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Opinion: स्वास्थ्य सुविधा नागरिकों का मौलिक अधिकार

Amardeep Yadav

भारत लगातार तीसरे कैलेंडर वर्ष में कोरोना महामारी के दूसरे वेव से संघर्ष कर रहा है. कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों ने न्यायपालिका को भी सख्त कर दिया है. इस कारण सरकार की सक्रियता के बावजूद सुप्रीम कोर्ट समेत कई राज्यों की न्यायपालिकाओं ने तीखी टिपणियां की हैं क्योंकि जनमानस के बीच इलाज के लिए भागमभाग का माहौल है, हर अमला चिंतित है कि इस वैश्विक महामारी से मुक्ति कैसे मिले!

केंद्र और राज्यों की सरकारों द्वारा जनकल्याण हेतु हर मोर्चे पर स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल करने का निरंतर प्रयास जारी है, बावजूद इसके धरातल से आ रही हकीकत चिंतनीय है. निजी अस्पतालों में बेड नही होने के नाम पर प्रबंधन द्वारा इलाज से मना करने से जनता ज्यादा बेहाल है तथा कोरोना से ठीक होने के बाद या मरीज की मौत होने के बाद अप्रत्याशित बिल भुगतान लोगों को आर्थिक रूप से कमजोर कर रहा है. अस्पतालों द्वारा महंगे इलाज, बिचौलियों द्वारा जीवन रक्षक दवाएं और चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी से आवाम ज्यादा शोषित है. यह निजी अस्पताल और फार्मा कंपनियों का सिंडिकेट द्वारा निर्मित कृत्रिम समस्या है जो सरकार के सदनीयत वाले प्रयासों पर पानी फेर रही है. डॉक्टरों और अस्पतालों की मनमानी के आगे सरकारी व्यवस्था को बौना होता देखकर लोग स्वास्थ्य व्यवस्था को कोस रहे हैं परंतु उम्मीद की निगाहें भी सरकार पर टिकाये हुए हैं.

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उपरोक्त सभी कुकर्म अपराध की श्रेणी में आते हैं. इसके मुक्ति हेतु सरकार को सख़्त होने और नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने का समय है क्योंकि चिकित्सा सुविधा भारत के नागरिकों का मौलिक अधिकार है. भारत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सार्वभौमिक अधिकारों की घोषणा 1948 के अनुच्छेद-25 का हस्ताक्षरकर्ता है जो अपने नागरिकों को भोजन, कपड़े, आवास, चिकित्सा देखभाल और अन्य सामाजिक सेवाओं के माध्यम से स्वास्थ्य कल्याण के लिए जीवन स्तर का अधिकार देता है. संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार दिये गये हैं, जिसमें अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार है.

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संविधान के भाग-4 द्वारा प्रदत्त राज्य नीति के निदेशक तत्व अनुच्छेद 38, 39, 42, 43 और 47 ने स्वास्थ्य के अधिकारों की प्रभावी प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को दिशानिर्देशित किया है. सुप्रीम कोर्ट ने परमानंद कटारा बनाम संघ, 28 अगस्त 1989 एआइआर 2039, एससीआर(3) 997 में न्यायधीश रंगनाथ मिश्रा द्वारा दिये आदेश में कहा गया है कि डॉक्टर चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी यह उनका वृतिक दायित्व है कि वे पहले एक्सिडेंटल, मेडिकल या मैटरनिटी इमरजेंसी में मरीज का इलाज किया करें. बिना किसी कानूनी औपचारिकता की प्रतीक्षा के उसे चिकित्सा सुविधा प्रदान करें. ऐसा ना करने पर मेडिकल नेग्लिजेंस का क्रिमिनल केस बनेगा. नेशनल लॉ कमीशन ने 2006 में अपनी 201वीं रिपोर्ट में केंद्र को सुझाव दिया है जिसमें इलाज में मना करने पर डॉक्टरों और अस्पतालों पर स्टेट मेडिकल काउंसिल की रिपोर्ट अनुसार कार्रवाई का प्रावधान है.

पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति मामले में 1996(4) एसएससी 37 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है-एक कल्याणकारी राज्य में सरकार का प्रथम कर्तव्य नागरिकों का कल्याण सुनिश्चित करना और लोगों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा प्रदान करना है जिसमें चिकित्सा का भार व्यक्ति की गरीबी पर ना पड़े. इसी संबंध में 2011 में दिल्ली हाइकोर्ट में केंद्र सरकार ने हलफनामा दिया था कि नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना उनकी जिम्मेदारी है.

कोरोना काल के बीच 18 दिसंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एम आर शाह ने केंद्र सरकार से कहा कि स्वास्थ्य के अधिकार में सस्ती चिकित्सा सुविधा भी शामिल है. इसलिए निजी अस्पतालों की फीस की सीमा तय करते हुए कैप लगाने की जरूरत है. शिकायत मिलने पर राज्य सरकारें और जिला प्रशासन आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 के तहत शक्तियों का उपयोग करके अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगा सकती हैं.

कानून विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर इस प्रकार से कोई अस्पताल या डॉक्टर इलाज करने से मना करता है तो वह नागरिक के मौलिक अधिकार के अनुच्छेद-21 के तहत व्यक्ति के जीने का अधिकार का अतिक्रमण करता है. इसके विरोध में अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद-226 के तहत हाइकोर्ट में याचिका दे सकते हैं. भारत सरकार समेत राज्य सरकारें कालाबाजारी और मनमाने रवैये के खिलाफ कई संस्थाओं पर कानूनी कार्यवाही भी कर रही हैं जिससे लोगों को सुकून मिल रहा है लेकिन अमानवीय करतूत करने वालों पर हार्ड एक्शन की मांग है.

डॉक्टरों को भी यह समझना होगा कि उनका पेशा कोई पैसा कमाने का साधन नहीं है बल्कि जीवन बचाने का एक अवसर है. अतः उन्हें पहले से ज्यादा संवेदनशील बनना पड़ेगा तथा मन को सेवा के लिए तैयार करना पड़ेगा. इसके लिए हो सकता है कि उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़े लेकिन परेशानियां उनके कर्त्तव्यों से बहुत छोटी हैं. डॉक्टरों के प्रति समाज में जो विश्वास कायम है उसे बनाये रखना होगा. यह सिर्फ उनके द्वारा किये जाने वाले मानवीय संवेदनाओं पर आधारित कार्यों से ही संभव है. हालांकि भौतिक लोभ से परे भारत में लाखों डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ अपनी जान की परवाह किये बगैर योद्धा की तरह कर्तव्यों का निर्वहन भी कर रहे हैं इसलिए ऐसे वक्त उन लाखों डॉक्टरों और स्टाफ के प्रति लोगों को कृतज्ञ भी होना है.

(लेखक भारतीय जनता पार्टी पिछड़ी जाति मोर्चा के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष हैं)

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