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“ट्रिपल एम” के साथ अन्य को जोड़कर झारखंड की राजनीति में बड़ी लकीर खीचने की तैयारी में हेमंत सोरेन

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Ranchi : झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पार्टी को नया कलेवर देने की तैयारी में जुट गए हैं. मांझी, महतो और मुस्लिम यानि “ट्रिपल एम” को साथ लेकर राजनीति करनेवाली झामुमो अब अन्य वर्गों को भी जोड़कर झारखंड की राजनीति में बड़ी लकीर खीचने के फ़िराक में है. इसका नमूना रविवार को झामुमो द्वारा जारी की गयी केंद्रीय समिति के सदस्यों की सूचि में साफ़ तौर पर देखने को मिल रहा है. 246 सदस्यों की सूची में जिस तरह से “ट्रिपल एम” के आलावा अन्य वर्गों को जगह दी गयी है वह हेमंत सोरेन के नए तेवर की बानगी है. इस सूची को देखकर यह साफ़ है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जिस झामुमो को तैयार किया था उसमें अब नया पौध भी लहलहाएगा. इसका सारा श्रेय पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जाता है.

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पूरे आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले रहे हैं हेमंत सोरेन

पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हेमंत सोरेन को झामुमो ने सर्वसम्मति से कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व सौपा था. उस समय यह कहा जा रहा था कि क्या हेमंत सोरेन गुरूजी द्वारा तैयार की गयी पार्टी को चला पायेंगे. वजह यह था कि पार्टी में स्टीफन मरांडी, लौबिन  हेम्ब्रेम, चम्पई सोरेन, नलिन सोरेन, मथुरा महतो सरीखे कई ऐसे बड़े नेता थे जो गुरूजी के शुरूआती दिनों के साथी थे. इनपर जिम्मेवारी नहीं देकर पार्टी ने हेमंत सोरेन के कंधे पर कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व सौपा था. लेकिन सभी अंदेशा को ख़ारिज करते हुए हेमंत सोरेन ने कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व मिलते ही पार्टी की पुरानी रणनीति के साथ कुछ नयी चीजों को तालमेल कर एक नया झामुमो के निर्माण पर काम शुरू कर दिया. वर्ष 2014 चुनाव में जिस वजह से पार्टी सत्ता में नहीं आ पायी थी, उसपर भी हेमंत ने काम किया. झारखंड में 2014 के विधानसभा चुनाव के पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल से इन्कार कर दिया था. उस वक्त इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला, जो पहली दफा मजबूती से सत्ता के करीब पहुंच गई. वर्ष 2019 के चुनाव में हेमंत ने यह गलती नहीं की. झामुमो के लिए इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह था कि झारखंड की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में समान विचारधारा वाले दलों संग तालमेल किए बगैर सत्ता के दहलीज तक पहुंचने की उसकी डगर आसान नहीं. पिछले चुनाव की गलतियों से सीख लेकर 2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने गठबंधन का दांव आजमाया. इस बार कांग्रेस और राजद के साथ चुनावी गठबंधन कर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उम्मीद से काफी बेहतर प्रदर्शन किया. सबसे बड़ी बात यह रही कि हेमंत सोरेन ने अपनी पार्टी नेताओं के साथ समन्वय स्थापित कर गठबंधन की राजनीति को पुरे आत्मविश्वास के साथ आगे लेकर चले. नतीजा दिख रहा है कि हेमंत पार्टी और सरकार दोनों मोर्चे पर आत्मविश्वास से लवरेज होकर निर्णय ले रहे हैं.

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ताबड़तोड़ ले रहे हैं नीतिगत निर्णय

चुनाव में झामुमो 30 सीटें हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में उभरा और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने. आरंभ में ऐसा लग रहा था कि गठबंधन की इस सरकार में कांग्रेस झामुमो पर हावी रहेगी. पूर्व के अनुभव कुछ ऐसे ही थे, लेकिन हेमंत सोरेन के एक के बाद एक लिए गए नीतिगत फैसलों से लेकर राजनीतिक निर्णयों को देख अब ऐसा लग रहा है कि वे बगैर किसी दबाव के वह बड़ी लकीर खींच रहे हैं. आदिवासियों की अस्मिता से जुड़ा सरना धर्म कोड का मामला हो या फिर नियोजन को लेकर लिए गए निर्णय या मॉब लिंचिंग से जुड़ा निर्णय, सभी हेमंत की राजनीतिक सोच को दर्शाता है. अपने मतदाताओं को साधने का काम अपने नीतिगत निर्णयों से हेमंत सोरेन कर रहे हैं. सभी ऐसे निर्णय हैं जिसमें सहयोगी दल भी खुलकर कुछ कहने की स्थिति में नहीं है.

 

सरना धर्म कोड से जनजातीय समुदाय में और मजबूत हुई झामुमो की पैठ

जब जब सहयोगी दल ने कुछ मामले को लेकर हेमंत सरकार पर दवाब बनाने का प्रयास किया हेमंत ने कुछ ऐसा निर्णय लिया जिसके सामने सभी चित हो गए. सरना धर्म कोड का मामला भी ऐसा ही था. इस वर्ष की शुरुआत में कांग्रेस ने राज्य में योजनाओं की निगरानी के लिए बनी 20 सूत्री कमेटियों में हिस्सेदारी का मसला उठाया तो ऐसा लगा था कि एक माह में इसका निपटारा हो जाएगा, लेकिन अब एक साल बीतने के बाद भी यह मामला नहीं सुलझा है. इससे पहले सबको चौंकाते हुए हेमंत सोरेन ने सरना धर्म कोड को वर्ष 2021 की जनगणना में शामिल कराने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया तो इसका व्यापक संदेश गया. इस फैसले से जनजातीय समुदाय में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा का आधार और मजबूत हुआ. जब मोर्चा की सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला उठाया तो इसे भी हेमंत ने लपक लिया और जनजातीय समुदाय तथा अनुसूचित जाति का आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने की भी वकालत की. इन फैसलों से हेमंत सोरेन ने उन जाति-समुदायों को भी अपनी ओर आकर्षित किया, जो कांग्रेस के करीबी माने जाते रहे हैं. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने दबाव बनाने की कोशिश नहीं की. कुछ माह पहले दबे मुंह कुछ विधायकों ने इसके लिए मुहिम चलाई, लेकिन वे औंधे मुंह गिरे और सफाई देने लगे. खुद कांग्रेस के ही एक विधायक ने पुलिस में इसकी शिकायत की. सरकार बनाने के बाद विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में गठबंधन की सरकार को कामयाबी मिली तो इसका श्रेय हेमंत सोरेन को गया. यही नहीं, एक कदम आगे बढ़कर हेमंत सोरेन ने मधुपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम आने के पहले ही वहां से चुनाव लड़ रहे अपने दल के प्रत्याशी को सरकार में मंत्री बना दिया. बाद में हफीजुल अंसारी चुनाव जीते भी. कांग्रेस और राजद में भितरखाने इसे लेकर खलबली मची, लेकिन कोई भी खुलकर सामने नहीं आया.

 

प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की कर रहे तगड़ी घेराबंदी

राज्य में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद से ही भाजपा लगातार उनपर आक्रमण का एक भी मौका नहीं चुक रही है. हेमंत सोरेन ने भाजपा की रणनीति को उसके ही हिसाब से जवाब दिया और भाजपा की भी तगड़ी घेराबंदी की है. भाजपा ने हेमंत सरकार के गठन के डेढ़ महीने के भीतर झारखंड का बड़ा आदिवासी चेहरा बाबूलाल मरांडी को घर वापसी कराई. पार्टी के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह ने बाबूलाल मरांडी को एक भव्य समारोह ने भाजपा में शामिल कराया. उस समय यह कहा जा रहा था कि भाजपा ने संथाल आदिवासी चेहरा को पुनः सामने कर हेमंत सोरेन को बड़ी चुनौती दी है, लेकिन भाजपा के सोच पर हेमंत ने पानी फेर दिया. अभी तक नेता प्रतिपक्ष के पद पर भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी को विधानसभा से मान्यता नहीं मिल सकी है. इसकी वजह तकनीकी है. बाबूलाल मरांडी विधानसभा चुनाव झारखंड विकास मोर्चा के चिह्न पर लड़े थे. बदली राजनीतिक परिस्थितियों में उन्होंने मोर्चा का विलय भाजपा में कर दिया, लेकिन विधानसभा में मान्यता नहीं मिलने के कारण वे नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में मुखर नहीं हो पा रहे हैं. इसकी सुनवाई झारखंड हाई कोर्ट के साथ-साथ विधानसभा अध्यक्ष के न्यायाधिकरण में चल रही है. कानूनी पेंच में उलझी भाजपा ने सरकार की घेराबंदी आरंभ की है, लेकिन इसमें बड़े नेताओं की अलग-अलग खेमेबंदी नजर आ रही है. कुल मिलाकर हेमंत सोरेन अपने सहयोगी दलों को जहां काबू में रखने में सफल रहे हैं, वहीं विपक्ष का बिखराव भी उन्हें मजबूती दे रहा है. ऐसे में आने वाले दिनों में अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों से वह बढ़त बनाए दिख रहे हैं.

Nayika

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