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चुनाव में हिंदी मीडिया ने अपने ही चेहरे को बिगाड़ने का किया काम

Faisal  Anurag

आमचुनाव का मात्र एक चरण ही शेष है. जिसमें 59 लोकसभा क्षेत्रों में 19 मई को वाट डाले जायेंगे. थका देने वाले लंबे चुनाव अभियान के बीच भारतीय मीडिया अनेक सवालों से घिरी रही है. हिंदी मीडिया को ले कर ज्यादा सवाल उठते रहे हैं. हिंदी मीडिया ने कई ऐसी खबरों को लोगों की जानकारी से ओझल रखने का भरपूर प्रयास किया है जिससे सत्तापक्ष जुड़ा रहा है.

इस पूरे चुनाव अभियान में चुनाव आयोग और हिंदी मीडिया पर जिस तरह के सवाल उठे हैं उससे जाहिर होता है कि लोकतंत्र में इन दोनों संस्थाओं को अपनी साख को सबके लिए विश्वसनीय बनाने की चुनौती पैदा हो गयी है. मीडिया ने प्रधानमंत्री मोदी के जिस तरह के इंटरव्यू छापे या दिखाये हैं उसमें इन प्रश्नों का अभाव है.

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इसी कारण इंटरव्यू को लेकर सवाल खड़े किये गये हैं. आमतौर पर मीडिया से अपेक्षा की जाती है कि वह इस सवाल के बीच में ऐसे प्रति प्रश्न जरूर पूछेगा, जिससे असलियत सामने आये. प्रधानमंत्री ने एक चैनल को दिये गये साक्षात्कार में जिस तरह से रडार और बादल के बारे में कहा, उससे उनकी छवि प्रभावित हुई है. गौरतलब है कि शनिवार को एक साक्षात्कार में नरेंद्र मोदी ने बताया कि जिस दिन एयर स्ट्राइक करना था, उस दिन सेना के अधिकारियों ने कहा कि मौसम बहुत खराब है. इसे एक दिन के लिए टाला जाये.

लेकिन मैंने (मोदी ने) बादले से पाकिस्तानी सेना को झांसा दिया जा सकता है और पाकिस्तान के रडार हमारे विमानों के लोकेशन को नहीं पकड़ पायेंगे. और मेरी सेना ने मेरी सलाह को मानते हुए उसी दिन एयर स्ट्राइक किया. जबकि तथ्यात्मक सच्चाई यह है कि खराब मौसम के बावजूद कोई भी रडार विमान के लोकेशन और गति का पता लगाने में सक्षम होता है.

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सोशल मीडिया पर जब प्रधानमंत्री के इस कथन का मजाक छाया और विपक्ष ने मोदी का मजाक बनाया तो भारतीय जनता पार्टी को वह ट्विट वापस लेना पड़ा जिसमें बादल और रडार के बारे में बातें की गयी थीं. देश भर में इस पर विवाद हुए. विपक्ष ने भी इसका मजाक उडाया. लेकिन हिंदी मीडिया का बड़ा हिस्सा इसे नजरअंदाज कर गया.

इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. क्योंकि हिंदी मीडिया ने पूरे चुनाव अभियान में जिस तरह की भूमिका निभायी है उसे लेकर अनेक आरापों का उसे शिकार होना पड़ा है. और रडार वाले मामले में तो इस आरोप की पुष्टि भी हो जाती है.

झारखंड के प्रमुख अखबारों और उनके विभिन्न संस्करणों ने जिस तरह अनेक खबरों को एकतफा तरीके से ट्रीट किया है, उसी सिलसिले में इसे भी देखा जा रहा है. प्रधानमंत्री ने भारत के सैन्य अभियान की गोपनीय रणनीति को भी इस बातचीत में उजगर किया है. युद्ध ओर सैन्य विषयक रणनीतियों को सार्वजनिक होने के इस गंभीर मामले को अनेक जानकार देश की सुरक्षा से जोड़ कर देख रहे हैं.

लेकिन हिंदी मीडिया इस गंभीर मामले को भी लोगों की जानकारी में लाने से कतराता रहा. इसकी गंभीरता को न उजगार कर आखिर मीडिया के किस एथिक्स का परिचय दिया, इसे समझना कठिन है.

इमरजेंसी में भी भारत के अनेक मीडिया तंत्र अपने प्रतिरोध को विभिन्न तरीकों से जाहिर करते रहे थे. लेकिन पिछले कुछ समय से मीडिया की भूमिका सामान्य नहीं ही दिखती है.

यह पहला आमचुनाव है, जिस में प्रधानमंत्री या सत्तापक्ष अपने पांच सालों के कामकाज की चर्चा से परहेज करता रहा है. जबकि 2014 में तो उसे जनादेश ही इस आधार पर मिला था कि यूपीए सरकार ने जिस तरह की भूमिका निभायी थी उससे नाराजगी थी. और मोदी नया सपना लोगों को दिखा रहे थे. लेकिन 2019 में मोदी सहित तमाम भाजपा और उसके सहयोगी दल के नेताओं ने अतीत के नेताओं के संदर्भ में चर्चा किया और वर्तमान पर कोई बात भी नहीं की है. और न ही भविष्य के लिए किसी तरह की उम्मीद मतदाताओं को दिखायी है.

अपने पांच सालों के शासन के दौरान मोदी 2022 तक भारत को पूरी तरह बदल कर न्यू इंडिया बनाने की बात करते रहे हैं. लेकिन अब 2024 की बात एक-दो सभाओं में उन्होंने की है. अगले पांच सालों के लिए भाजपा या मोदी क्या आर्थिक सपनों को जमीन पर उतारेंगे- इस पर कोई ठोस आश्वासन तो नहीं दिया है.

सबसे बड़ी बात तो यह रही है कि बेरोजगारी के सवाल पर पूरी भाजपा खमोश है. मोदी पिछले आमचुनाव में हर साल दो करोड़ रोजगार देने के सपने से युवाओं को अपनी ओर लाये थे. लेकिन इस बार उन्होंने इस गंभीर सवाल को ही दरकिनार कर दिया.

पूरे चुनाव अभियान के दौरान भी हिंदी मीडिया में आर्थिक सवालों पर कोई खास बात नहीं की गयी. इस बीच जिस तरह आर्थिक क्षेत्र में आये गतिरोध को लेकर भी गंभीर सवाल उठे. लेकिन इक्के दुक्के स्वर को ही प्रमुखता दी गयी. प्रधानमंत्री आर्थिक सलाह परिषद के सदस्य रथिन राय के उस बयान को हिंदी अखबरों के बड़े हिस्से ने प्रकाशित ही नहीं किया, जिसमें भारत के गंभीर आर्थिक संकट में फंसने का अंदेशा जाहिर किया गया है.

यहां तक कि राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों को लेकर भी जिस तरह हिंदी अखबारों ने भूमिका निभायी वह भी कम चिंताजनक नहीं है.

प्रसार और पहुंच के नजरिये से हिंदी मीडिया भारत में प्रथम है. लेकिन कंटेंट और साख में उसका संकट सबसे ज्यादा गंभीर है. हिंदी मीडिया ने लंबे समय में जिस छवि का निर्माण किया था, वह आर्थिक और वैचारिक दबाव में लड़खड़ा रहा है.

हालांकि दूसरी भाषाओं की बहुसंख्यक मीडिया इससे भिन्न नहीं है. लेकिन वह सूचना देने में हिंदी मीडिया से ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने की छवि गढने में कामयाब रही है.

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