Opinion

हेमंत सरकार के सामने अवसर भी है और चुनौतियां भी

Srijan Kishor

आखिर महागठबंधन ने झारखंड के आदिवासी और मूलवासियों को उनके मुद्दे समझाने में सफलता पायी. परिणाम स्वरूप राज्य की कमान अब हेमंत सोरेन के हाथों में है. आगे मुख्यमंत्री जी के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों ही काफी है.

31 मिलियन आबादी के साथ झारखंड ‘पेरू’ की जनसंख्या के बराबर है. जो कि विश्व में (204 देशों में) चालीसवां सबसे बड़ा देश है. झारखंड की बात जैसे ही होती है, तो सबसे पहले हमारे सामने दो चीज़ उभर कर सामने आती है. इसमें सबसे पहले है ‘आदिवासी समाज’ और दूसरा यहां की अस्थिर सरकारों का शासन. दोनों को मिला कर समझने कि कोशिश करें तो तस्वीर कुछ साफ़ दिखाई देती.

SIP abacus

इसे भी पढ़ेंः झारखंड में खाकी भी नहीं सुरक्षित, उग्र भीड़ के साथ पुलिस की हो रही है नोकझोंक

MDLM
Sanjeevani
सृजन किशोर (फाइल फोटो)

दरअसल, यहां का पिछड़ापन और विकास के सूचकांक में नीचे स्थानों में रहना, साथ में यहां जितनी भी सरकारें रही, दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह समझा जाना चाहिए. और फलस्वरूप आज यहां की आधा से ज्यादा की जनसंख्या दयनीय गरीबी में अपनी ज़िन्दगी गुजर बसर करने को मजबूर है.

जो झारखंड 1907 में ही टाटा स्टील के आने से इंडस्ट्रीयल ग्रोथ और शहरीकरण देख रहा था, वह आज भी उन राज्यों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा लोग गांव में रहते हैं. ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (HDI) के ज्यादातर मानकों में झारखंड आज भी सबसे निचले स्थान में टिका हुआ दिखाई देता है

तुरंत प्लानिंग और एक्शन करना होगा 

वर्ष 2016 के कुछ शोध के अंकों में नज़र डालिए तो मालूम होता है कि हमें अभी काफी आगे जाना है. सपने और सच में काफी दूरियां है. 2004-05 और 2013-14 के बीच मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में 14% से भी ज्यादा की गिरावट दर्ज की गयी. इसके अलावा और बहुत सी बातें हैं जो परेशानी का कारण बनी हुई हैं.

आप किसी भी क्षेत्र पर नज़र डालें, तो स्थिति अच्छी नहीं दिखाई देती. बेरोजगारी दर झारखंड में 3.1% के आसपास है. केवल 10.4% घरों तक ही पाइप के द्वारा पानी पहुंचा है.

राज्य की आधी जनसंख्या गरीब (सांकेतिक फोटो)

1 लाख की आबादी पर सिर्फ 8 कॉलेज हैं हमारे पास. करीब 56% घर तक ही बिजली है, लिटरेसी रेट 70.3% है. खेती में भी देखा जाये तो केवल 12.1% ही कुल इलाकों में सिंचाई की सुविधा पहुंची हैं.

झारखंड इकोनॉमिक सर्वे की एक रिपोर्ट बताती है की लिंग अनुपात यहां 948 पर है. स्वास्थ्य पर तो विशेष ध्यान देना होगा. प्रति 1000 पर आज इन्फैंट मोर्टलिटी 37, एमएमआर 219, साथ में क्रूड डेथ रेट 6.8% और क्रूड बर्थ रेट 25 है. फर्टीलिटी रेट प्रति 1000 में 2.7% है.

इसे भी पढ़ेंःबिहार के 20-20 चुनाव में जनता की अदालत में 15 बनाम 15 की होगी सुनवाई!

इकोनॉमिक स्थिति देखिये तो पता लगेगा कि झारखंड के पास पूरे देश का 40% खनिज संपदा मौजूद है, पर देश के कुल मिनरल प्रोडक्शन में हमारी हिस्सेदारी केवल 10% ही है. जो धनबाद जिला दशकों पहले से ही विकास की राह पर चल पड़ा था, उसको आज हम ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ से समझ रहे हैं. यह मज़ाक नहीं तो और क्या है.

आज झारखंड की जीडीपी में माइनिंग की केवल 10.9% ही हिस्सेदारी रह गयी. खेती का 14.9%, इंडस्ट्रीज का 52.2%, शेष मैन्यूफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर है. इस तरह झारखंड की एवरेज जीडीपी 2016 के दौरान 5.6% के आसपास है.

चाहिए प्रोफेशनल्स की एक पूरी टीम

अब ऐसी परिस्थित में हमें यह समझना चाहिए कि बात फिर से घूम के ‘स्पेशललिस्ट्स‘ और ‘जेनेरालिस्ट्स’ पर पहुंच जाती. एक प्रोफेशनल जिसने पूरी ज़िन्दगी हेल्थ या मैनेजमेंट या एग्रीकल्चर प्रैक्टिस की हो, वह आज के एडमिनिस्ट्रेशन में ज्यादा-से-ज्यादा किसी आइएएस अधिकारी का असिस्टेंट बनकर रह जाता.

ऐसा इसलिए है क्योंकि हम मान कर चलते कि एक आइएएस को हर क्षेत्र का बराबर ज्ञान होगा. इसलिए वे कभी एग्रीकल्चर के सेक्रेटरी होते हैं और कुछ सालों बाद वही मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉर्पोरेट अफेयर्स के.

ऐसे में जो प्रोफेशनल्स देश और विदेश के उच्च संस्थानों से पढ़ाई करते हैं, या जो वहां रिसर्च करते हैं या जो वहां पढ़ते हैं, उन्हें जरूरत है कि पूरी प्लानिंग और इम्प्लीमेंटेशन में सरकार के साथ काम करने का मौका दिया जाये.

झारखंड जैसे राज्य में आज हमें इसकी बहुत ज़रूरत है, वह भी हर एक विभाग में. यहां तक कि अमेरिका में जब बराक ओबामा ने पदभार संभाला था, तब उन्होंने ने भी टॉप माइंडस की पूरी एक टीम को अपने साथ सरकार में लाया ताकि वह अपनी सेवा दे और विकास में देश आगे चले.

लेटरल एंट्रीज़ का ही नतीजा है कि आजादी के बाद से चाहे ग्रीन रिवोलुशन हो, या वाइट, या डिफेन्स, चाहे स्पेस. हर फील्ड में हमने जबरदस्त सकारात्मक बदलाव और विकास देखे हैं. समय आ गया है जब झारखंड में भी बेस्ट माइंडस के लिए लेटरल एंट्रीज़ लानी होगी, ताकि हमारे ग्राफ में कुछ सुधार दिखे.

चुनौतियां हैं पर समाधान संभव

उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्य का गठन भी झारखंड के साथ ही हुआ. आज दोनों राज्य में स्टेट जीडीपी और एचडीआइ झारखंड से बेहतर है. साधारण समझ यह कहती है कि जहां कॉर्पोरेट विकास और शहरीकरण ज्यादा होगा, वहां एचडीआइ भी बेहतर होगा. पर झारखंड की समस्या थोड़ी और जटिल है.

जमशेदपुर कुछ क्षेत्रों में विकास सूचकांक में आगे (शहर की फाइल फोटो)

अब जमशेदपुर का विकास सूचकांक कई क्षेत्र में आगे होगा, पर इसके बाद भी नीचे के कुछ जिले जैसे पाकुड़ और देवघर कुछ श्रेणी में जमशेदपुर से अच्छे और आगे हैं. ‘पब्लिक अफेयर्स इंडेक्स डाटा’ (बेंगलुरु) बताता है कि महिला एवं बाल विकास में झारखंड राज्य देश के 29 वें स्थान पर है. एचडीआइ में 26 वें और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में हम 24 वें स्थान पर हैं.

इसको अब दूसरे नज़र से भी समझिये. एनएसएस (2011-12) डाटा के हिसाब से जमशेदपुर फीमेल लिटरेसी में राज्य भर में सबसे आगे है. पर, मेल लिटरेसी में रांची बाज़ी मार ले जाती है. 70% स्टेट की जीडीपी शहरों में से आती है.

इसे भी पढ़ेंःसुप्रीम कोर्ट को #Citizenship_Amendment_Act  रद्द कर देना चाहिए, यह असंवैधानिक है : अमर्त्य सेन

पॉलिटिक्ल अस्थिरता, कोयला और मिनरल घोटाला और विज़न की कमी के कारण यह सारी समस्या और बढ़ गयी है. 260 में से 113 विकासखंड नक्सल प्रभावित है और 29% इलाके में जंगल है. झारखंड की परकैपिटा ग्रोथ रेट देश में 13वें स्थान पर है. मतलब समस्या ज्यादा उलझा देंगी.

स्पेशललिस्ट्स और सीएसआर से होगा चमत्कार

मोटा मोटी बात को समझा जाये तो आज झारखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, एग्रीकल्चर, माईनिंग और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के साथ कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (सीएसआर) को जोड़ कर आगे बढ़ने की जरुरत है. और इन सारे सेक्टर्स के बेहतरीन प्रोफेशनल्स की लेटरल एंट्रीज़ को नकारा नहीं जा सकता.

कॉर्पोरेट निवेश को आगे ले जाने के साथ-साथ यहां की कंपनीज को अपनी सीएसआर पॉलिसी को पूरी ईमानदारी से धरातल पर उतारना होगा. ये सारी ऐसी फ़ील्ड्स हैं जिनमे केवल सिविल सर्वेन्ट्स के सहयोग से आप ऊपर नहीं बढ़ सकते. समय और आंकडे दोनों प्रोफेशनलिज्म और एक्स्पर्ट की सहभागिता डिमांड कर रहे हैं. राज्य में आदिवासी और आदिवासियत की विकास और सुरक्षा में भी अच्छी सीएसआर पॉलिसी चमत्कार करेगी, अगर उसे बिज़नस में मिला कर देखा जाये तो.

इसे भी पढ़ें – आर्थिक मंदी के बेहद नजदीक है देश, मांग बढ़ाने पर देना होगा जोर- अभिजीत बनर्जी

डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकतासंपूर्णताव्यावहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचनातथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं हैं. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button