने स्वयं तो नाटक लिखे और किये ही, उन्होंने नये रचनाकारों और अभिनेताओं को नाटक लिखने और खेलने को प्रेरित भी किया. उनके प्रभाव और से काशी, कानपुर आगरा, मिर्जापुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, प्रयाग, दिल्ली आदि शहरों में कई रचनाकारों ने नाटक लिखे और कई रंगमंडलियां स्थापित हुई.

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