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CM हेमंत को भोजपुरी, मगही से झारखंड के बिहारीकरण का डर,  भाजपा ने कहा-पूरे समाज को अपमानित करने पर लगी सरकार

Ranchi: राज्य में नयी नियोजन नीति में भाषायी विवाद की आग अभी और सुलगने की उम्मीद है. इसके पीछे एक कारण बन रहा है सीएम हेमंत सोरेन को राज्य के बिहारीकरण होने की चिंता. एक मीडिया संस्थान के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि झारखंड आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों की छाती पर पैर रखकर, महिलाओं की इज्जत लूटते वक्त भोजपुरी भाषा में ही गाली दी जाती थी. ट्राइबल ने झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़ी है. वो अपनी रिजनल लैग्वेंज की बदौलत लड़ी है न कि भोजपुरी और हिन्दी भाषा की बदौलत. वे किसी भी हालत में झारखंड का बिहारीकरण नहीं होने देंगे. उनके इस बयान पर जोरदार विरोध शुरू हो गया है.

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भाजपा प्रवक्ता कुणाल षाडंगी ने सभी सत्तारुढ़ दलों से खुला प्रश्न करते हुए कहा है कि सीएम भोजपुरी, मगही भाषा बोलने वालों के खिलाफ हैं. क्या वे उनसे सहमत हैं. जिससे राजधर्म की उम्मीद की जाती है, वे किसी वारदात या व्यक्ति विशेष के आधार पर पूरे समाज को अपमानित करने में लगे हैं. भाजपा के अलावा सोशल मीडिया के जरिये कई अन्य लोगों ने भी सीएम के बयान पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी है.

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स्थानीय नहीं, बाहरी लैंग्वेज है भोजपुरी मगही

अपने इंटरव्यू में सीएम ने कहा है कि मगही व भोजपुरी रिजनल लैग्वैंज न होकर बाहरी लैग्वेंज है. जो लोग मगही या भोजपुरी बोलते हैं, वे लोग डोमिनेटेड पर्सन्स हैं. जो लोग मजबूत रहते हैं, उनके पैरों के नीचे सभी रहते हैं. हो सकता है कि कभी इन लोगों के साथ रहने पर कुछ लोग मगही या भोजपुरी भाषा बोलना सीख गये हो, पर ये झारखंड की भाषा तो नहीं ही है.

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विधानसभा में भी सरकार ने नहीं दिखायी है रुचि

गौरतलब है कि 5 अगस्त को राज्य सरकार ने नयी नियोजन नीति जारी की. इसमें राज्य की 12 क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं को चिन्हित कर स्वीकृति दी. पर मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, भूमिज भाषाओं को शामिल करने में रुचि नहीं दिखायी. भाजपा विधायकों भानू प्रताप शाही, राज सिन्हा समेत अन्य विधायकों के अलावा मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर, कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय सिंह समेत दूसरे जनप्रतिनिधियों ने भी सरकार से इस संबंध में विचार करने को कहा. विधानसभा के मॉनसून सत्र में इस सवाल को सदन में सवाल लाया. कहा कि राज्य के कई ऐसे जिले हैं जहां बड़ी संख्या में भोजपुरी, मैथिली, अंगिका भाषाई लोग रहते हैं. सरकार के फैसले से उनका हित, कैरियर प्रभावित हो सकता है. पर सरकार ने सदन में भी साफ कहा कि नयी नियोजन नीति में इन भाषाओं को शामिल करने का उसका कोई विचार नहीं है.

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