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स्वास्थ्य विभाग को उम्मीद, 2030 तक राज्य से मलेरिया के उन्मूलन का लक्ष्य होगा हासिल

Ranchi : झारखंड देश के उन पांच राज्यों में एक है जहां मलेरिया के सबसे अधिक मामले दर्ज किये जाते हैं. इसके अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और मेघालय में वेक्टर जनित इस बीमारी के अत्यधिक मामले दर्ज होते हैं. 2019 में देश भर में मलेरिया के कुल मामलों में 45.47 प्रतिशत मामले इन्हीं राज्यों में दर्ज किये गये. इन चुनौतियों के बीच मलेरिया के बोझ को कम करने के लिए झारखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है. वर्ष 2017 से 2021 के बीच राज्य में मलेरिया के मामलों की संख्या साल-दर-साल कम हुई है. अब स्वास्थ्य विभाग (झारखंड) उम्मीद कर रहा है कि अगले 8 सालों में यानी 2030 तक राज्य में मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य हासिल कर लिया जायेगा.

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इस तरह से आ रही गिरावट

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व मलेरिया रिपोर्ट – 2020 के आधार पर झारखंड मलेरिया उन्मूलन के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में तीसरे स्थान पर रहा था. राज्य में मलेरिया के सालाना आंकड़ों की बात करें तो इसमें लगातार कमी दर्ज की गयी है. 2017 में झारखंड में 94,114 मामले थे जबकि 2018 में 57,095 केस दर्ज किये गये.

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यह 39 प्रतिशत की कमी थी. 2019 में 37,133 मामले दर्ज हुए और 35 प्रतिशत की कमी आयी. 2020 में 55 प्रतिशत की कमी के साथ 16,653 मामले दर्ज किये गये. साल 2021 में 2019 की तुलना में 19 प्रतिशत कम मामले दर्ज हुए. संख्या घट कर 13,426 हो गयी.

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मंत्री ने जतायी बदलाव की उम्मीद

स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के मुताबिक आदिवासी क्षेत्र में भी इस बीमारी को लेकर लोगों में जगारुकता फैलाने के लगातार प्रयास हो रहे हैं. इसका परिणाम है कि अब यहां पहले की तुलना मलेरिया के मामलों में काफी कमी दिखाई दे रही है. आदिवासी परिवारों के लोग भी बड़ी संख्या में इस बीमारी की वजह व खतरे को समझने लगे हैं.

इसके साथ ही, झारखंड सरकार की मलेरिया उन्मूलन रणनीतियों के तहत कई प्रयास आदिवासी व अन्य क्षेत्रों में भी किये जाते हैं – जैसे बड़े पैमाने पर बुखार का सर्वेक्षण, एलएलआइएन का वितरण, बीमारी फैलने वाले क्षेत्रों में मच्छरों के पनपने के स्थानों पर कीटनाशकों का छिड़काव. राज्य ने मलेरिया के कारण होने वाली कम मृत्यु दर को बनाये रखा है.

वर्ष 2017-2021 के दौरान मलेरिया के कारण मौतों की संख्या शून्य से 0.04 फीसदी के बीच रही है. राज्य मलेरिया उन्मूलन की राष्ट्रीय रणनीतियों के अनुरूप काम कर रहा है. यह 2027 तक देश में शून्य स्वदेशी संचरण तथा 2030 तक उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा.

गांव के लोगों में इस बीमारी को लेकर जागरुकता का अभाव रहा है, लेकिन अब लोग इसको लेकर तेजी से जागरूक हो रहे हैं. अगर लोगों को वेक्टर जनित बीमारियों के प्रति समझ नहीं होती है तो इस वजह से इसके मामले बढ़ने का खतरा बना रहता है.

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विश्व स्वास्थ्य संगठन, केंद्र सरकार व अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल के जरिए अब राज्य ने इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण कर लिया है.

झारखंड के मलेरिया के मामलों को कम करने का श्रेय विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा शुरू किये गये हाई बर्डन हाई इम्पैक्ट प्रोग्राम को ठीक प्रकार से लागू करने तथा इस पर नियमित निगरानी को जाता है. इसे केंद्र सरकार द्वारा मलेरिया उन्मूलन के लिए पेश की गयी राष्ट्रीय रूपरेखा के तहत अंजाम दिया जा रहा है. इस प्रोग्राम की शुरूआत साल 2018 में भारत सहित 11 ऐसे देशों में की गई, जहां मलेरिया का बोझ बहुत अधिक था.

यह प्रोग्राम रोग के बोझ को कम करने में कारगर साबित हुआ है. स्वास्थ्य मंत्री ने झारखंड वासियों से आग्रह किया है कि मलेरिया को लेकर जागरुकता कार्यक्रमों व सरकारी रोकथाम उपायों का लाभ उठायें. वे इस बीमारी व इसकी वजहों को जानें. घरों में व आसपास सफाई रखें.

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