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देश में उच्च शिक्षा को हाशिये पर डाला जा रहा है

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SRIJAN KISHORE

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर, 2018 को गुजरात के केवाड़िया में सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया. यह प्रतिमा सरदार सरोवर बांध के निकट साधू बेत के छोटे से द्वीप पर स्थित है. इस प्रतिमा का नाम ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ है जो दुनिया में सबसे ऊंची है. इसके अनावरण के 4-5 दिनों बाद ही सरकार की तरफ यह कहा जाने लगा कि इससे पर्यटन बढ़ेगा और यह बढ़ना शुरू भी हो गया है. इस पर्यटन से सरकारी खजाने में कुछ ही वर्षों बाद करोड़ों का फायदा होगा.

बिजनेस टुडे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक- ‘प्रतिमा अनावरण के 11 दिनों बाद ही, 1.28 लाख से अधिक लोगों ने सरदार पटेल की प्रतिमा को देखने गुजरात के केवाड़िया गांव में पहुंचे. यह अच्छी बात है कि 10 नवम्बर,  2018 तक इतने कम दिनों में सरकारी खाते में 2.1 करोड़ रुपये का रेवेन्यू आया.

लेकिन इस परियोजना से फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ है. राजस्व आमदनी बढ़ने का मतलब रोजगार का बढ़ना नहीं होता है. द वायर में प्रकाशित रिपोर्ट को माने तो इस प्रतिमा ने करीब पचहत्तर हजार आदिवासियों की जमीन को अधिग्रहित करके करीब पांच हजार परिवार को प्रभावित किया है. इस परियोजना ने एक बात स्पष्ट कर दिया है कि आदिवासियों की ज़मीनों को लूटकर विकास करना कोई नई बात नहीं है. भारत में आदिवासियों को विस्थापित करके उनकी जमीन पर विभिन्न विकास परियोजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए किसी भी सरकार ने सवाल नहीं उठाया है.

सवाल उठता है कि यह विकास किसके लिए किया जा रहा है और इसमें किसका विकास हो रहा है? सरकार एक तरफ आदिवासी इलाकों को रेड कॉरिडोर का नाम देती है,  दूसरी तरफ उन्हीं इलाकों में खनिज उत्खन्न का काम भी करती है और वहां से आदिवासियों को जबरन विस्थापित करती है. सरकार की इस विकास परियोजना में कौन से लोग शामिल हैं,  जो रेड कोरिडोर का हवाला तो देते हैं, लेकिन खनिज सम्पदा को लूटकर मोटा पैसा कमाना चाहते हैं. क्या सरदार पटेल चाहते थे कि भारत के आदिवासियों को विस्थापित करके उनकी प्रतिमा बनायी जाए? आखिर यूनिटी कैसे प्रकट होगी? आदिवासियों के साथ भेदभाव करके या उन्हें तथाकथित मुख्यधारा से अलग करके, क्या इससे यूनिटी स्थापित की जा सकती है? 5 जनवरी, 2011 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक सुनवाई के दौरान यह कहा गया कि 8.6 प्रतिशत आदिवासी आबादी ही भारत के मूलनिवासी हैं. बाकी सारे बाहरी हैं, लेकिन जो इस देश के मूलनिवासी हैं, आज वही लोग हाशिये पर चले गये हैं. आधुनिक विकास की चाह में आदिवासियों का विनाश जारी है. यह कहां तक सही है?

सरदार पटेल की प्रतिमा पर जितना पैसा खर्च किया गया है, वह पैसा इस देश की उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता तो हालात में कुछ सुधार हो सकता था. 1 नवम्बर, 2018 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी एक खबर कि माने तो टाटा सामाजिक संस्थान के हैदराबाद खण्ड में प्रतिष्ठित बीए इन सोशल साइंसेस कोर्स को सरकार बन्द करने वाली है. आर्थिक स्थिति का हवाला देकर छात्रवास बन्द कर दिए गया. यह बात अपने आप में अद्भुत और हास्यापद है.

सवाल यह उठता है कि आखिर समाज किससे आगे बढ़ेगा? सरदार पटेल की मूर्ति से या उच्च शिक्षा से. वर्तमान सरकार यह क्यों नहीं समझ पा रही है कि शिक्षा का मुद्दा सीधा समाज की बेहतरी से जुड़ा है. क्या सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराना सरकार का काम नहीं है? आखिर यह कैसे सम्भव है कि हम संस्थान के नाम से ही पता लगा लेते हैं कि वहां के बच्चों का भविष्य क्या होगा? वर्तमान सरकार के शासन में लगातार शिक्षा के बजट में कटौती की जा रही है. वहीं निजी शिक्षण संस्थानों को छूट दी जा रही है. ऐसे संस्थानों में एमबीए, इंजीनियरिंग तथा अन्य प्रोफेशनल कोर्सो के नाम पर लोगों को लूटा जाता है. इसे रोकने के लिए सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है. प्राईवेट स्कूलों में आज भी बच्चों के माता-पिता का इंटरव्यू लिया जाता है. यदि एक दलित या आदिवासी माता-पिता जिसने खुद पढ़ाई नहीं की है, तो क्या उनका बच्चा प्राईवेट अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ पाएगा? आखिर यह कैसी नीति है?

मौजूदा सरकार शिक्षा को लेकर गम्भीर नहीं है. सरकार के पास शिक्षा नीति पर कोई स्पष्ट सोच नहीं है. लेकिन सरकार की गतिविधियों को देखकर यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार शिक्षा को नेस्तानाबूत कर देना चाहती है. सरकार विचार-विमर्श की परम्परा को खत्म करना चाहती है. क्योंकि समाज में तर्कपूर्ण अध्ययन के द्वारा एक बेहतर समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है. इसलिए समाजशास्त्रियों को ही जड़ से खत्म कर देना चाहती है. वहीं दूसरी ओर कौशल विकास योजना के तहत् एक कामगार मजदूर बनाने पर जोर दे रही है. इससे समाज में मजदूर तो होंगे, लेकिन बेहतरी के लिए सवाल खड़ा नहीं करेंगे. 29 जून, 2018 मानव संसाधन विकास मंत्री का ट्वीट आया कि अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को हटाकर एक नया आयोग लाया जाएगा. उन्होंने इसका नाम ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ बताया. दरअसल यह सरकार संदेश देने की कोशिश कर रही है कि आप तैयार बैठे रहिए हम बिना किसी पूर्व सूचना के कभी भी कोई नया फैसला ले सकते हैं. इसका उदाहरण हमने जीएसटी और नोटबन्दी में देखा है. वर्तमान सरकार ने कई आयोग के नाम बदले ठीक इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सरकार ने कई शहरों, रेलवे स्टेशनों के नाम बदल चुकी है. सवाल उठता है कि क्या नाम बदलने से समाज का विकास हो जाएगा या नागरिकों को रोजगार मिल जाएगा.

दरअसल यह एक थोथी कल्पना है. वर्ष 1956 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया गया था. उस समय से लेकर आजतक कई सामाजिक उत्थान के कार्य हुए. सरकार शासन के आखिर वर्ष पूरा कर रही है और उल्लू-जूलल फैसले ले रही है, यह कहाँ तक सही है? यह सरकार की आधी अधूरी सोच को दिखाता है. शिक्षा मंत्रालय ने कुछ महीने पहले एक फैसला लिया जिसमें स्नातक की शिक्षा में 100 घण्टे हुनर विकास के लिए दिए जाएंगे. आखिर इतने बड़े फैसले अचानक किस राय के बिना पर और कैसे लिया गया?  इससे स्पष्ट है कि सरकार ने उच्च शिक्षा को अपने एजेण्डे में सबसे निचले पायदान पर रखा है.

2 दिसम्बर, 2018 को ‘द वायर’ में छपी एक खबर के अनुसार ‘मध्य प्रदेश के एक आरटीआई कार्यकर्ता चन्द्रशेखर गौड़ ने देश के प्रतिष्ठित आईआईटी में शिक्षकों के खाली पड़े पद के बारे में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से जवाब मांगा, उनके जवाब विचलित करने वाले हैं. यह जानकार बेहद आश्चर्य होता है कि ‘मुम्बई, दिल्ली, गुवाहाटी, कानपुर, खड़गपुर, मद्रास, रूड़की और वाराणसी स्थित आईआईटी में फिलहाल शिक्षकों की संख्या 4,049 है, जबकि इनमें फैक्ल्टी के कुल 6,318 पद स्वीकृत हैं. इस हिसाब से 2,269 पद खाली रहने के कारण इन संस्थानों में करीब 36 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है.” सबसे खराब स्थिति तो आईआईटी बीएचयू की है. यहां इस वक्त 548 स्वीकृत पद के बदले मात्र 265 शिक्षक काम कर रहे हैं. इससे यह बात बिल्कुल साफ है कि आज हमें गौरक्षा, राम मन्दिर, हिन्दु धर्मान्तरण, लव-जिहाद, सरना-ईसाई के मुद्दे क्यों पकड़ाये जा रहे हैं?

सरकार की मंशा यही है कि इस देश के नौजवान इन सारी जरूरत की बातों के बारे में न सोचें और न ही सवाल उठाये.  आज देश के कई केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर को संविदा से नियुक्त करके उन्हें 25 और 40 हजार रुपये तक की वेतन पर रखा जा रहा है. इसका कारण कम बजट बताया जाता है ऐसे वक्त में तीन हजार करोड़ की मूर्ति बनाने कि आखिर जरूरत क्यों थी? जब इस देश के उद्योगपति सीएसआर के अन्तर्गत सरदार पटेल की मूर्ति बनाने में अपना सहयोग दे सकते हैं तो बदहाल उच्च शिक्षा को मजबूत करने के लिए आगे क्यों नहीं आते? सरकार उद्योगपतियों को केवल खुश रखने में लगी है ताकि चुनाव में मोटा चंदा मिल सके.

इस देश में नौजवान अपनी पीएचडी की पढ़ाई पूरी करके नौकरी के लिए परेशान घूमता है. वहीं दूसरी ओर देश के विश्वविद्यालय में शिक्षकों के पद खाली रखना एक मजाक दिखता है. सही मायने में सरकार नौजवानों को बेरोजगार रखना चाहती है ताकि फिर से रोजगार में नाम पर वोट लिया जाए और उन्हें झूठे सपने दिखाए जाए? मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही कहा था कि वह एक नई शिक्षा नीति लाएगी. इसके लिए टी. एस. आर. सुब्रह्मयम समिति भी बनी. मज़ेदार बात यह थी कि उस समिति में शिक्षाविद् को दरकिनार कर सिर्फ नौकरशाह को शामिल किया गया. उन्होंने नई शिक्षा नीति बनाई. उन सबों ने बड़ी मेहनत करके 253 पृष्ठ की एक रिपोर्ट तैयार की. तत्कालीन शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने इस रिपोर्ट को किनारे कर दिया. बाद में मानव संसाधन मंत्रालय की बेवसाइट पर करीब 44 पन्नों का एक इनपुट जारी किया गया. दरअसल यह 253 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहीं-कहीं से निकालकर बनाई गई है. जबकि कायदे से सरकार को एक प्रस्ताव लाकर देशभर में राय-शुमारी करके नीति बनानी चाहिए थी. नीति और इनपुट सरकार स्वयं कैसे दे सकती है? नीति के लिए जरूरी है कि सरकार शिक्षा विशेषज्ञों से राय मांगे. देश का सबसे पुराना केन्द्रीय विश्वविद्यालय विश्व भारती है. यहां के चांसलर देश के प्रधानमंत्री होते हैं. इस विश्वविद्यालय की स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी. विश्वभर से बच्चे यहां भाषा, विज्ञान, कला, संगीत, ग्रामीण अध्ययन के साथ अन्य 50 विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं. देश को गौरव प्रदान करने वाला यह विश्वविद्यालय अक्टूबर, 2018 से करीब ढाई वर्षों तक स्थाई कुलपति के बिना संचालित हो रहा था, जब केन्द्रीय विश्वविद्यालय की यह स्थिति है तो राज्य स्तर के कॉलेजों की क्या स्थिति होगी.

हमें समझना होगा कि कम बजट का हवाला देकर जब सरकार उच्च शिक्षा को मजबूत नहीं करना चाहती, ठीक उसी तरह आदिवासियों को विस्थापित करके मूर्ति निर्माण करने से क्या देश आगे बढ़ेगा? शिक्षा हमारी रीढ़ है और उसे मजबूत किए बगैर विकास सम्भव ही नहीं हो पाएगा.

संदर्भ:

  1. https://www.businesstoday.in/latest/trends/statue-

of-unity-sardar-patels-statue-attracts-more-than-

128-lakh-visitors-in-11-days/story/289902.html

  1. https://thewire.in/politics/bjp-sardar-patel-statue-

of-unity-protests

  1. https://www.youtube.com/watch?v=

RbyVqep6IMQ

  1. http://www.newindianexpress.com/cities/

hyderabad/2018/nov/01/tiss-to-shut-down-hostel-

and-scrap-ba-social-science-course-1892788.html

5.https://www.youtube.com/watch?v=SGLlZzpSxS8

6.http://thewirehindi.com/64825/36-percent-

seats-of-teachers-vacant-in-the-eight-iits-rti-

reveals/?fbclid=IwAR2P43zhalaqopus5-

nnZXIf7O0RUNAfeUNU8G7hn

blBkZHqaI47QB76KOU

7.https://economictimes.indiatimes.com/news/

politics-and-nation/visva-bharati-gets-a-full-

time-v-c-after-more-than-two-and-half-years/

articleshow/66111717.cms

 

(लेखक समाज कार्य के शोधार्थी हैं)

सम्पर्क : आदिवासी अध्ययन विभाग, भारतीय सामाजिक संस्थान, लोदी रोड, नई दिल्ली-110003

Email- srijankishore@gmail.com

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